
सत्ता की भूख, तुष्टिकरण के बदलते चेहरे और साढ़े आठ करोड़ जनता के सिर पर लदता लाखों करोड़ का कर्ज — एक तीखा राजनीतिक व आर्थिक विश्लेषण।
आमुख, विकास का मुखौटा और खोखली होती अर्थव्यवस्था
‘देश का दिल’ कहे जाने वाले मध्य प्रदेश की आबोहवा में आज एक अजीब सी बेचैनी है। चौराहों पर लगे विशालकाय होर्डिंग्स, अखबारों के पहले पन्नों पर छपते मुस्कुराते सरकारी चेहरे और टीवी स्क्रीन पर गूंजते लोक-लुभावन वादों के पीछे एक ऐसा कड़वा सच दबा हुआ है, जिसकी तरफ देखने की हिम्मत सत्ता के गलियारों में बैठे लोग नहीं जुटा पा रहे हैं।
सवाल सीधा और स्पष्ट है, क्या मध्य प्रदेश को धीरे-धीरे आर्थिक कंगाली और दिवालियापन के गर्त में धकेल दिया गया है?
जिस प्रदेश को कभी खेती-किसानी, खनिज संपदा और शांतिप्रिय समाज के रूप में जाना जाता था, आज वह राजनीतिक दलों की सत्ता-लोलुपता की प्रयोगशाला बन चुका है। चुनाव जीतने के लिए पहले धार्मिक ध्रुवीकरण की बिसात बिछाई गई, जब वह दांव पुराना पड़ने लगा तो जातिगत समीकरणों और आरक्षण के नए जाल बुने गए, और जब सत्ता पर फिर भी संकट दिखा, तो ‘मुफ्त की योजनाओं’ (रेवड़ी संस्कृति) का एक ऐसा चक्रव्यूह रचा गया जिसमें आज पूरा प्रदेश छटपटा रहा है।
भारतीय जनता पार्टी द्वारा तैयार किए गए इस राजनीतिक दलदल की विडंबना यह है कि मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस भी इस व्यवस्था को चुनौती देने के बजाय उसी दौड़ में अंधी छलांग लगाने को मजबूर दिखता दिख रहा है। यदि भाजपा 1,500 रुपये देने का दांव चलती है, तो विपक्ष उससे बढ़कर बोली लगाने लगता है। इस राजनीतिक नूरा-कुश्ती में पिस रही है मध्य प्रदेश की आम जनता, नौजवानों का भविष्य और प्रदेश का आर्थिक ढांचा।
1. रेवड़ी संस्कृति का राजनीतिक चक्रव्यूह, ‘वोट खरीदो, बिल अगली पीढ़ी पर डालो’
चुनाव जीतने का सबसे आसान और तात्कालिक तरीका क्या है? लंबे समय के बुनियादी ढांचे का निर्माण करना, अच्छे स्कूल-अस्पताल बनाना, या सीधे बैंक खाते में कुछ सौ-हजार रुपये डालकर वोट की फसल काटना?
भाजपा ने पिछले कुछ वर्षों में मध्य प्रदेश में सत्ता बचाने के लिए जिस मॉडल को अपनाया, वह आर्थिक दृष्टि से आत्मघाती साबित हो रहा है। ‘लाडली बहना योजना’ जैसी योजनाओं का राजनीतिक लाभ सत्ताधारी दल को तात्कालिक रूप से भले मिल गया हो, लेकिन इसके पीछे के गणित को समझना जरूरी है।
चुनावी मजबूरी या सुनियोजित जाल?
