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मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में कानून और नियमों की दोहरी परिभाषा पर आज एक बड़ा सवाल खड़ा हो गया है। एक तरफ वह आम नागरिक है, जिसे अपने आशियाने की एक ईंट रखने के लिए ग्रीन जोन, रेड जोन, मास्टर प्लान और नगर निगम के अनगिनत चक्कर काटने पड़ते हैं। वहीं दूसरी तरफ सत्ताधारी दल के लिए क्या कानून के सारे पन्ने पलट दिए जाते हैं?
भोपाल में बन रहे भारतीय जनता पार्टी के नए प्रदेश कार्यालय को लेकर अब गंभीर सवाल उठने लगे हैं। क्या यह भव्य इमारत ग्रीन बेल्ट और पर्यावरण के नियमों को ताक पर रखकर खड़ी की जा रही है? क्या जनता की आवाजाही के लिए बनी सर्विस लेन अब पार्टी कार्यालय की निजी जागीर और मुख्य द्वार बनकर रह जाएगी? फ्लाईओवर और ब्रिज के सामने इतनी ऊंचाई का निर्माण किस नियम पुस्तिका के तहत सही ठहराया गया और कलेक्टर, कमिश्नर, वल्लभ भवन में बैठे किन आला अधिकारियों ने आंख मूंदकर फाइलों पर हस्ताक्षर किए? देखिए हमारी यह विशेष पड़ताल।”
राजधानी भोपाल की मुख्य सड़क पर आकार ले रहा यह विशाल परिसर सत्ता के नए केंद्र के रूप में देखा जा रहा है। लेकिन इस कंक्रीट के ढांचे की नींव में कई ऐसे सवाल दबे हैं, जिनका जवाब प्रशासन देने से बच रहा है। भोपाल के मास्टर प्लान और हरित क्षेत्र संरक्षण के दावों के बीच सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या इस निर्माण के लिए ग्रीन जोन के मानकों से समझौता किया गया है? पर्यावरणविदों और जानकारों का कहना है कि जिस शहर में हरियाली बचाने के लिए एनजीटी लगातार सख्त निर्देश दे रहा है, वहां सत्ता के रसूख के आगे पर्यावरण नियम गौण क्यों हो जाते हैं?
दूसरा गंभीर संकट आम जनता के आवागमन और यातायात का है। मुख्य मार्ग से सटी जिस सर्विस लेन का उद्देश्य ट्रैफिक के दबाव को कम करना और स्थानीय नागरिकों को सुगम रास्ता देना था, आशंका जताई जा रही है कि वह सर्विस लेन भविष्य में पार्टी कार्यालय का प्रवेश द्वार बनकर सिमट जाएगी। राजनीतिक कार्यक्रमों, प्रदर्शनों और चुनावी दौर में जब यहां हजारों कार्यकर्ताओं और वाहनों का जमावड़ा होगा, तब आम राहगीर, एंबुलेंस और रोजमर्रा के मुसाफिर कहां जाएंगे? पहले से ही व्यस्त इस मार्ग पर फ्लाईओवर/ब्रिज के मुहाने पर इतनी ऊंचाई और फैलाव का निर्माण क्या भविष्य में भीषण ट्रैफिक जाम और दुर्घटनाओं का कारण नहीं बनेगा?
अब आते हैं उस तंत्र पर जो इन सब की जड़ है मंत्रालय यानी वल्लभ भवन। प्रदेश का एक आम किसान या व्यापारी जब अपने छोटे से भूखंड की एनओसी लेने जाता है, तो उसे नियमों का लंबा पहाड़ दिखा दिया जाता है। उसे बताया जाता है कि जमीन ग्रीन जोन में है, मास्टर प्लान का उल्लंघन है, हाइट पर पाबंदी है। लेकिन सत्ताधारी दल के कार्यालय के लिए वे तमाम बंदिशें अचानक कैसे गायब हो गईं?
नगर निगम, टीएंडसीपी (टाउन एंड कंट्री प्लानिंग) और संबंधित प्रशासनिक विभागों के वे कौन से जिम्मेदार अधिकारी हैं, जिन्होंने इन तकनीकी और पर्यावरणीय आपत्तियों को नजरअंदाज कर अनुमति पत्र जारी कर दिए? क्या प्रशासनिक अमला निष्पक्ष लोकसेवक होने के बजाय केवल राजनीतिक दबाव में फाइलों को आगे बढ़ाने का जरिया बन चुका है?
ब्रांडवाणी समाचार के तीखे सवाल:
- पर्यावरण का दोमुंहा पैमाना क्यों? क्या मास्टर प्लान और ग्रीन जोन के नियम केवल गरीब और मध्यमवर्गीय जनता के आशियानों पर बुलडोजर चलाने के लिए हैं?
- सार्वजनिक मार्ग पर कब्जा क्यों? क्या आम जनता के टैक्स से बनी सर्विस लेन राजनीतिक वीआईपी मूवमेंट की भेंट चढ़ जाएगी?
- सुरक्षा और ऊंचाई के मानक: ब्रिज और फ्लाईओवर के ठीक सामने इतनी ऊंची और व्यापक संरचना को अनुमति देते समय क्या भविष्य के ट्रैफिक ऑडिट को दरकिनार किया गया?
- जवाबदेही किसकी? वे कौन से अधिकारी हैं जिन्होंने अपनी कुर्सी और पदस्थापना की खातिर (जिले से लेकर वल्लभ भवन) जनहित के नियमों को दरकिनार कर हरी झंडी दी?
सरकारें आती-जाती रहती हैं, लेकिन संविधान और प्रशासनिक व्यवस्था की निष्पक्षता ही लोकतंत्र की रीढ़ होती है। वल्लभ भवन के एयर-कंडीशंड कमरों में बैठे नीति-नियंताओं को यह समझना होगा कि जनता सब देख रही है। सत्ता की शरण में जाकर जनसुविधाओं और पर्यावरण को बंधक बनाने का यह खेल कब तक चलेगा, ‘ब्रांडवाणी समाचार’ इस मुद्दे पर लगातार जवाब मांगता रहेगा।






