
सार
देवेश शर्मा|मैहर के पूर्व विधायक नारायण त्रिपाठी ने मध्यप्रदेश सरकार के हालिया कैबिनेट फैसलों को लेकर विंध्य और बुंदेलखंड की उपेक्षा का आरोप लगाया है। उन्होंने कहा कि राजीव गांधी प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय को तीन हिस्सों में बांटने और आयुर्विज्ञान संस्थान जबलपुर के अधिकार क्षेत्र में बदलाव के बावजूद विंध्य-बुंदेलखंड को अलग पहचान नहीं दी गई। त्रिपाठी ने कहा कि क्षेत्र के युवाओं को शिक्षा, रोजगार और स्वास्थ्य के लिए दूसरे क्षेत्रों पर निर्भर होना पड़ रहा है। उन्होंने चेतावनी दी कि विंध्य-बुंदेलखंड के अधिकारों के लिए अब बड़ी लड़ाई का आगाज किया जाएगा।
विस्तार
मैहर। मैहर के पूर्व विधायक नारायण त्रिपाठी ने मध्यप्रदेश में विंध्य और बुंदेलखंड की कथित उपेक्षा को लेकर प्रदेश सरकार पर निशाना साधा है। उन्होंने कहा कि विंध्यप्रदेश के मध्यप्रदेश में विलय के बाद से ही विंध्य और बुंदेलखंड के साथ लगातार छलावा होता रहा है। उनका आरोप है कि इन क्षेत्रों के युवाओं, संस्कृति और विकास की अपेक्षित स्तर पर चिंता नहीं की गई।
नारायण त्रिपाठी ने कहा कि रीवा कभी विंध्यप्रदेश की राजधानी हुआ करता था, लेकिन राजनीतिक षडयंत्रों के कारण इसके अस्तित्व और क्षेत्रीय पहचान को कमजोर किया गया। उन्होंने कहा कि आज विंध्य का युवा बेरोजगारी और पलायन की समस्या से जूझ रहा है। शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी मूलभूत सुविधाओं के लिए भी लोगों को दूसरे जिलों या प्रदेशों पर निर्भर होना पड़ता है।
पूर्व विधायक ने मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की अध्यक्षता वाली कैबिनेट के हालिया फैसलों पर भी सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि राजीव गांधी प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय को तीन हिस्सों में बांटकर मालवा, मध्य भारत और महाकौशल के नाम दिए गए हैं। त्रिपाठी का कहना है कि यदि विश्वविद्यालय को क्षेत्रीय आधार पर विभाजित किया गया तो विंध्य और बुंदेलखंड को भी अलग पहचान दी जा सकती थी, लेकिन ऐसा नहीं किया गया।
उन्होंने आरोप लगाया कि विंध्य और बुंदेलखंड को महाकौशल के साथ जोड़कर इन दोनों क्षेत्रों को अलग पहचान से वंचित कर दिया गया। त्रिपाठी के मुताबिक, इससे क्षेत्र के विद्यार्थियों की शैक्षणिक जरूरतों और क्षेत्रीय पहचान से जुड़े सवाल खड़े होते हैं।
उन्होंने आयुर्विज्ञान संस्थान जबलपुर से जुड़े फैसले का भी उल्लेख किया। त्रिपाठी ने कहा कि पहले इस विश्वविद्यालय का दायरा पूरे मध्यप्रदेश तक था, लेकिन अब इसके अधिकार क्षेत्र में बदलाव किया गया है। उन्होंने कहा कि चंबल, मालवा और भोपाल क्षेत्र को उज्जैन से जोड़ने की दिशा में निर्णय लिया गया है, जबकि उज्जैन में नए संस्थान की स्थापना अभी घोषणा के स्तर पर है। उनका आरोप है कि जबलपुर का दायरा सीमित किए जाने के बावजूद विंध्य और बुंदेलखंड को उसके साथ ही रखा गया।
नारायण त्रिपाठी ने कहा कि दोनों संस्थान सीधे तौर पर प्रदेश के युवाओं और विद्यार्थियों से जुड़े हुए हैं। उनके अनुसार, विंध्य और बुंदेलखंड के विद्यार्थियों को अपने ही क्षेत्र में बेहतर शैक्षणिक सुविधाएं मिलनी चाहिए। उन्होंने सवाल उठाया कि यदि उज्जैन के विद्यार्थियों को उज्जैन में शिक्षा उपलब्ध कराने की सोच हो सकती है तो विंध्य और बुंदेलखंड के विद्यार्थियों के लिए भी क्षेत्र में संस्थानों और अवसरों का विस्तार क्यों नहीं किया जा सकता।
त्रिपाठी ने मुख्यमंत्री पर क्षेत्रीय असंतुलन को लेकर निशाना साधते हुए कहा कि मुख्यमंत्री पूरे मध्यप्रदेश के होते हैं, इसलिए उनके लिए प्रदेश के सभी क्षेत्रों की संस्कृति और विकास समान रूप से महत्वपूर्ण होना चाहिए। उन्होंने कहा कि केवल उज्जैन, मालवा, मध्यभारत या महाकौशल की क्षेत्रीय पहचान को महत्व देने के बजाय विंध्य और बुंदेलखंड की संस्कृति और हितों को भी समान महत्व मिलना चाहिए।
पूर्व विधायक ने मध्यप्रदेश के गठन के ऐतिहासिक संदर्भ का उल्लेख करते हुए कहा कि जिस दौर में मध्यप्रदेश का गठन हुआ, उस समय मध्यभारत और विंध्यप्रदेश जैसे अलग क्षेत्रीय अस्तित्व मौजूद थे। उनके अनुसार, बाद में मध्यभारत, मालवा और महाकौशल जैसे नामों को पहचान मिली, लेकिन विंध्य और बुंदेलखंड को आज भी उनकी अलग पहचान के अनुरूप स्थान नहीं मिला।
नारायण त्रिपाठी ने कहा कि आज युवाओं का दौर है और विंध्य के युवा अपने अधिकारों को लेकर जागरूक हैं। उन्होंने कहा कि क्षेत्र के युवाओं के हक, अधिकार और संस्कृति के साथ यदि राजनीतिक स्तर पर अन्याय हुआ है तो उसके खिलाफ आवाज उठाई जाएगी। उन्होंने चेतावनी दी कि विंध्य और बुंदेलखंड के अधिकारों के लिए बड़ी लड़ाई का आगाज किया जाएगा और क्षेत्र के साथ अन्याय स्वीकार नहीं किया जाएगा।
त्रिपाठी के इन आरोपों और बयानों पर प्रदेश सरकार या संबंधित विभाग की ओर से तत्काल कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया इस सामग्री में सामने नहीं आई है।
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