- प्रतिस्पर्धी लोकलुभावनवाद सत्तापक्ष ने पहले एक निश्चित राशि तय की, फिर चुनाव दर चुनाव इसे बढ़ाने की घोषणाएं की जाने लगीं। विपक्ष भी इस दबाव में आ गया कि यदि वे इससे अधिक की गारंटी नहीं देंगे, तो चुनावी दौड़ से बाहर हो जाएंगे। परिणाम यह हुआ कि दोनों मुख्य दलों के बीच ‘किसके पास ज्यादा खैरात बांटने का बजट है’ की होड़ मच गई।
- विकास बजट पर कैंची जब हर महीने हजारों करोड़ रुपये केवल सीधे नकद हस्तांतरण (डीबीटी) में खप जाते हैं, तो लोक निर्माण विभाग, स्वास्थ्य सेवाएं, उच्च शिक्षा और सिंचाई परियोजनाओं के बजट को चुपचाप फ्रीज कर दिया जाता है। सड़कें जर्जर हैं, ग्रामीण अस्पतालों में डॉक्टर नहीं हैं, लेकिन विज्ञापनों में सब ‘गुलाबी’ दिखाया जा रहा है।
- आत्मनिर्भरता बनाम निर्भरता नागरिकों को रोजगार, कौशल और उद्योग देकर आत्मनिर्भर बनाने के बजाय उन्हें सरकारी भत्ते का मोहताज बनाया जा रहा है ताकि हर महीने आने वाले संदेश पर उनका राजनीतिक रुझान तय हो सके।
2. कर्ज के दलदल में धंसता मध्य प्रदेश, आंकड़े जो खौफ पैदा करते हैं
राजनीतिक नारों की चमक-दमक के पीछे जब आप वित्त विभाग के बही-खातों को खोलते हैं, तो आंकड़े रोंगटे खड़े कर देने वाले हैं। मध्य प्रदेश आज देश के सबसे ज्यादा कर्जदार राज्यों की फेहरिस्त में शीर्ष पायदानों की तरफ तेजी से बढ़ रहा है।
| वित्तीय पैमाना | स्थिति और प्रभाव |
| कुल कर्ज का आकार | 5 लाख करोड़ रुपये के आंकड़े को पार कर चुका है और लगातार नए बॉन्ड जारी हो रहे हैं। |
| प्रति व्यक्ति कर्ज | आज प्रदेश में जन्म लेने वाला हर नवजात बच्चा सिर पर लगभग ₹50,000 से अधिक का कर्ज लेकर पैदा हो रहा है। |
| बजट का बड़ा हिस्सा ब्याज में | प्रदेश के कुल राजस्व का एक बहुत बड़ा हिस्सा केवल पुराने कर्जों का ब्याज चुकाने में जा रहा है, मूलधन तो दूर की बात है। |
| कर्ज लेकर घी पीने की नीति | सरकार पिछले ऋणों की किश्त चुकाने और दैनिक प्रशासनिक खर्चे चलाने के लिए रिजर्व बैंक से बार-बार ओवरड्राफ्ट और खुले बाजार से कर्ज उठा रही है। |
यदि कोई निजी कंपनी इस तरह लगातार कर्ज लेकर केवल मुफ्त उपहार बांटे और कोई उत्पादन न करे, तो बैंक उसे ‘एनपीए’ (NPA) घोषित कर दिवालिया अदालत में भेज देते हैं। मध्य प्रदेश की वित्तीय स्थिति भी उसी ढर्रे पर चल रही है। विशेषज्ञों का स्पष्ट मानना है कि यदि यही वित्तीय अराजकता जारी रही, तो वह दिन दूर नहीं जब कर्मचारियों के वेतन और पेंशन तक के लाले पड़ जाएंगे।
3. ध्रुवीकरण से जातिवाद तक, सत्ता बचाने के बदलते राजनीतिक पैंतरे
मध्य प्रदेश की राजनीति को यदि पिछले दो दशकों के चश्मे से देखा जाए, तो सत्ता में बने रहने के लिए मुद्दों का व्यवस्थित रूपांतरण किया गया है।
पहला चरण: धार्मिक ध्रुवीकरण
