
भोपाल (विशेष संवाददाता)। मध्य प्रदेश की प्रशासनिक व्यवस्था और राजनीतिक तंत्र आज एक ऐसे मोड़ पर आ खड़े हुए हैं जहां विकास के बड़े-बड़े विज्ञापनों के पीछे प्रशासनिक अराजकता, खुला आर्थिक शोषण और व्यवस्थागत अंधेरा पसरा हुआ है। राज्य में आज उद्योग लगाना या ईमानदारी से व्यापार चलाना लगभग असंभव सा होता जा रहा है। सत्ता और अफ़सरशाही के गठजोड़ ने एक ऐसा असंतुलित ढांचा तैयार कर दिया है, जिसमें वास्तविक काम करने वाले स्थानीय कारोबारी लगातार हाशिए पर ढकेले जा रहे हैं, जबकि सत्ता की चौखट पर चढ़ावा चढ़ाने वाला सिंडिकेट फल-फूल रहा है।
सूत्रों और अंदरूनी हलकों की मानें तो मध्य प्रदेश में ज़मीनी स्तर पर काम कर रहे व्यापारियों, ठेकेदारों और लाइजनरों के सामने अस्तित्व का गहरा संकट पैदा हो गया है। हालात इस कदर बदतर हो चुके हैं कि नौकरशाही और राजनीतिक नेतृत्व केवल अपनी तिजोरियां भरने में व्यस्त हैं। काम न करने के नए-नए बहाने और लेन-देन के बाद व्यापारियों को ही ठिकाने लगा देने की नई कार्यप्रणाली ने मध्य प्रदेश के पूरे व्यापारिक तंत्र को हिलाकर रख दिया है।
कमीशनखोरी का चक्रव्यूह, नोट भी लेंगे, काम भी अटकाएंगे और बदनाम भी करेंगे
मंत्रालय के हर कमरे में और ज़िलों के कार्यालयों में आज एक ऐसा क्रूर सिंडिकेट सक्रिय है जो व्यापारियों का खून चूसने में लगा है। सूत्रों के अनुसार, जब कोई व्यापारी या लाइजनर महीनों की दौड़-धूप के बाद किसी काम या फ़ाइल की स्वीकृति के लिए अफ़सरों के पास पहुंचता है, तो उनसे भारी-भरकम ‘नज़राना’ वसूला जाता है। लेकिन त्रासदी केवल घूसखोरी तक सीमित नहीं है, त्रासदी यह है कि नोटों के बंडल लेने के बाद भी अफ़सर काम नहीं करते।

जब काम नहीं होता और व्यापारी अपने हक़ या दिए गए पैसे का हिसाब मांगता है, तो तंत्र अपनी साख बचाने के लिए एक बेहद घटिया चाल चलता है। अफ़सर बाज़ार में यह अफ़वाह फैला देते हैं कि “इस व्यापारी का हिसाब-किताब ठीक नहीं है” या “यह लाइजनर धोखेबाज़ है। ये अधिकारियों की शिकायत करता है ऐसे झूठे आरोप लगा कर मशहूर कर दिया जाता है” उस व्यक्ति की व्यावसायिक साख को एक झटके में बाज़ार में मिट्टी में मिला दिया जाता है। अगले ही दिन वही अफ़सर एक नया मोहरा, नया व्यापारी या नया लाइजनर ढूंढकर उसी फ़ाइल पर फिर से वसूली का नया जाल बिछा लेते हैं। अच्छे, नियम से चलने वाले और स्वाभिमानी व्यापारी इस सिंडिकेट को पसंद नहीं आते। इनको केवल वही लोग भाते हैं जो दूसरों की जेब काटकर लाते रहें, तंत्र का पेट भरते रहें और इनके चेहरे पर आंच भी न आने दें।
क्या वल्लभ भवन का पांचवां फ्लोर है इस पूरे खेल का केंद्रबिंदु?
यह सवाल अब केवल दबी ज़बानों में नहीं, बल्कि सूबे के हर जागरूक नागरिक के मन में गूंज रहा है क्या वल्लभ भवन का पांचवां फ्लोर इस पूरे अनैतिक खेल का मास्टरमाइंड है? मंत्रालय की इस सबसे ताक़तवर मंज़िल पर बैठे नीति-नियंताओं और शीर्ष स्तर के ज़िम्मेदारों की आंखों के नीचे आख़िर यह सब कैसे चल रहा है?
