
टेंट के नाम पर ‘लूटतंत्र‘, फाइलों में दौड़ रहा कमीशन का खेल; क्या ‘मामा‘ और ‘साहब‘ की नाक के नीचे पल रहे हैं ये सफेदपोश डकैत?
भोपाल। मध्य प्रदेश का जनसंपर्क विभाग और ‘माध्यम’ (Madhyam) अब सरकार की योजनाओं का प्रचार करने वाला माध्यम नहीं, बल्कि भ्रष्टाचार का ‘एक्सप्रेस-वे’ बन चुका है। जहाँ विज्ञापन की चमक-धमक के पीछे अंधेरा इतना गहरा है कि करोड़ों की बंदरबांट की गूँज अब मंत्रालय की दीवारों को फाड़कर सड़कों पर आ गई है। ‘ब्रांडवाणी समाचार’ के पास मौजूद इनपुट बताते हैं कि यहाँ योग्यता रद्दी की टोकरी में है और ‘कमीशन का मैनेजमेंट’ ही एकमात्र योग्यता बन गई है।
● मलाईदार सिंडिकेट: जो जितना ‘काटेगा‘, उतना ही ‘बांटेगा‘
विभाग के भीतर बैठे ‘दागी अफसरों’ की फौज ने एक ऐसा अभेद्य किला तैयार किया है, जहाँ बिना ‘चढ़ावे’ के परिंदा भी पर नहीं मार सकता। यहाँ वेंडर्स का चयन काम की गुणवत्ता देख कर नहीं, बल्कि इस आधार पर होता है कि “साहब की मेज के नीचे कितनी मलाई पहुंचेगी।”
- टेंट का ‘टैक्स‘ और लूट का ‘इवेंट‘: छोटे-छोटे सरकारी कार्यक्रमों के लिए जो टेंट और कुर्सियां लगती हैं, उनके बिल देखकर किसी भी ईमानदार नागरिक के पैरों तले जमीन खिसक जाएगी। ₹500 का सामान ₹50,000 के बिल में बदल जाता है।
- बैकडेट की बाजीगरी: टेंडर की प्रक्रिया तो बस एक ‘आईवॉश’ (छलावा) है। सूत्र बताते हैं कि वर्क ऑर्डर पहले ही चहेतों की जेब में डाल दिए जाते हैं, बाद में कागजी खानापूर्ति कर इसे ‘पारदर्शी’ बताया जाता है।
- ब्लैकलिस्टेड का बोलबाला: ताज्जुब की बात यह है कि जिन फर्मों पर पहले सवाल उठे, वे आज भी विभाग की पहली पसंद बनी हुई हैं। आखिर क्यों? जवाब सीधा है—’मैनेजमेंट’!
● भ्रष्ट तंत्र का ‘फ्लो-चार्ट‘: कैसे डकारा जा रहा है जनता का पैसा?
| भ्रष्टाचार का हथियार | खेल का तरीका | ब्रांडवाणी का खुलासा |
| नकली इवेंट्स | धरातल पर कार्यक्रम केवल नाम का, फाइलों में वीआईपी इंतजाम। | जनता के करोड़ों रुपये कागजी लंच और डिनर पर स्वाहा। |
| होर्डिंग्स का हेरफेर | एक होर्डिंग जिसकी लागत 20% है उसको 100% बना के कीमत में इजाफा करना और कमीशन उसके अनुरूप सेट करना | शहर की दीवारों पर प्रचार नहीं, बल्कि घोटाले की पुताई है। |
| कमीशन की फिक्सिंग | 25% से 30% तक का ‘कट’ पहले ही तय। | ईमानदार एजेंसियां बाहर, ‘जेब भरने वाले’ वेंडर अंदर। |
● “क्या सत्ता के शीर्ष को भनक नहीं, या सब मौन सहमति है?”
सवाल उठता है कि प्रदेश के मुखिया और मुख्य सचिव की नाक के नीचे यह ‘लूट का हेडक्वार्टर’ कैसे फल-फूल रहा है? जब आम जनता महंगाई और बेरोजगारी से जूझ रही है, तब जनसंपर्क विभाग के कुछ ‘खास’ अफसर करोड़ों के वारे-न्यारे कर रहे हैं। क्या इन अफसरों को सरकार का संरक्षण प्राप्त है? या फिर भ्रष्टाचार की यह जड़ें इतनी गहरी हो चुकी हैं कि अब ‘बुलडोजर’ भी रास्ता भूल गया है?
“यह विभाग अब सूचना का नहीं, बल्कि वसूली का केंद्र बन गया है। यहाँ फाइलों पर पेन नहीं, बल्कि कमीशन की स्याही चलती है।”
— ब्रांडवाणी के लिए वरिष्ठ सूत्र
अब आर-पार की जंग!
जनसंपर्क विभाग का पतन इस बात का प्रमाण है कि सिस्टम के भीतर ‘दीमक’ लग चुका है। यदि समय रहते इन ‘मैनेजमेंट गुरुओं’ पर नकेल नहीं कसी गई और उच्च स्तरीय जांच (CBI या SIT) नहीं बिठाई गई, तो यह घोटाला सरकार की बची-कुची साख को भी लील जाएगा। जनता अब आश्वासन नहीं, ‘एक्शन’ चाहती है। क्या मुख्यमंत्री इन सफेदपोश भ्रष्टाचारियों को जेल भेजेंगे, या फिर ‘सब चंगा सी’ का ढोल बजता रहेगा?