लंबे समय तक सत्ता की चाबी धार्मिक भावनाओं के दोहन में खोजी गई। ‘हिंदू बनाम मुस्लिम’ की बहस को हर चुनाव से ठीक पहले धार दी जाती रही। विकास के बुनियादी सवालों, कुपोषण, बेरोजगारी और बदहाल खेती के मुद्दों को आस्था और राष्ट्रवाद के शोर में दबा दिया गया। जब तक यह दांव शत-प्रतिशत काम करता रहा, तब तक किसी आर्थिक सुधार की चिंता नहीं की गई।
दूसरा चरण: जातिगत बिखराव और आरक्षण का नया मकड़जाल
जब जनता धार्मिक नारों से ऊबने लगी और जमीनी हकीकत (महंगाई, बेरोजगारी) भारी पड़ने लगी, तो सत्ता की प्रयोगशाला से नया नुस्खा निकाला गया—जातिगत ध्रुवीकरण।
- शासकीय नियुक्तियों, पदोन्नति (प्रमोशन) और प्रशासनिक व्यवस्था में नियमों को इस तरह उलझाया गया कि समाज में आपसी अविश्वास बढ़े।
- जातियों के अलग-अलग सम्मेलन बुलाकर घोषणाओं की झड़ी लगाई गई, ताकि एकजुट होकर सरकार से सवाल पूछने वाला समाज अपने-अपने जातीय दायरों में बंट जाए।
- ‘बांटो और राज करो’ की यह रणनीति तात्कालिक चुनावी लाभ तो दे देती है, लेकिन समाज के ताने-बाने को दीर्घकालिक नुकसान पहुंचाती है।
4. भ्रष्टाचार का संस्थागत स्वरूप और प्रशासनिक विफलता
यह आरोप केवल राजनीतिक नहीं है कि भ्रष्टाचार का स्तर कई गुना बढ़ चुका है। मध्य प्रदेश में आज भ्रष्टाचार नीचे से ऊपर तक संस्थागत हो चुका है। मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री कार्यालय से लेकर अफसर तक यह भ्रष्टाचार कूट-कूट कर भरा है
घोटालों की अंतहीन फेहरिस्त
- व्यापमं से लेकर पटवारी भर्ती तक: मध्य प्रदेश में कोई भी भर्ती परीक्षा बिना विवाद, पेपर लीक या फर्जीवाड़े के पूरी नहीं हो पाती। लाखों युवा सालों-साल भोपाल, इंदौर, ग्वालियर और जबलपुर के कमरों में बैठकर तैयारी करते हैं, लेकिन नौकरियां सत्ता और दलालों के गठजोड़ की भेंट चढ़ जाती हैं।
- निर्माण कार्यों में कमीशनराज: ग्रामीण सड़कों से लेकर बड़े फ्लाईओवरों तक, निर्माण के कुछ ही महीनों बाद डामर बह जाता है और पुलों में दरारें आ जाती हैं। ठेकेदारों और अधिकारियों के गठजोड़ को राजनीतिक संरक्षण प्राप्त है।
- प्राकृतिक संसाधनों की खुली लूट: चंबल, नर्मदा, सोन और बेतवा नदियों की छाती चीरकर अवैध रेत खनन का काला कारोबार बेरोकटोक जारी है। खनिजों का दोहन प्रदेश के राजस्व के लिए कम, चुनिंदा सिंडिकेट्स की तिजोरियां भरने के लिए ज्यादा हो रहा है।
चंद हाथों में सिमटा प्रदेश
सत्ता का विकेंद्रीकरण कागजों में है, हकीकत यह है कि पूरा प्रदेश चंद प्रभावशाली राजनेताओं, उनके चहेते अफसरों और सिंडिकेट माफियाओं के इशारे पर चल रहा है। आम कार्यकर्ता और आम जनता केवल रैलियों में भीड़ जुटाने का साधन बनकर रह गए हैं।
5. विचारधारा की आड़ में सत्ता का खेल
सवाल यह भी उठता है कि इतने वित्तीय कुप्रबंधन और सामाजिक असंतोष के बावजूद सत्ताधारी दल बार-बार वापसी कैसे कर लेता है?
