
तमिलनाडु में जवाहर नवोदय विद्यालयों की स्थापना के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार के रुख पर कड़ी टिप्पणी की है। कोर्ट ने कहा कि ऐसा नहीं हो सकता कि तमिलनाडु की धरती पर हिंदी नहीं पढ़ाई जाए। अदालत ने राज्य सरकार को हर जिले में नवोदय विद्यालय के लिए जमीन चिह्नित करने के अपने पुराने आदेश का पालन करने के लिए तीन महीने का अतिरिक्त समय दिया है।
नवोदय स्कूलों को लेकर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई
नई दिल्ली। तमिलनाडु में जवाहर नवोदय विद्यालयों की स्थापना को लेकर चल रहे विवाद में सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को राज्य सरकार को अपने रुख पर पुनर्विचार करने की सलाह दी। जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि तमिलनाडु में हिंदी नहीं पढ़ाई जाएगी, ऐसा नहीं हो सकता।
अदालत ने कहा कि राज्य में पहले से चल रही अच्छी व्यवस्थाओं के साथ यदि कुछ अतिरिक्त जुड़ता है तो उससे राज्य का स्तर कम नहीं होगा। पीठ ने केंद्र और तमिलनाडु सरकार के बीच बातचीत के जरिए मतभेद दूर करने पर भी जोर दिया।
तीन महीने का अतिरिक्त समय
सुप्रीम कोर्ट ने दिसंबर 2025 में तमिलनाडु सरकार को राज्य के प्रत्येक जिले में जवाहर नवोदय विद्यालय स्थापित करने के लिए आवश्यक जमीन चिह्नित करने का निर्देश दिया था। राज्य सरकार ने इस आदेश को वापस लेने की मांग की थी।
गुरुवार की सुनवाई में अदालत ने अपना पुराना निर्देश वापस लेने से इनकार कर दिया। हालांकि, राज्य सरकार को इसका पालन करने के लिए तीन महीने का अतिरिक्त समय दिया गया है। अदालत ने केंद्र और राज्य सरकार के अधिकारियों को नवोदय विद्यालयों की स्थापना और भाषा नीति से जुड़े मुद्दों पर आगे बातचीत करने को भी कहा है। मामले की अगली सुनवाई 14 दिसंबर को होगी।
भाषा नीति पर है मुख्य विवाद
तमिलनाडु सरकार की आपत्ति मुख्य रूप से नवोदय विद्यालयों में लागू तीन भाषा नीति को लेकर है। राज्य में दो भाषा नीति लागू है, जिसमें तमिल और अंग्रेजी को प्रमुखता दी जाती है। तमिलनाडु सरकार का कहना है कि नवोदय विद्यालयों की तीन भाषा व्यवस्था उसकी मौजूदा भाषा नीति के अनुरूप नहीं है।
मार्च 2026 में राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में कहा था कि नवोदय विद्यालय योजना मौजूदा स्वरूप में तमिलनाडु की दो भाषा नीति के साथ संगत नहीं है। राज्य ने तमिलनाडु तमिल लर्निंग एक्ट, 2006 का भी हवाला दिया था।
वहीं, केंद्र सरकार ने अदालत को बताया था कि हिंदी भाषी क्षेत्र से बाहर स्थित नवोदय विद्यालयों में पढ़ाई का माध्यम मुख्य रूप से संबंधित क्षेत्र की भाषा या अंग्रेजी होता है।
राज्य ने रखा अपना पक्ष
सुनवाई के दौरान तमिलनाडु सरकार की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता जयदीप गुप्ता ने कहा कि राज्य की आपत्ति स्कूलों या हिंदी पढ़ाए जाने के खिलाफ नहीं, बल्कि नवोदय योजना से जुड़ी भाषा नीति को लेकर है। उन्होंने कहा कि राज्य की नीति में तमिल को प्राथमिकता दी गई है।
राज्य की ओर से यह भी तर्क दिया गया कि शिक्षा नीति को लेकर राज्य की अपनी व्यवस्था है और केंद्र की किसी वैकल्पिक नीति को राज्य पर अनिवार्य रूप से लागू करने का सवाल उठता है।
कोर्ट ने बातचीत से समाधान पर दिया जोर
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और राज्य के बीच बातचीत को आगे बढ़ाने की बात कही। पीठ ने कहा कि भाषा से जुड़े मुद्दे पर दोनों पक्ष चर्चा कर सकते हैं। अदालत ने राज्य के सचिव को केंद्र के संबंधित सचिव के साथ बातचीत करने का सुझाव भी दिया।
कोर्ट ने यह भी कहा कि केंद्र से आने वाली किसी व्यवस्था को केवल इस आधार पर अलग नहीं किया जा सकता कि वह दिल्ली से आती है। पीठ ने केंद्र और राज्य के बीच सहयोगात्मक संघवाद की भावना के साथ आगे बढ़ने पर जोर दिया।
मामला पहले भी अदालत पहुंच चुका है
तमिलनाडु में नवोदय विद्यालयों की स्थापना का विवाद नया नहीं है। पहले भी मद्रास हाई कोर्ट ने राज्य में नवोदय विद्यालय स्थापित करने के संबंध में निर्देश दिए थे। इसके बाद तमिलनाडु सरकार ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया।
मामले में एक अहम मुद्दा यह भी रहा है कि नवोदय विद्यालयों में क्षेत्रीय भाषा और हिंदी के इस्तेमाल को लेकर राज्य की क्या स्थिति होगी। 2017 में भी मद्रास हाई कोर्ट के सामने यह मुद्दा आया था। उस समय अदालत के समक्ष नवोदय विद्यालय समिति की ओर से बताया गया था कि तमिलनाडु में तमिल को निर्धारित कक्षाओं में भाषा के रूप में पढ़ाया जा सकता है।
अब सुप्रीम कोर्ट के ताजा निर्देश के बाद तमिलनाडु सरकार को हर जिले में नवोदय विद्यालय के लिए जमीन चिह्नित करने के मुद्दे पर आगे बढ़ना होगा। साथ ही केंद्र और राज्य के बीच भाषा नीति को लेकर बातचीत भी जारी रहेगी।
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