अफ़सरशाही की इस संगठित लूट ने राज्य की आर्थिक नींव को खोखला कर दिया है। विडंबना यह है कि लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहलाने वाली मुख्यधारा की मीडिया और पत्रकारिता इस भयानक सच पर मौन साधे बैठी है। हर कोई किसी न किसी लाभ, विज्ञापन या संरक्षण के फेर में चुप है। जब व्यवस्था से सवाल पूछने वाले ही मूकदर्शक बन जाएं, तब सत्ताधीशों का अहंकार सातवें आसमान पर पहुंच जाता है। परिणाम यह है कि खुलेआम चल रही इस लूट पर कोई बोलने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा है।
बेहिसाब काली कमाई और ज़मीनों की कृत्रिम आग
मध्य प्रदेश के प्रमुख शहरों भोपाल, इंदौर, ग्वालियर और जबलपुर में ज़मीनों और रियल एस्टेट की कीमतें अचानक आसमान क्यों छू रही हैं? यह कोई स्वाभाविक आर्थिक विकास या निवेश की तेज़ी नहीं है, बल्कि सरकारी दफ़्तरों से लूटे गए काले धन (ब्लैक मनी) का रियल एस्टेट में बड़े पैमाने पर खपाया जाना है।
अफ़सरों और राजनेताओं ने शोषण के दम पर जो अकूत काला धन जुटाया है, उसे छिपाने का सबसे आसान ज़रिया ज़मीनें बन गई हैं। इस काले धन ने बाज़ार में ज़मीनों के दाम इतने बढ़ा दिए हैं कि एक आम नौकरीपेशा या छोटा व्यापारी जीवन भर की कमाई लगाकर भी एक छत का सपना पूरा नहीं कर पा रहा है। सबको पता है कि बाज़ार में यह बेहिसाब पैसा कहां से आ रहा है, किन अफ़सरों की बेनामी संपत्तियां किस रूप में खड़ी हो रही हैं, लेकिन जांच एजेंसियां और नियामक तंत्र आंखें मूंदे बैठे हैं।
अहंकार की सीमा और सामाजिक पतन, जब उत्पीड़न सीमाओं को लांघ जाता है
सत्ता, पद और पैसे की हनक में चूर इन अधिकारियों और नेताओं को यह याद रखना चाहिए कि केवल अपना विकास करना जीवन का उद्देश्य नहीं हो सकता। मनुष्य को समाज में रहते हुए समाज के विकास की भी चिंता करनी होती है। यदि आप केवल दूसरों का शोषण करके अपना घर भरते रहेंगे, तो एक दिन ऐसा आएगा जब इसी समाज में आपको कोई एक घूंट पानी पूछने वाला भी नहीं मिलेगा।
अति किसी भी चीज़ की विनाशकारी होती है। किसी व्यक्ति पर इतना मानसिक और आर्थिक अत्याचार न करें कि वह अपना विवेक खो बैठे। आज समाज में जो हिंसक घटनाएं बढ़ रही हैं जहां कभी-कभी सालों से प्रताड़ित चपरासी या घरेलू कर्मचारी अपने ही मालिकों के ख़िलाफ़ हिंसक क़दम उठा लेते हैं वह इसी दबे हुए आक्रोश का परिणाम है। जीवन भर सत्ता और पॉवर के नशे में रहने वाले इन साहबों को दूसरों से बदतमीज़ी और गाली-गलौज करने की आदत पड़ जाती है। वे भूल जाते हैं कि हर इंसान का एक आत्मसम्मान होता है।
जब एक आम व्यापारी, छोटा कर्मचारी या लाइजनर लगातार इस बदतमीज़ी, बेइज़्ज़ती और आर्थिक तबाही को झेलता है, तो कई बार उसका मानसिक संतुलन टूट जाता है। अफ़सरों का यह अमानवीय व्यवहार सीधे-सादे लोगों को भी आपराधिक गतिविधियों और बदले की आग में झोंकने के लिए मजबूर कर देता है। मध्य प्रदेश में बढ़ती आपराधिक गतिविधियों के पीछे कहीं न कहीं यह व्यवस्थागत शोषण और अफ़सरों का असंवेदनशील रवैया भी एक बड़ा अदृश्य कारण है।
यूपीएससी की गरिमा बनाम बेलगाम बाबूगिरी
संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) जैसी प्रतिष्ठित परीक्षा पास करके आने वाले अधिकारियों का मूल दायित्व क्या था? उनका चयन इसलिए किया गया था ताकि वे संविधान की रक्षा करें, समाज के प्रति जवाबदेह बनें और वंचितों व व्यापारियों को एक सुरक्षित व निष्पक्ष कार्य-संस्कृति प्रदान करें। लेकिन आज स्थिति इसके ठीक उलट है।
बड़े पदों पर बैठे कई अफ़सर समाज के प्रति अपनी जवाबदेही पूरी तरह भूल चुके हैं। उनका पूरा ध्यान जनसेवा के बजाय इस बात पर केंद्रित हो चुका है कि अपने प्रभाव क्षेत्र से अधिकतम निजी लाभ कैसे निचोड़ा जाए। छोटे व्यापारियों, स्थानीय उद्यमियों और मध्यस्थों को बदनाम करके अपनी नाकामी छुपाने की यह नीति न केवल अनैतिक है, बल्कि प्रशासनिक ढांचे के पतन का स्पष्ट प्रमाण है।
व्यवस्था को आत्ममंथन की सख़्त ज़रूरत
मध्य प्रदेश की यह तस्वीर न तो राज्य के भविष्य के लिए शुभ है और न ही आने वाली पीढ़ियों के लिए। यदि स्थानीय व्यापारी ही सुरक्षित नहीं रहेगा, यदि मेहनत की कमाई पर अफ़सरशाही का डाका यूं ही पड़ता रहेगा, तो राज्य में उद्योग और रोज़गार पूरी तरह ठप हो जाएंगे।
ब्रांडवाणी समाचार स्पष्ट रूप से यह रेखांकित करता है कि सत्ता में बैठे शीर्ष नेतृत्व को अब अपनी चुप्पी तोड़नी होगी। वल्लभ भवन से लेकर ज़िलों की तहसीलों तक फैले इस कमीशनखोरी, चरित्र हनन और दमनकारी कार्यप्रणाली की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। अफ़सरों को यह समझना होगा कि कुर्सी स्थायी नहीं होती, लेकिन उनके द्वारा किया गया अन्याय समाज में जो ज़हर घोल रहा है, उसकी आंच एक दिन पूरे तंत्र को अपनी चपेट में ले लेगी।