इसके पीछे एक अत्यंत सुगठित और व्यापक संगठनात्मक ढांचा काम करता है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) और उससे जुड़े दर्जनों अनुषांगिक संगठनों का जमीनी नेटवर्क हर चुनाव में सत्ता विरोधी लहर (एंटी-इनकंबेंसी) को दबाने के लिए पूरी ताकत झोंक देता है।
- बूथ स्तर पर कार्यकर्ताओं की लंबी कतार, पन्ना प्रमुखों की व्यवस्था और संसाधनों का अकूत भंडार चुनाव को ‘मुद्दों की लड़ाई’ से हटाकर ‘प्रबंधन की लड़ाई’ में तब्दील कर देता है।
- चुनावों के दौरान पानी की तरह बहाया जाने वाला धन और प्रशासनिक तंत्र का खुला दुरुपयोग चुनावी नतीजों को प्रभावित करने में निर्णायक भूमिका निभाता है।
- जनता यह समझ ही नहीं पाती कि जिसे वे अपनी चुनी हुई सरकार मान रहे हैं, उसका रिमोट कंट्रोल पर्दे के पीछे बैठे उन संगठनों के पास है जिनकी जनता के प्रति कोई सीधी संवैधानिक जवाबदेही नहीं है।
6. विपक्ष का आत्मसमर्पण और लोकतंत्र का संकट
मध्य प्रदेश के इस वर्तमान संकट के लिए यदि सत्तापक्ष जिम्मेदार है, तो मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस भी अपनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकता।
विपक्ष का काम केवल यह नहीं होता कि वह सत्तापक्ष के दावों की नकल करे। जब भाजपा ने खैरात बांटने की नीति शुरू की, तब विपक्ष का नैतिक और लोकतांत्रिक कर्तव्य था कि वह इसके वित्तीय खतरों को जनता के सामने उजागर करता। इसके बजाय, विपक्ष ने भी उसी ढर्रे पर चलकर ‘हम उनसे 500 रुपये ज्यादा देंगे’ का नैरेटिव गढ़ लिया।
- मुद्दों पर संघर्ष का अभाव: युवाओं की बेरोजगारी, किसानों की उपज का उचित दाम, बदहाल स्वास्थ्य व्यवस्था और बढ़ता कर्ज—ये वे मुद्दे थे जिन पर एक सशक्त जन-आंदोलन खड़ा किया जा सकता था।
- रणनीतिक दिवालियापन: विपक्ष वैचारिक रूप से सत्ताधारी दल के चक्रव्यूह में उलझ कर रह गया। जब आप उसी पिच पर खेलने उतरते हैं जो आपके विरोधी ने तैयार की है, तो हार लगभग तय होती है। परिणाम यह है कि प्रदेश की जनता खुद को एक ऐसे दोराहे पर पाती है जहां दोनों तरफ एक ही जैसी नीतियों का अंबार है।
जागने का वक्त, वरना देर हो जाएगी
मध्य प्रदेश आज एक निर्णायक मोड़ पर खड़ा है। यह लड़ाई किसी एक पार्टी के सत्ता में आने या दूसरी के जाने की नहीं है; यह सवाल मध्य प्रदेश के अस्तित्व और उसकी आने वाली पीढ़ियों के भविष्य का है।
यदि मुफ्त की रेवड़ियों, जातिगत जहर और धार्मिक उन्माद के दम पर ही चुनाव जीते जाते रहे, तो आने वाले समय में:
- प्रदेश का खजाना पूरी तरह खाली हो जाएगा और बुनियादी विकास ठप पड़ जाएगा।
- युवाओं के हाथ में डिग्री तो होगी, लेकिन रोजगार के नाम पर केवल राजनीतिक रैलियों के झंडे होंगे।
- आर्थिक पतन अंततः सामाजिक अशांति और अपराध में वृद्धि का कारण बनेगा।
लोकतंत्र में जनता केवल ‘वोट बैंक’ या ‘लाभार्थी’ नहीं होती, वह सरकार की मालिक होती है। जब तक मध्य प्रदेश का जागरूक नागरिक, बुद्धिजीवी, पत्रकार और युवा इन लुभावने पैंतरों को नकार कर सीधे सवाल नहीं पूछेगा—“हमारे स्कूलों की हालत कब सुधरेगी? अस्पतालों में दवाएं कब मिलेंगी? भर्तियां निष्पक्ष कब होंगी? और हमारे सिर पर लदा कर्ज कब उतरेगा?”—तब तक यह लूट और यह भ्रमजाल यूं ही चलता रहेगा।
ब्रांडवाणी समाचार प्रदेश की जनता को इस खतरे से आगाह करना अपना परम राष्ट्रीय और सामाजिक कर्तव्य समझता है। सच कड़वा हो सकता है, लेकिन इसे सामने लाना ही निष्पक्ष पत्रकारिता का धर्म है।








