
आज हम एक ऐसे गंभीर और संवेदनशील मुद्दे पर बात करने जा रहे हैं, जिस पर अक्सर बात करने से बचा जाता है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) द्वारा संचालित और प्रेरित ‘सरस्वती शिशु मंदिर’ और विद्या भारती के विद्यालय, जो कभी भारतीय संस्कृति, कम फीस और संस्कारयुक्त शिक्षा के प्रतीक माने जाते थे, आज धीरे-धीरे किस दिशा में जा रहे हैं? क्या शिक्षा का वह पवित्र विचार अब विशाल इमारतों और प्रशासनिक नियंत्रण के नीचे दब चुका है?

एक दौर था जब संघ के इन विद्यालयों में योग्य, निष्ठावान और समर्पित शिक्षक राष्ट्र निर्माण की भावना से बच्चों को पढ़ाते थे। लेकिन आज सवाल उठ रहे हैं कि क्या उन शिक्षकों की निष्ठा और मेहनत का उचित मूल्य उन्हें कभी मिला?
लाखों की संख्या में दिन-रात मेहनत करने वाले ये आचार्य और शिक्षिकाएँ, जिन्होंने अपने खून-पसीने से इन संस्थानों की साख बनाई, आज खुद को आर्थिक और मानसिक रूप से उपेक्षित महसूस कर रहे हैं। विद्यालय परिसर में लगातार नई और भव्य इमारतें तो खड़ी हो रही हैं, लेकिन उन इमारतों की नींव में लगे शिक्षकों के अधिकार और उचित मानदेय कहीं गायब होते दिख रहे हैं।
विपरीत राजनीतिक दलों और कांग्रेस पर हिंदुओं के शोषण का आरोप लगाने वाला और ‘हिंदू समरसता’ व ‘एकता’ की बात करने वाला संगठन खुद अपने ही संस्थानों में कार्य करने वाले लाखों हिंदू शिक्षकों की स्थिति पर मौन क्यों है?
जहाँ एक तरफ ‘नागरिक नहीं, ग्राहक बनाने’ के नए मॉडल्स और शिक्षा के व्यवसायीकरण पर सवाल उठ रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ संघ के अपने विद्यालयों का अधिकार क्षेत्र और नियंत्रण तो संघ-विद्या भारती के पास है, लेकिन शिक्षकों को मिलने वाला वेतन और सुरक्षा आज भी बेहद चिंताजनक स्तर पर है।
आज जो कुछ सवाल है जो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के लिए लगता है खड़े हो रहे हैं उनको मुख्य बिन्दुओं में देखने की आवश्यकता है
1. आलीशान इमारतें बनाम कम मानदेय: जब विद्यालयों का बुनियादी ढांचा इतना मजबूत और भव्य हो रहा है, तो शिक्षकों का आर्थिक स्तर क्यों नहीं सुधर रहा?
2. समरसता का विरोधाभास: क्या अपनों का ही शोषण करके ‘हिंदू समरसता’ और ‘राष्ट्र निर्माण’ का सपना पूरा हो सकता है?
3. योग्य शिक्षकों का पलायन: उचित मूल्यांकन और सम्मान न मिलने के कारण क्या सरस्वती शिशु मंदिर धीरे-धीरे अपने पतन की ओर बढ़ रहे हैं?
शिक्षा जब संस्कार से हटकर केवल परिसंपत्तियों और इमारतों के निर्माण तक सीमित हो जाती है, तो नुकसान सिर्फ संस्थान का नहीं, पूरे समाज का होता है। अगर समय रहते इन जमीनी शिक्षकों के शोषण को रोककर उन्हें उनकी मेहनत का वाजिब हक नहीं दिया गया, तो गौरवशाली इतिहास रखने वाले ये संस्थान केवल एक संरचना बनकर रह जाएँगे।
यह समय किसी पर केवल आरोप लगाने का नहीं, बल्कि आत्मचिंतन का है। जो संगठन समाज सुधार की बात करता है, उसे अपने ही प्रांगण में खड़े शिक्षकों के हक की आवाज सबसे पहले सुननी होगी।
आप इस मुद्दे पर क्या सोचते हैं? अपनी राय कमेंट सेक्शन में जरूर साझा करें।
बने रहिए ब्रांडवाणी समाचार के साथ। निष्पक्ष, निर्भीक और सत्य।
जय हिंद!
- saraswati-shishu-mandir-education-quality-teachers-special-report







