
देश की राजनीति में राष्ट्रवाद और हिंदुत्व का ढोल पीटने वाले संगठनों के दोहरे चरित्र को लेकर आज एक बार फिर बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। हाल ही में सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे वरिष्ठ पत्रकारों के एक विश्लेषण और वरिष्ठ भाजपा/आरएसएस नेता राम माधव के बयानों ने कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। सवाल यह है कि जो संगठन कल तक पाकिस्तान के नाम पर देश में राष्ट्रवाद की राजनीति चमकाता था, आज अचानक उसके सुर क्यों बदल रहे हैं?
वरिष्ठ पत्रकार डॉ. राकेश पाठक के शो में उठी आवाज़ों और जनता के आक्रोश को देखें, तो ऐसा प्रतीत होता है कि भाजपा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) अब पाकिस्तान के साथ दोस्ती के नए झंडे गाड़ने की जुगत में हैं। आलोचकों का कहना है कि वैश्विक मंचों पर, विशेषकर अमेरिकी नेताओं जैसे डोनाल्ड ट्रंप के सामने भारतीय नेतृत्व की वह कड़क छवि गायब दिखती है, जिसकी उम्मीद की जाती थी। गिरगिराहट और लाचारी की इस कूटनीति के बीच, आरएसएस और भाजपा के नेता अब पाकिस्तान नीति पर देश से झूठ बोलकर एक नया ‘याराना’ स्थापित करने की कोशिश कर रहे हैं।
यह आक्रोश सिर्फ विदेश नीति तक सीमित नहीं है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के आंतरिक तंत्र और उसके द्वारा संचालित ‘सरस्वती विद्या मंदिर’ (शिशु मंदिर) स्कूलों के चरित्र पर भी गंभीर आरोप लग रहे हैं। ग्राउंड रिपोर्ट और जनभावनाओं के अनुसार, इन स्कूलों में पढ़ने वाले करोड़ों मासूम बच्चों से ‘वनवासी कल्याण आश्रम’ और अन्य सामाजिक कार्यों के नाम पर ‘1 किलो गेहूं और 1 किलो चावल’ जैसी सामग्रियां सालों से ली जाती रही हैं। आरोप है कि इस सेवाभाव की आड़ में कुछ निहित स्वार्थी तत्वों ने केवल अपने घर भरने का काम किया है, जबकि वास्तविक समाज कल्याण हाशिए पर रहा।
जिन स्कूलों को राष्ट्र निर्माण का केंद्र बताया जाता था, आज वहां से वास्तविक और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा दम तोड़ती नज़र आ रही है। दिन-रात मेहनत करके, बेहद कम संसाधनों में इन स्कूलों को सींचने वाले शिक्षकों की स्थिति आज बदतर हो चुकी है। हिंदुत्व और संस्कारों की बात करने वाला संघ प्रबंधन इन राष्ट्र-निर्माता शिक्षकों को ‘लेबर क्लास’ (मजदूर वर्ग) से भी ज्यादा बुरी परिस्थितियों में काम करने पर मजबूर कर रहा है। समय पर उचित वेतन या बुनियादी सुविधाएं देना तो दूर, शिक्षकों का मानसिक और आर्थिक शोषण चरम पर है।
“राष्ट्रवाद” का मुखौटा पहनकर अपनों का ही शोषण करने और विदेशी मोर्चों पर यू-टर्न लेने की यह नीति अब जनता के सामने बेनकाब हो रही है। ब्रांडवाणी समाचार पूछता है कि क्या यही वह राष्ट्र निर्माण है जिसका सपना देश को दिखाया गया था? जहां शिक्षक शोषित हैं, बच्चे वसूली का जरिया हैं, और विदेश नीति में सिर्फ दिखावा है।
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