2029 का ‘अदृश्य सिंडिकेट’, RTI, SIR और चुनावी डेटा पर क्यों उठ रहे सवाल?

2029 के लोकसभा चुनाव से पहले भारत की चुनावी व्यवस्था, मतदाता डेटा और सरकारी संस्थाओं की पारदर्शिता को लेकर बहस तेज हो रही है। सोशल मीडिया पर वायरल एक वीडियो में RTI व्यवस्था, सूचना आयोगों की लंबित अपीलों, Digital Personal Data Protection Act, चुनावी डेटा और Special Intensive Revision यानी SIR को एक बड़े राजनीतिक सवाल से जोड़कर पेश किया गया है। इसे ‘2029 का अदृश्य सिंडिकेट’ बताते हुए सवाल उठाता है कि क्या डेटा और संस्थागत व्यवस्था भविष्य की राजनीति में निर्णायक भूमिका निभा सकती है। हालांकि, किसी संगठित ‘सिंडिकेट’ के अस्तित्व का स्वतंत्र प्रमाण सामने नहीं आया है।

RTI व्यवस्था में बदलाव से क्यों जुड़ा है मामला?

RTI Amendment Act, 2019 और सूचना आयोगों की भूमिका का उल्लेख किया गया है। 2019 के संशोधन के बाद मुख्य सूचना आयुक्त और सूचना आयुक्तों के कार्यकाल तथा वेतन-भत्तों से जुड़े प्रावधानों को केंद्र सरकार द्वारा निर्धारित किए जाने का प्रावधान हुआ। सरकार ने उस समय कहा था कि इसका उद्देश्य सूचना आयोगों की सेवा शर्तों को तर्कसंगत बनाना है।

दूसरी ओर, सूचना के अधिकार की मौजूदा स्थिति पर चिंता जताने वाली रिपोर्टों में लंबित मामलों का मुद्दा सामने आया है। Satark Nagrik Sangathan की 2023-24 रिपोर्ट के अनुसार, 30 जून 2024 तक 29 सूचना आयोगों में 4,05,509 अपीलें और शिकायतें लंबित थीं। इनमें महाराष्ट्र सबसे ऊपर था, जबकि मध्य प्रदेश में 10,849 मामले लंबित बताए गए थे। यही आंकड़े RTI की प्रभावशीलता और सूचना आयोगों की क्षमता को लेकर बहस को आधार देते हैं।

DPDP Act के बाद RTI और निजी जानकारी का सवाल

दिखाए गए एक फ्रेम में Digital Personal Data Protection Act, 2023 की Section 44(3) का उल्लेख है। यह प्रावधान RTI Act की Section 8(1)(j) में बदलाव करता है और व्यक्तिगत जानकारी से संबंधित सूचना के लिए नया अपवाद निर्धारित करता है।

यह बदलाव इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि RTI के जरिए सरकारी कामकाज में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करने की कोशिश की जाती है, जबकि डेटा संरक्षण कानून व्यक्तिगत जानकारी की सुरक्षा पर जोर देता है। इसी संतुलन को लेकर कानूनी और नागरिक अधिकारों से जुड़े समूहों में बहस जारी है। इसलिए इसे सीधे ‘RTI खत्म होने’ के रूप में पेश करना सही नहीं होगा, यह पारदर्शिता बनाम निजता के बीच संतुलन का सवाल है।

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SIR और चुनावी डेटा पर बढ़ी निगरानी

दूसरा बड़ा हिस्सा Special Intensive Revision यानी SIR से संबंधित है। निर्वाचन आयोग ने 2026 में बड़े स्तर पर मतदाता सूची के पुनरीक्षण की प्रक्रिया शुरू की है। आयोग का उद्देश्य मतदाता सूची को अधिक सटीक बनाना और पात्र मतदाताओं को शामिल रखना है। केंद्र सरकार की जानकारी के मुताबिक तीसरे चरण में 16 राज्यों और 3 केंद्रशासित प्रदेशों में SIR की प्रक्रिया के दौरान करोड़ों मतदाताओं का सत्यापन किया गया।

इस प्रक्रिया को लेकर राजनीतिक और कानूनी विवाद भी सामने आए हैं। 15 अक्टूबर 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने SIR से जुड़ी याचिका पर निर्वाचन आयोग से जवाब मांगा और निर्णय प्रक्रिया से संबंधित रिकॉर्ड तलब किए। याचिका में मतदाता नामों में कथित बड़े पैमाने पर बदलाव और अनियमितताओं के आरोप लगाए गए हैं। हालांकि, आरोप और न्यायिक रूप से सिद्ध तथ्य अलग-अलग हैं। निर्वाचन आयोग लगातार SIR को मतदाता सूची की शुद्धता और चुनावी प्रक्रिया की विश्वसनीयता से जोड़कर देखता रहा है।

क्या 2029 की राजनीति में डेटा बनेगा सबसे बड़ा हथियार?

RTI, चुनावी रोल, डेटा सिस्टम, कॉरपोरेट पूंजी और संस्थागत पारदर्शिता को एक साथ जोड़कर ‘अदृश्य सिंडिकेट’ की थ्योरी सामने रखी गई है। यहां सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि किसके पास डेटा है, उसका इस्तेमाल कैसे होता है और उस पर निगरानी कितनी पारदर्शी है।

2029 के लोकसभा चुनाव से पहले मतदाता डेटा और डिजिटल चुनावी बुनियादी ढांचे की भूमिका निश्चित रूप से महत्वपूर्ण रहेगी। लेकिन किसी राजनीतिक दल, सरकार या संस्था द्वारा किसी ‘अदृश्य सिंडिकेट’ के जरिए चुनाव नियंत्रित किए जाने का दावा करने के लिए ठोस दस्तावेजी और स्वतंत्र प्रमाण जरूरी होंगे।

RTI, SIR और चुनावी डेटा जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों को एक बड़े राजनीतिक नैरेटिव से जोड़ दिया है। इनमें से कई विषय वास्तविक नीतिगत और कानूनी बहस का हिस्सा हैं, लेकिन ‘अदृश्य सिंडिकेट’ जैसी व्याख्या फिलहाल एक दावा/राजनीतिक विश्लेषण है, स्थापित तथ्य नहीं। 2029 से पहले असली चुनौती यही होगी कि मतदाता डेटा की सुरक्षा, चुनावी पारदर्शिता और नागरिकों के सूचना के अधिकार के बीच संतुलन कैसे कायम किया जाता है।

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Srota Swati Tripathy

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