
भोपाल।
मध्य प्रदेश की सियासत और अर्थनीति इस समय एक अभूतपूर्व दोराहे पर खड़ी है। करीब 9 करोड़ की अनुमानित आबादी वाले इस राज्य में सरकारी खजाने का मुंह ‘मुफ्त और प्रत्यक्ष नकद अंतरण’ (रेवड़ी संस्कृति) की ओर ऐसा खुला है कि विकास के बुनियादी ढांचे और रोजगार सृजन के मुद्दे हाशिये पर चले गए हैं। लगभग 23 वर्षों से (15 महीने के अल्पकालिक अंतराल को छोड़कर) सत्ता पर काबिज भारतीय जनता पार्टी की नीतियों पर अब करदाता, अर्थशास्त्री और आम नागरिक गंभीर सवाल उठा रहे हैं, क्या सरकार वास्तव में आत्मनिर्भर मध्य प्रदेश बना रही है, या फिर ‘कर्ज लेकर घी पीने’ की नीति से प्रदेश को आर्थिक दिवालियापन की कगार पर धकेल रही है?
1. 9 करोड़ की आबादी और 5.3 करोड़ ‘मुफ्त राशन‘ के मोहताज, विकास का यह कैसा मॉडल?
राज्य की जनसांख्यिकी और कल्याणकारी आंकड़ों का विश्लेषण चौंकाने वाला विरोधाभास पेश करता है:
- राज्य में स्वास्थ्य मंत्रालय के अनुमानों के अनुसार लगभग 9 करोड़ नागरिक हैं।
- इनमें से 5.30 करोड़ से अधिक लोग (लगभग 60% आबादी) हर महीने 5 किलो मुफ्त सरकारी राशन (पीएम गरीब कल्याण अन्न योजना) पर निर्भर हैं।
- 1.27 करोड़ महिलाएं हर महीने ‘लाड़ली बहना’ योजना के तहत नकद राशि पा रही हैं, जिस पर हर साल करीब 18,000 से 22,000 करोड़ रुपये खर्च हो रहे हैं।
- इसके साथ ही 48 लाख लाड़ली लक्ष्मी, 36 लाख वृद्धावस्था पेंशनर्स, 40 लाख उज्ज्वला रिफिल लाभार्थी और 1.5 करोड़ संबल कार्डधारक सरकारी मदद के दायरे में हैं।
बड़ा सवाल, यदि दो दशकों में विकास की अविरल धारा बही है, तो राज्य की आधी से अधिक आबादी आज भी मुफ्त के 5 किलो अनाज और ₹1250 की मासिक मदद के बिना जीने में असमर्थ क्यों है? क्या यह गरीबी मिटाने की नीति है या नागरिकों को सरकारी इमदाद का आदी बनाकर वोट बैंक सुरक्षित रखने का उपक्रम?
