
देश में इस समय NEET, CBSE से लेकर विभिन्न राज्य स्तरीय प्रतियोगी परीक्षाओं में अनियमितताओं और प्रश्नपत्र लीक होने को लेकर देश का युवा आक्रोशित है। परीक्षाओं की शुचिता पर उठते इन सवालों के बीच आज ब्रांडवाणी समाचार आपके लिए लेकर आया है एक गहन और निष्पक्ष विश्लेषण। हम किसी एक घटना की नहीं, बल्कि पिछले कुछ वर्षों के उस पूरे तंत्र की बात करेंगे जिसने लाखों छात्र-छात्राओं के भविष्य को अधर में लटका दिया है।
जब भी कोई प्रश्नपत्र लीक होता है, तो राजनीतिक गलियारों में आरोप-प्रत्यारोप का दौर शुरू हो जाता है। सत्तापक्ष और विपक्ष एक-दूसरे पर उंगलियां उठाने लगते हैं। लेकिन आंकड़ों की कसौटी पर देखें तो यह समस्या किसी एक राज्य या किसी एक राजनीतिक दल के शासनकाल तक सीमित नहीं है।
चाहे किसी भी दल की सरकार रही हो—चाहे वह भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) शासित राज्य हों या कांग्रेस व अन्य क्षेत्रीय दलों के शासन वाले राज्य—परीक्षाओं में सेंधमारी की घटनाएं हर जगह देखने को मिली हैं। उत्तर प्रदेश, राजस्थान, मध्य प्रदेश का व्यापमं मामला, बिहार और हाल ही में राष्ट्रीय स्तर पर नीट परीक्षा को लेकर उपजा विवाद, इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण हैं कि यह संकट दलीय राजनीति से ऊपर उठकर एक गहरी प्रशासनिक बीमारी बन चुका है।
परंतु, इस पूरे घटनाक्रम में सबसे बड़ा और यक्ष प्रश्न यह उठता है कि आखिर इन मामलों के तार्किक अंजाम तक पहुंचने की दर इतनी धीमी क्यों है? दशकों से चले आ रहे इस सिलसिले में अब तक केवल दो ही ऐसे बड़े मामले सामने आए हैं, जिनमें दोषियों को न्यायपालिका द्वारा वास्तविक रूप से कठोर सजा सुनाई जा सकी है।
आखिर ऐसा क्यों होता है कि जांच शुरू तो बड़ी धूमधाम से होती है, बड़ी-बड़ी गिरफ्तारियां भी दिखाई जाती हैं, लेकिन जब बात न्यायालय में दोषसिद्धि की आती है, तो ढीली पैरवी, साक्ष्यों के अभाव या प्रशासनिक शिथिलता के कारण मुख्य आरोपी और मास्टरमाइंड बच निकलते हैं?
लाखों युवाओं की दिन-रात की मेहनत, उनके माता-पिता की गाढ़ी कमाई और देश का भविष्य दांव पर लगा है। केवल कानून बना देने से या एक-दूसरे पर राजनीतिक कीचड़ उछालने से इस समस्या का स्थायी समाधान संभव नहीं है। जब तक जांच एजेंसियां त्वरित गति से पारदर्शी अन्वेषण नहीं करेंगी और न्यायालयों से दोषियों को त्वरित व कठोरतम दंड नहीं मिलेगा, तब तक शिक्षा माफियाओं के हौसले इसी प्रकार बुलंद रहेंगे।
इस पूरे गंभीर विषय पर आपकी क्या राय है? क्या सख्त कानूनों के क्रियान्वयन में कमी ही इसकी मुख्य वजह है? अपने विचार हमारे साथ अवश्य साझा करें।
ब्रांडवाणी समाचार के लिए ब्यूरो रिपोर्ट।








