लोकतंत्र का चौथा स्तंभ: प्रेस स्वतंत्रता के पीछे छिपा पत्रकारों का संघर्ष

सुधीर चौकीकर:  लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कही जाने वाली पत्रकारिता 3 मई को प्रेस स्वतंत्रता के नारों के बीच सम्मानित जरूर होती है, लेकिन हकीकत में इसकी राह आज भी संघर्ष और जोखिम से भरी है। खबर लिखने वाली स्याही के पीछे छिपे दर्द और दबाव अक्सर दिखाई नहीं देते।

पत्रकार की स्वतंत्रता को चुनौती

जब कोई पत्रकार प्रभावशाली नेताओं या बड़े उद्योगपतियों से जुड़े मामलों की परतें खोलने की कोशिश करता है, तो उसके सामने अदृश्य दबावों का सिलसिला शुरू हो जाता है। आधी रात के फोन कॉल, चेतावनी भरे संदेश और प्रभावशाली लोगों का अहंकार, पत्रकार की स्वतंत्रता को चुनौती देता है। सच को सामने लाने की कोशिश कई बार व्यक्तिगत सुरक्षा के संकट में बदल जाती है।

समझौता करने से इनकार

सच प्रकाशित करने का परिणाम अक्सर सम्मान नहीं कानूनी नोटिस के रूप में सामने आता है। बड़े घरानों की कानूनी ताकत पत्रकारों को लंबी और जटिल प्रक्रियाओं में उलझा देती है, जिससे कई प्रतिभाशाली पत्रकार अपने करियर और भविष्य की कीमत चुका बैठते हैं। कई को अपनी नौकरी तक गंवानी पड़ती है क्योंकि उन्होंने समझौता करने से इनकार किया।

पत्रकारिता की कीमत जान

सबसे भयावह स्थिति तब होती है जब पत्रकारिता की कीमत जान देकर चुकानी पड़ती है। भ्रष्टाचार और सच्चाई को उजागर करने वाले कई पत्रकार संदिग्ध हादसों या हमलों में अपनी जान गंवा चुके हैं। उनके पीछे परिवार और अधूरी लड़ाई छूट जाती है, जिसे आगे बढ़ाने का साहस हर कोई नहीं जुटा पाता।

हर कदम पर जोखिम और असुरक्षा

यह स्थिति एक गंभीर सवाल खड़ा करती है कि क्या पत्रकारिता अब केवल एक पेशा बनकर रह गई है, जहां हर कदम पर जोखिम और असुरक्षा है। क्या सच की ताकत इतनी कमजोर हो गई है कि उसे दबाव और शक्ति के बल पर कुचल दिया जाए।

पत्रकारिता का भविष्य उन लोगों के संघर्ष पर टिका है जिन्होंने हर हाल में सच का साथ दिया। आज जरूरत है कि समाज और शासन मिलकर पत्रकारों की सुरक्षा को प्राथमिकता दें। एक सख्त और प्रभावी राष्ट्रीय कानून की मांग अब पहले से कहीं ज्यादा जरूरी हो गई है, ताकि सच की आवाज बिना डर के उठ सके और लोकतंत्र की नींव मजबूत बनी रहे।

(आमला क्षेत्र के सक्रिय युवा पत्रकार और विशेष स्तंभ लेखक)

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Manisha Gupta

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