2. चंद लाख करदाताओं पर 9 करोड़ का बोझ, मध्यम वर्ग में भारी आक्रोश
मध्य प्रदेश में आयकर भरने वाले वास्तविक करदाताओं की संख्या कुल आबादी का मात्र 3 से 4 प्रतिशत (लगभग 25 से 30 लाख) है। इनमें से भी व्यक्तिगत स्तर पर प्रभावी आयकर देने वालों का दायरा और सीमित है।
- एक तरफ नौकरीपेशा और छोटे कारोबारी अपनी मेहनत की कमाई से भारी-भरकम प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष कर (GST, पेट्रोल-डीजल पर सेस, स्टांप ड्यूटी) चुका रहे हैं।
- दूसरी तरफ, उन्हें न तो टूटी सड़कों से राहत मिल रही है, न ही स्तरीय सरकारी स्कूल या अस्पताल।
- करदाताओं का कहना है कि उनके टैक्स का पैसा उद्योगों को बढ़ावा देने, युवाओं को स्थायी नौकरियां देने और अधोसंरचना निर्माण में लगने के बजाय विशुद्ध रूप से चुनावी लाभ वाली खैरात बांटने में झोंका जा रहा है।
3. 4.65 लाख करोड़ से अधिक का कर्ज, बजट से भी बड़ा हुआ उधारी का पहाड़
मध्य प्रदेश की वित्तीय स्थिति का सबसे चिंताजनक पहलू इसका अनियंत्रित कर्ज है:
- वर्तमान में मध्य प्रदेश पर कुल कर्ज का बोझ ₹4.65 लाख करोड़ के पार निकल चुका है, जो कि राज्य के कुल वार्षिक बजट के आकार के लगभग बराबर या उससे भी अधिक हो चुका है।
- आंकड़े बताते हैं कि सरकार अपने रोजमर्रा के खर्चों और योजनाओं की किस्तें चुकाने के लिए औसतन ₹100 करोड़ से ₹125 करोड़ प्रतिदिन का नया कर्ज बाजार से उठा रही है।
- बजट का एक बड़ा हिस्सा केवल पुराने कर्ज का ब्याज चुकाने में स्वाहा हो रहा है। कैग और वित्तीय विशेषज्ञ लगातार आगाह कर रहे हैं कि राज्य का राजकोषीय घाटा खतरनाक स्तर की ओर बढ़ रहा है।
4. रोजगार के साधन नदारद, खाली पदों पर लटके ताले
मुफ्त योजनाओं के शोर में युवाओं का भविष्य पूरी तरह उपेक्षित नजर आ रहा है:
- राज्य में लाखों शिक्षित युवा भर्ती परीक्षाओं (पटवारी, शिक्षक पात्रता, पुलिस आरक्षक, MPPSC) के घपलों, पेपर लीक और लटकी हुई प्रक्रियाओं से त्रस्त हैं।
- ‘सीखो-कमाओ’ जैसी योजनाओं में लाखों युवाओं ने पंजीयन कराया, लेकिन उन्हें स्थायी रोजगार या औद्योगिक प्लेसमेंट के बजाय नाममात्र के स्टाइपेंड के भ्रम में रखा गया।
- नए कारखानों और विनिर्माण इकाइयों के अभाव में ग्रामीण व कस्बाई युवा शहरों में दिहाड़ी मजदूरी या फूड डिलीवरी बॉय बनने को मजबूर हैं।
5. क्या 23 साल का यही ‘ऐतिहासिक योगदान‘ है?
भाजपा सरकार दावा करती है कि उसने 2003 के ‘बीमारू राज्य’ को सड़कों और बिजली के मामले में आगे बढ़ाया है। लेकिन निष्पक्ष मूल्यांकन बताता है कि पिछले 23 वर्षों के लंबे कार्यकाल के बाद भी राज्य एक स्थायी आर्थिक तंत्र नहीं बना सका।
मुफ्त बांटने की राजनीति ने समाज में काम करने की ललक और उत्पादकता पर भी गहरी चोट पहुंचाई है। उद्योगों और कृषि क्षेत्र को मजदूर नहीं मिल रहे हैं, क्योंकि नकद सहायता और मुफ्त राशन ने एक कृत्रिम संतोष की स्थिति पैदा कर दी है, जबकि वास्तविक गरीबी, कुपोषण और बेरोजगारी जस की तस बनी हुई है।
ब्रांडवाणी नजरिया
कल्याणकारी राज्य का कर्तव्य कमजोर वर्ग को संबल देना अवश्य है, लेकिन जनता के पैसे से सत्ता की कुर्सी बचाना और भावी पीढ़ियों को कर्ज के दलदल में धकेलना न तो सुशासन है और न ही विकास। यदि मध्य प्रदेश को सचमुच ‘आत्मनिर्भर’ बनाना है, तो सरकार को खैरात बांटने की होड़ छोड़ रोजगार, उद्योग और वास्तविक परिसंपत्ति निर्माण की जमीन पर उतरना होगा। अन्यथा, कर्ज की बैसाखियों पर दौड़ रही यह व्यवस्था कभी भी लड़खड़ा सकती है।






