‘कर्ज’ के दम पर ‘मुफ्त’ की सियासत, क्या 23 वर्षों के शासन के बाद भी आत्मनिर्भर नहीं बन पाया मध्य प्रदेश?

भोपाल।

मध्य प्रदेश की सियासत और अर्थनीति इस समय एक अभूतपूर्व दोराहे पर खड़ी है। करीब 9 करोड़ की अनुमानित आबादी वाले इस राज्य में सरकारी खजाने का मुंह ‘मुफ्त और प्रत्यक्ष नकद अंतरण’ (रेवड़ी संस्कृति) की ओर ऐसा खुला है कि विकास के बुनियादी ढांचे और रोजगार सृजन के मुद्दे हाशिये पर चले गए हैं। लगभग 23 वर्षों से (15 महीने के अल्पकालिक अंतराल को छोड़कर) सत्ता पर काबिज भारतीय जनता पार्टी की नीतियों पर अब करदाता, अर्थशास्त्री और आम नागरिक गंभीर सवाल उठा रहे हैं, क्या सरकार वास्तव में आत्मनिर्भर मध्य प्रदेश बना रही है, या फिर ‘कर्ज लेकर घी पीने’ की नीति से प्रदेश को आर्थिक दिवालियापन की कगार पर धकेल रही है?

1. 9 करोड़ की आबादी और 5.3 करोड़ ‘मुफ्त राशन‘ के मोहताज, विकास का यह कैसा मॉडल?

राज्य की जनसांख्यिकी और कल्याणकारी आंकड़ों का विश्लेषण चौंकाने वाला विरोधाभास पेश करता है:

बड़ा सवाल, यदि दो दशकों में विकास की अविरल धारा बही है, तो राज्य की आधी से अधिक आबादी आज भी मुफ्त के 5 किलो अनाज और ₹1250 की मासिक मदद के बिना जीने में असमर्थ क्यों है? क्या यह गरीबी मिटाने की नीति है या नागरिकों को सरकारी इमदाद का आदी बनाकर वोट बैंक सुरक्षित रखने का उपक्रम?

2. चंद लाख करदाताओं पर 9 करोड़ का बोझ, मध्यम वर्ग में भारी आक्रोश

मध्य प्रदेश में आयकर भरने वाले वास्तविक करदाताओं की संख्या कुल आबादी का मात्र 3 से 4 प्रतिशत (लगभग 25 से 30 लाख) है। इनमें से भी व्यक्तिगत स्तर पर प्रभावी आयकर देने वालों का दायरा और सीमित है।

3. 4.65 लाख करोड़ से अधिक का कर्ज, बजट से भी बड़ा हुआ उधारी का पहाड़

मध्य प्रदेश की वित्तीय स्थिति का सबसे चिंताजनक पहलू इसका अनियंत्रित कर्ज है:

4. रोजगार के साधन नदारद, खाली पदों पर लटके ताले

मुफ्त योजनाओं के शोर में युवाओं का भविष्य पूरी तरह उपेक्षित नजर आ रहा है:

5. क्या 23 साल का यही ‘ऐतिहासिक योगदान‘ है?

भाजपा सरकार दावा करती है कि उसने 2003 के ‘बीमारू राज्य’ को सड़कों और बिजली के मामले में आगे बढ़ाया है। लेकिन निष्पक्ष मूल्यांकन बताता है कि पिछले 23 वर्षों के लंबे कार्यकाल के बाद भी राज्य एक स्थायी आर्थिक तंत्र नहीं बना सका।

मुफ्त बांटने की राजनीति ने समाज में काम करने की ललक और उत्पादकता पर भी गहरी चोट पहुंचाई है। उद्योगों और कृषि क्षेत्र को मजदूर नहीं मिल रहे हैं, क्योंकि नकद सहायता और मुफ्त राशन ने एक कृत्रिम संतोष की स्थिति पैदा कर दी है, जबकि वास्तविक गरीबी, कुपोषण और बेरोजगारी जस की तस बनी हुई है।

ब्रांडवाणी नजरिया

कल्याणकारी राज्य का कर्तव्य कमजोर वर्ग को संबल देना अवश्य है, लेकिन जनता के पैसे से सत्ता की कुर्सी बचाना और भावी पीढ़ियों को कर्ज के दलदल में धकेलना न तो सुशासन है और न ही विकास। यदि मध्य प्रदेश को सचमुच ‘आत्मनिर्भर’ बनाना है, तो सरकार को खैरात बांटने की होड़ छोड़ रोजगार, उद्योग और वास्तविक परिसंपत्ति निर्माण की जमीन पर उतरना होगा। अन्यथा, कर्ज की बैसाखियों पर दौड़ रही यह व्यवस्था कभी भी लड़खड़ा सकती है।

  • Shruti Soni

    ब्रांडवाणी समाचार

    अनुभवी पत्रकार। हर दिन ताज़ा और सटीक खबरों के साथ आपकी सेवा में। निष्पक्ष रिपोर्टिंग और गहराई से तथ्य प्रस्तुत करना मेरी पहचान है।

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