
भोपाल (ब्रांडवाणी समाचार)। मध्य प्रदेश में विकास के दावों और जमीनी हकीकत के बीच की खाई लगातार चौड़ी होती जा रही है। प्रदेश की वर्तमान प्रशासनिक और राजनीतिक व्यवस्था अब ‘कर्ज लो और रेवड़ियां बांटो’ की नीति तक सीमित नजर आ रही है। जमीनी स्तर पर भ्रष्टाचार का आलम यह है कि बिना ‘ऊपरी चढ़ावे’ के वैध फाइलें भी टेबल दर टेबल धूल फांक रही हैं। सरकारी तंत्र की बढ़ती व्यक्तिगत मांगों और सुविधा शुल्क की अंधी दौड़ में ईमानदार व्यापारी और स्थानीय निवेशक बुरी तरह पिस रहे हैं, जबकि नेता और अफसरशाही बेलगाम मौज में हैं।
इन्वेस्टर्स समिट, करोड़ों का तमाशा, धरातल पर 40 फीसदी भी नहीं
हर कुछ महीनों में प्रदेश में भव्य ‘ग्लोबल इन्वेस्टर्स समिट’ (GIS) और रीजनल कॉन्क्लेव आयोजित किए जाते हैं। इन आयोजनों के नाम पर जनता के खून-पसीने की गाढ़ी कमाई और कर्ज के करोड़ों रुपये पानी की तरह बहा दिए जाते हैं।
- 23 सालों का जमीनी हिसाब: विगत दो दशकों से अधिक समय में जितने भी लाखों करोड़ के एमओयू (MoU) साइन किए गए, यदि उनका निष्पक्ष ऑडिट कराया जाए तो सच्चाई यह सामने आती है कि 40 फीसदी निवेश भी धरातल पर यूनिट्स के रूप में स्थापित नहीं हो सका।
- ब्याज और घूस का गणित: निवेशक भली-भांति जानते हैं कि जमीन पर उद्योग लगाने में जितनी वास्तविक लागत नहीं आती, उससे कहीं अधिक सरकारी दफ्तरों के चक्कर काटने, विलंब से बढ़ते बैंक ब्याज और हर टेबल पर चढ़ावे में खर्च हो जाता है।
चैंबर-दर-चैंबर हाजिरी, न देने पर ‘चरित्र हनन‘ का खेल
उद्योग लगाने के इच्छुक उद्यमियों को हर छोटे-बड़े प्रशासनिक चैंबर में हाथ जोड़ने पड़ते हैं। इसके बावजूद फाइल पास होगी या अनिश्चितकाल के लिए लटका दी जाएगी, इसकी कोई गारंटी नहीं है।
व्यवस्था का सबसे स्याह पहलू यह है कि यदि कोई उद्यमी या उसका प्रतिनिधि अनुचित मांगों और ‘कट मनी’ देने से इनकार कर दे, तो अफसर और नेताओं का गठजोड़ उनके खिलाफ ही लामबंद हो जाता है। बाहर जाकर संबंधित उद्यमी और उसके सहयोगियों की साख खराब की जाती है और उन्हें व्यवस्था का खलनायक साबित करने की कोशिश की जाती है। अफ़शारशाही इस हद तक हावी है कि अगली बार आपको ना मिलता है ना फोन उठाते हैं और कान के इतने कच्चे होते हैं कि दूसरे की बातें पर मिलना पसंद नहीं करते है इस दमघोंटू माहौल से तंग आकर कई निवेशक मध्य प्रदेश छोड़ पड़ोसी राज्यों (जैसे गुजरात, महाराष्ट्र और राजस्थान) का रुख कर रहे हैं, जहां प्रक्रियाओं में पारदर्शिता और उद्योग-अनुकूल नीतियां उपलब्ध हैं।
लच्छेदार भाषण बनाम बदहाल खजाना, कब जागेगी जनता?
बीजेपी प्रवक्ता टीवी और मंचों पर लच्छेदार भाषणों और घुमावदार आंकड़ों से चाहे जितना भी भ्रम फैला लें, पर हकीकत यही है कि राज्य का औद्योगिक ढांचा अफ़सरशाही के भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ चुका है। यह बात वह खुद भी जानते हैं पर बीजेपी प्रवक्ता पद की चाहत मे वो भी इस सच को झूठ मे बदल देते हैं।
अब सवाल यह उठता है कि क्या प्रदेश की जनता और औद्योगिक वर्ग इस प्रशासनिक अराजकता के खिलाफ आवाज उठाएगा, या फिर सरकारी पीआर और खोखले दावों के पीछे सच हमेशा के लिए दबता रहेगा? जब तक जवाबदेही तय नहीं होगी, तब तक कर्ज और भ्रष्टाचार का यह पहिया आम जनता को गर्दिश में धकेलता रहेगा।








