
महाराष्ट्र के सोलापुर जिले के तुलशी गांव में सिंचाई का पानी नहीं मिलने से नाराज ग्रामीणों ने गांव के बाहर ‘गांव बिकाऊ है’ के पोस्टर लगा दिए। ग्रामीणों का कहना है कि सीना-माढ़ा लिफ्ट सिंचाई योजना शुरू हुए करीब 25 साल हो चुके हैं, लेकिन योजना से उनके गांव को अब तक पानी नहीं मिला। लंबे समय से जारी जल संकट के बीच करीब 2,700 हेक्टेयर कृषि भूमि के बंजर होने का खतरा भी जताया गया है।
महाराष्ट्र के सोलापुर जिले में पानी का संकट अब किसानों के विरोध का बड़ा कारण बनता जा रहा है। माढ़ा क्षेत्र के तुलशी गांव में सिंचाई के पानी की मांग को लेकर ग्रामीणों ने ऐसा विरोध किया, जिसने प्रशासन और सरकार का ध्यान खींचा है। गांव में जगह-जगह ‘गांव बिकाऊ है’ के पोस्टर लगाए गए। ग्रामीणों का कहना है कि यह पोस्टर कोई मजाक नहीं, बल्कि वर्षों से चली आ रही समस्या और व्यवस्था के प्रति नाराजगी का प्रतीक है।
सिंचाई योजना से सिर्फ 9 किलोमीटर दूर, फिर भी पानी नहीं
तुलशी गांव की सबसे बड़ी परेशानी यह है कि गांव सीना-माढ़ा लिफ्ट सिंचाई योजना से महज करीब 9 किलोमीटर दूर है। यह योजना वर्ष 2000 में शुरू की गई थी। इसके बावजूद ग्रामीणों के मुताबिक तुलशी को अब तक इस योजना का लाभ नहीं मिला। आसपास के कई गांवों में जहां पर्याप्त पानी उपलब्ध होने के कारण किसान नकदी फसलों की खेती कर पा रहे हैं, वहीं तुलशी के किसानों को बारिश पर निर्भर रहना पड़ रहा है।
गांव के सरपंच शरद मोरे ने कहा कि पिछले करीब 25 वर्षों से ग्रामीण पानी की समस्या झेल रहे हैं। उनका कहना है कि ‘गांव बिकाऊ है’ का पोस्टर बाहरी लोगों को भले ही अजीब या मजेदार लगे, लेकिन गांव वालों के लिए यह उनकी परेशानी और गुस्से को सामने रखने का तरीका है।
जलाशय सूखे, जुलाई से टैंकरों के भरोसे ग्रामीण
तुलशी में इस समय हालात और गंभीर हो गए हैं। माढ़ा क्षेत्र के कई गांवों में लंबे समय से बारिश नहीं होने के कारण जलस्रोतों पर संकट गहरा गया है। तुलशी के जलाशयों में पानी बेहद कम है या कई जगह जलाशय सूख चुके हैं। कुओं और परकोलेशन टैंक में भी पर्याप्त पानी नहीं बचा है।
ग्रामीणों के अनुसार, गांव में जुलाई से ही टैंकरों के जरिए पानी पहुंचाया जा रहा है। ऐसे में सिंचाई के लिए पानी उपलब्ध नहीं होने का सीधा असर खेती पर पड़ रहा है। ग्रामीणों को डर है कि अगर स्थिति में जल्द सुधार नहीं हुआ तो मानसून के बाद उनकी बड़ी मात्रा में कृषि भूमि बंजर हो सकती है। अनुमान के मुताबिक करीब 2,700 हेक्टेयर जमीन प्रभावित होने का खतरा है।
सोलापुर में यह संकट सिर्फ तुलशी तक सीमित नहीं है। हालिया रिपोर्टों के मुताबिक जिले के कई हिस्सों में लंबे शुष्क दौर के कारण खरीफ फसलों पर भी गंभीर असर पड़ा है। कुछ इलाकों में किसानों को खड़ी फसल को चारे के रूप में इस्तेमाल करने तक की स्थिति का सामना करना पड़ रहा है।
गणेश चतुर्थी से शुरू किया था अनिश्चितकालीन उपवास
पानी की मांग को लेकर तुलशी के ग्रामीणों ने गणेश चतुर्थी के दिन अनिश्चितकालीन उपवास भी शुरू किया था। ग्रामीणों ने तहसीलदार को ज्ञापन सौंपकर अपनी मांगें रखीं। विरोध के दौरान ग्रामीणों की ओर से बेहद कड़ा रुख अपनाया गया और आत्मदाह की चेतावनी के साथ चुनाव बहिष्कार की बात भी कही गई।
ग्रामीणों का कहना है कि जब आसपास के क्षेत्रों में सिंचाई के लिए पानी उपलब्ध है, तो तुलशी को लगातार इससे वंचित क्यों रखा जा रहा है। उनका तर्क है कि पानी के अभाव में खेती प्रभावित होने के साथ गांव की आर्थिक स्थिति भी कमजोर हो रही है। इसका असर रोजगार और ग्रामीणों के भविष्य पर भी पड़ रहा है।
मंत्री के आश्वासन के बाद खत्म हुआ आंदोलन
लगातार विरोध के बाद मामला प्रशासन और राज्य सरकार तक पहुंचा। शुक्रवार को महाराष्ट्र के जल संसाधन मंत्री राधाकृष्ण विखे पाटिल ने ग्रामीणों से बातचीत की। मंत्री के हस्तक्षेप और समाधान का आश्वासन मिलने के बाद ग्रामीणों ने अपना विरोध प्रदर्शन समाप्त कर दिया।
प्रशासन की ओर से भी गांव की समस्या को लेकर कार्रवाई की बात कही गई है। सोलापुर के कलेक्टर एस. कार्तिकेयन के अनुसार सिंचाई विभाग ने तुलशी गांव का हाइड्रोलॉजिकल सर्वे कराया है। सर्वे की रिपोर्ट के आधार पर राज्य सरकार को नहर नेटवर्क तैयार करने का प्रस्ताव भेजा जाएगा।
किसानों के सामने अब समाधान का इंतजार
तुलशी के किसानों के लिए आंदोलन खत्म होना समस्या का अंत नहीं है। असली चुनौती अब यह है कि उन्हें कब तक सिंचाई का स्थायी समाधान मिलता है। वर्षों से पानी का इंतजार कर रहे ग्रामीणों को उम्मीद है कि सर्वे और प्रस्ताव की प्रक्रिया सिर्फ कागजों तक सीमित नहीं रहेगी और गांव को वास्तव में सिंचाई व्यवस्था से जोड़ा जाएगा।
सोलापुर में इस समय बारिश की कमी और सिंचाई संकट ने किसानों की चिंता बढ़ा दी है। ऐसे में तुलशी गांव के ‘बिकाऊ है’ पोस्टर सिर्फ एक गांव की नाराजगी नहीं, बल्कि पानी के लिए संघर्ष कर रहे किसानों की उस बेचैनी को भी दिखाते हैं, जिसमें खेती, रोजगार और गांव के भविष्य- तीनों पर संकट मंडरा रहा है।
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