
पितृ पक्ष में श्राद्ध और पिंडदान को पूर्वजों के प्रति श्रद्धा अर्पित करने की परंपरा माना जाता है। ऐसे में सवाल उठता है कि जिस व्यक्ति की कोई संतान नहीं है, उसकी मृत्यु के बाद श्राद्ध और पिंडदान कौन कर सकता है। गरुड़ पुराण से जुड़ी मान्यताओं के अनुसार, ऐसी स्थिति में परिवार के अन्य सदस्य और निकट संबंधी यह कर्म कर सकते हैं।
पितृ पक्ष के दौरान हिंदू परिवारों में पूर्वजों के लिए श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान किया जाता है। धार्मिक मान्यताओं में इन कर्मों को पितरों के प्रति श्रद्धा और कृतज्ञता व्यक्त करने का माध्यम माना गया है। इस वर्ष पितृ पक्ष 27 सितंबर से 10 अक्टूबर 2026 तक है।
आमतौर पर पिता के श्राद्ध और पिंडदान के लिए बड़े पुत्र को प्रमुख कर्ता माना जाता है। लेकिन हर परिवार की परिस्थितियां एक जैसी नहीं होतीं। कई बार किसी व्यक्ति की संतान नहीं होती, बेटा जीवित नहीं होता या परिवार में पुरुष संतान उपलब्ध नहीं होती। ऐसी स्थिति में श्राद्ध कर्म किसके द्वारा किया जाए, इसे लेकर धार्मिक ग्रंथों में अलग-अलग परिस्थितियों के लिए व्यवस्था बताई गई है। जागरण की रिपोर्ट के अनुसार, गरुड़ पुराण से जुड़ी मान्यताओं में इस स्थिति के लिए कई विकल्प बताए गए हैं।
पोता या परपोता कर सकता है श्राद्ध
गरुड़ पुराण के आधार पर प्रकाशित जानकारी के मुताबिक, यदि किसी व्यक्ति का पुत्र नहीं है, लेकिन उसका पोता या परपोता मौजूद है, तो वंश की अगली पीढ़ी से यह कर्म किया जा सकता है। इसे उसी वंश परंपरा का हिस्सा माना जाता है।
धार्मिक ग्रंथ के एक उपलब्ध अनुवाद में भी पुत्र, पौत्र, प्रपौत्र तथा कुछ निकट संबंधियों को अंतिम संस्कार के अधिकार से जोड़ा गया है। वहीं पुरुष वंशज उपलब्ध न होने पर महिलाओं द्वारा कर्म करने का भी उल्लेख मिलता है।
पत्नी को भी मिलता है अधिकार
यदि किसी व्यक्ति की संतान नहीं है और उसकी पत्नी जीवित है, तो पत्नी द्वारा पति के श्राद्ध कर्म किए जाने का उल्लेख गरुड़ पुराण के संदर्भ में मिलता है। एक श्लोक के उपलब्ध अनुवाद में पुत्रहीन व्यक्ति के लिए पत्नी द्वारा सपिंडीकरण करने की बात कही गई है। जरूरत पड़ने पर यह कर्म ऋत्विज या पारिवारिक पुरोहित के माध्यम से भी कराया जा सकता है।
इससे स्पष्ट है कि पुत्र का न होना श्राद्ध कर्म को रोकने वाली स्थिति नहीं मानी गई है। हालांकि, अलग-अलग परंपराओं और परिवारों में विधि तथा कर्ता को लेकर अंतर हो सकता है।
बेटी भी कर सकती है श्राद्ध
बेटी के श्राद्ध करने को लेकर अलग-अलग धार्मिक व्याख्याएं देखने को मिलती हैं। जागरण की संबंधित रिपोर्ट में गरुड़ पुराण के आधार पर बताया गया है कि यदि परिवार में केवल बेटियां हैं, तो पुत्री भी अपने पिता का श्राद्ध विधिपूर्वक कर सकती है। इसी तरह बेटी का बेटा यानी नाती भी अपने नाना-नानी का श्राद्ध कर सकता है।
गरुड़ पुराण के उपलब्ध एक अन्य अनुवाद में भी पुत्र के अभाव में पत्नी, बेटी के पुत्र और बेटी का उल्लेख मिलता है।
बड़ी बहू और भतीजे की भी भूमिका
यदि मृतक की अपनी संतान नहीं है और परिवार में पुरुष सदस्य मौजूद नहीं हैं, तो बड़ी बहू द्वारा सास-ससुर के लिए पिंडदान किए जाने की बात भी रिपोर्ट में बताई गई है। वहीं मृतक का सगा भाई या भाई का बेटा यानी भतीजा भी श्राद्ध कर्म कर सकता है।
इसके बाद निकट संबंधियों की अनुपस्थिति में सगोत्र यानी समान गोत्र के रिश्तेदारों द्वारा भी यह परंपरा निभाने का उल्लेख मिलता है। इस तरह धार्मिक मान्यताओं में जिम्मेदारी को केवल एक ही रिश्ते तक सीमित नहीं रखा गया है।
कोई रिश्तेदार न हो तो क्या होगा?
सबसे कठिन स्थिति तब होती है, जब मृतक का कोई निकट पारिवारिक या रक्त संबंधी जीवित न हो। जागरण की रिपोर्ट के अनुसार, ऐसी स्थिति में मृतक का मित्र भी श्राद्ध कर्म कर सकता है। वहीं कोई योग्य ब्राह्मण भी यह कर्म संपन्न करा सकता है।
गरुड़ पुराण के एक उपलब्ध पाठ में भी निकट संबंधियों के अभाव में महिलाओं द्वारा अंतिम संस्कार किए जाने तथा कुछ परिस्थितियों में राजा द्वारा कर्म कराए जाने का उल्लेख मिलता है।
श्राद्ध की विधि में स्थानीय परंपराओं का भी महत्व
श्राद्ध और पिंडदान से जुड़े नियमों की व्याख्या अलग-अलग धार्मिक परंपराओं और परिवारों में अलग हो सकती है। इसलिए किसी विशेष व्यक्ति के श्राद्ध की स्थिति में परिवार की परंपरा, कुलाचार और स्थानीय पुरोहित की सलाह के अनुसार विधि तय की जाती है।
यह जानकारी धार्मिक ग्रंथों और प्रकाशित धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है। इसे किसी व्यक्ति की व्यक्तिगत धार्मिक परिस्थिति में अंतिम या एकमात्र नियम नहीं माना जाना चाहिए। दूसरे चैनल ने भी अपनी रिपोर्ट में ऐसी सामग्री को सामान्य सूचना बताते हुए इसे अंतिम सत्य न मानने की बात कही है।
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