
मध्य प्रदेश के उमरिया स्थित बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व में बाघिनों की दुनिया से जुड़ी एक दिलचस्प कहानी सामने आई है। प्रसिद्ध बाघिन डॉटी की बेटी त्रिशूली ने अपनी मां से अलग होकर जंगल में अपना इलाका बनाया और अब अपनी मजबूत मौजूदगी के कारण चर्चा में है। त्रिशूली को मगधी क्षेत्र की मजबूत बाघिनों में गिना जा रहा है। हाल ही में डॉटी की मौत के बाद बांधवगढ़ में उसके दो शावकों की निगरानी भी वन विभाग की प्राथमिकता बनी हुई है।
मां डॉटी की पहचान थी अलग, बेटी ने भी बनाई पहचान
बांधवगढ़ की डॉटी को वन्यजीव प्रेमियों और पर्यटकों के बीच खास पहचान हासिल थी। उसके माथे पर अंग्रेजी अक्षर ‘डी’ जैसी धारियां थीं, जिसके कारण उसे डॉटी नाम दिया गया था। अधिकारियों के अनुसार डॉटी का जन्म 2011-12 के आसपास मगधी क्षेत्र में हुआ था। उसने अपने जीवनकाल में कई बार शावकों को जन्म दिया और उन्हें सफलतापूर्वक पाला। उसके वंश से बांधवगढ़ में कई चर्चित बाघ सामने आए।
डॉटी की बेटी त्रिशूली ने भी जंगल में अपनी अलग पहचान बनाई। क्षेत्र और परिस्थितियों के अनुसार बाघिनों के बीच क्षेत्रीय संघर्ष होना स्वाभाविक व्यवहार का हिस्सा माना जाता है। ऐसे संघर्षों के बाद मजबूत बाघिनें अपने लिए अलग इलाका स्थापित कर लेती हैं।
त्रिशूली ने मां से अलग होकर बनाया अपना इलाका
बांधवगढ़ के जंगलों में बाघों के लिए क्षेत्र पर पकड़ बेहद महत्वपूर्ण होती है। भोजन, पानी और सुरक्षित स्थान की उपलब्धता के आधार पर बाघिनें अपना क्षेत्र तय करती हैं। त्रिशूली ने भी समय के साथ अपनी स्वतंत्र पहचान बनाई और अपने क्षेत्र में मजबूत पकड़ कायम की।
यही वजह है कि उसे बांधवगढ़ की चर्चित बाघिनों में शामिल किया जा रहा है। हालांकि किसी बाघिन को ‘फाइटर’ या सबसे शक्तिशाली कहना वन विभाग की आधिकारिक श्रेणी नहीं है। ऐसे शब्द आमतौर पर उसके व्यवहार, क्षेत्रीय संघर्षों और वन्यजीव प्रेमियों के बीच बनी पहचान के आधार पर इस्तेमाल किए जाते हैं।
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डॉटी की मौत के बाद दो शावकों पर वन विभाग की नजर
डॉटी की 9 अक्टूबर को मानपुर बफर क्षेत्र के मझखेता बीट में मौत हो गई थी। गश्त के दौरान उसका शव मिला था। वन विभाग ने क्षेत्र को सुरक्षित कर जांच की और डॉग स्क्वाड से आसपास के इलाके की तलाशी भी कराई। अधिकारियों के अनुसार शुरुआती जांच में किसी संदिग्ध गतिविधि के संकेत नहीं मिले। पोस्टमार्टम में प्रथम दृष्टया मौत प्राकृतिक बताई गई है, जबकि अंतिम निष्कर्ष के लिए नमूने प्रयोगशालाओं को भेजे गए हैं।
डॉटी के करीब 15 से 16 महीने के दो शावक अब मां से अलग जंगल में विचरण कर रहे हैं। वन विभाग उनकी गतिविधियों, लोकेशन और स्थिति पर लगातार नजर बनाए हुए है।
बांधवगढ़ में जारी है बाघों की विरासत
बांधवगढ़ का जंगल बाघों की समृद्ध आबादी के लिए जाना जाता है। आधिकारिक जानकारी के अनुसार यहां ताला, मगधी और खितौली प्रमुख पर्यटन क्षेत्र हैं, जबकि कई बफर क्षेत्र भी इनके आसपास मौजूद हैं। अलग-अलग बाघ परिवारों के बीच क्षेत्रीय गतिविधियां इस वन क्षेत्र के प्राकृतिक जीवन का हिस्सा हैं।
डॉटी की मौत के बाद उसकी विरासत अब उसके शावकों और उससे जुड़े दूसरे बाघों के रूप में आगे बढ़ती दिखाई दे रही है। त्रिशूली का अपने क्षेत्र में मजबूत होना भी इसी प्राकृतिक प्रक्रिया का हिस्सा है। आने वाले समय में वन विभाग की निगरानी यह तय करेगी कि डॉटी के दोनों शावक जंगल में स्वतंत्र जीवन के लिए किस तरह आगे बढ़ते हैं।
बांधवगढ़ में त्रिशूली की कहानी एक ऐसी बाघिन की कहानी है, जिसने मां डॉटी की छाया से निकलकर जंगल में अपनी अलग पहचान बनाई। वहीं डॉटी की मौत के बाद उसके दो शावकों की सुरक्षा और निगरानी अब वन विभाग के लिए अहम जिम्मेदारी है। बांधवगढ़ के जंगल में बाघों की यह पीढ़ी वन्यजीव प्रेमियों की नजरों में बनी हुई है।
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