
मध्य प्रदेश में भ्रष्टाचार की जड़ें किस कदर सरकारी तंत्र को खोखला कर रही हैं, इसका सबसे जीवंत और खौफनाक उदाहरण राजधानी भोपाल स्थित ‘जल निगम मर्यादित’ और ‘जल जीवन मिशन’ में देखने को मिल रहा है। यह एक ऐसा विभाग बन चुका है जिसने भ्रष्टाचार के मामले में देश के सबसे कुख्यात ‘व्यापम’ और ‘कॉमनवेल्थ गेम्स’ घोटालों को भी पीछे छोड़ दिया है। कांग्रेस शासनकाल में जिन राष्ट्रीय स्तर के घोटालों की गूंज दिल्ली तक सुनाई देती थी, आज अकेले मध्य प्रदेश का यह जल निगम उन सभी घोटालों की विरासत को समेट कर बैठा है। यह पूरी तरह से ये विभाग एक संगठित अधिकारियों के माध्यम से काम कर रहा है, जहां नियम-कानूनों की कोई अहमियत नहीं बची है और सत्ता तथा पैसे के रसूख पर अरबों रुपये की लूट को अंजाम दिया जा रहा है। एमपी बाबरिया की 130 करोड़ की फर्जी बैंक गारंटी और मेसर्स तीर्थ गोपिकान लिमिटेड की 35.80 करोड़ की फर्जी बैंक गारंटी जैसे और भी अंदर खेल लगातार चल रहे है।
निविदा प्रक्रिया का चीरहरण और नियमों की हत्या, किसी भी सरकारी विभाग में निर्माण या विकास कार्यों के लिए एक पारदर्शी निविदा (टेंडर) प्रक्रिया होती है। संवैधानिक और प्रशासनिक नियमों के अनुसार, सबसे पहले टेंडर आमंत्रित किए जाते हैं, फिर निविदाएं भरी जाती हैं। इसके पश्चात न्यूनतम दर (L-1) वाले ठेकेदार का चयन होता है, जिसे ‘लेटर ऑफ इंटेंट’ (LOI) और ‘लेटर ऑफ एक्सेप्टेंस’ (LOA) जारी किया जाता है। इसके बाद ठेकेदार को एक वैध बैंक गारंटी विभाग में जमा करनी होती है। इस बैंक गारंटी की सूक्ष्मता से जांच कराई जाती है और इसके प्रामाणिक पाए जाने पर ही अनुबंध पर हस्ताक्षर होते हैं। कार्य आदेश मिलने के बाद गुणवत्ता नियंत्रण अधिकारी लगातार साइट पर इस्तेमाल होने वाले मटेरियल की रिपोर्ट देते हैं, जिसके आधार पर बिल तैयार होता है और फिर भुगतान की प्रक्रिया पूरी की जाती है।
लेकिन, जल निगम मर्यादित में यह पूरी प्रक्रिया केवल कागजों का पेट भरने के लिए रह गई है। प्रबंध संचालक, विभाग के आला अधिकारी और चार्टर्ड अकाउंटें भावना भारती के गठजोड़ ने इस विभाग को एक ऐसा अड्डा बना दिया है, जहां फर्जी बैंक गारंटी के सहारे आप अरबों रुपये के टेंडर आसानी से हथिया सकते हैं। शर्त केवल इतनी है कि आपके पास ऊपर तक पहुंचाने के लिए ‘पैसा’ और ‘पावर’ होनी चाहिए। गुणवत्ता की जांच और मटेरियल की रिपोर्ट तो दूर की बात है, यहां बिना काम किए ही धड़ल्ले से फर्जी बिल पास किए जा रहे हैं। तेजी इतनी की प्रबंध संचालक ने 2-3 दिवस मे ही फुकतान के आदेश दे दिए ताकि ये खेल खतम हो और फर्जी बैंक गारंटी वापस की जाए ताकि तीर्थ गोपिकान लिमिटेड तो गई अब एमपी बाबरिया की भी बात दब जाए जल निगम मर्यादित मे तो कई बार बिना बैंक गारंटी देखे बिल करके उस बैंक गारंटी को वापस कर दिया गया समझ जो गोल-माल है भाई गोल-माल है।
ईडी और सीबीआई का खौफ शून्य, यहाँ सब भगत सिंह है लेकिन हमारे भगत सिंह जो देश की आन-बान-शान थे जिनको सच मे प्रणाम है लेकिन ये लोग नहीं है, ये लोग ये जनता के टैक्स के पैसे पर खींच तान वाले है और फिर तभी तो जमीन के रेट ऊपर जा रहे है, जल निगम मर्यादित और जल जीवन मिशन के अधिकारियों के भीतर से प्रवर्तन निदेशालय और केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो जैसी शीर्ष जांच एजेंसियों का खौफ पूरी तरह खत्म हो चुका है। विभाग के गलियारों में अब यह चर्चा आम है कि इन अधिकारियों को लगता है कि “पैसे में बहुत ताकत है।” यह दुस्साहस इस बात का प्रमाण है कि शायद वे यह मानकर चल रहे हैं कि पूरी व्यवस्था बिक चुकी है। तभी तो फर्जीवाड़े के बावजूद बिना किसी डर के करोड़ों रुपयों के बिल रातों-रात पास हो रहे हैं।
भुगतान की जल्दबाजी, प्रबंध संचालक के 2-3 दिन फाइल करने के आदेश ही निकाल डाले ताकि महाघोटाले की कलई न खुले और भी जगह, जब हाल ही में जल निगम मर्यादित के प्रबंध संचालक द्वारा एक बेहद संदेहास्पद आदेश जारी किया गया। इस आदेश में स्पष्ट रूप से निर्देश दिए गए हैं कि सभी जगहों से फाइलें 2 से 3 दिवस के भीतर मुख्यालय आ जानी चाहिए और उनका भुगतान तत्काल प्रभाव से हो जाना चाहिए। प्रशासनिक दृष्टिकोण से इतनी जल्दबाजी सामान्य नहीं है। क्युकी शासन मे एक सप्ताह तो फाइल मे लगता ही है।
इस फरमान के पीछे की असल मंशा बेहद खौफनाक है। सूत्रों के अनुसार, जिन रसूखदार ठेकेदारों ने फर्जी बैंक गारंटियां जमा करके अरबों के ठेके लिए हैं, अब उनके राज धीरे-धीरे खुलने लगे हैं। विभाग की कोशिश है कि फाइलों का आनन-फानन में भुगतान करके मामले को रफा-दफा कर दिया जाए और इन फर्जी बैंक गारंटियों को जांच की आंच आने से पहले ही ठेकेदारों को वापस कर दिया जाए, ताकि भविष्य में कोई सबूत ही न बचे और इस काले सच पर हमेशा के लिए पर्दा डल जाए।
डेढ़ लाख की सैलरी और ‘जलसा रिट्रीट’ जैसे साम्राज्य, इंजीनियरों का काला खेल भ्रष्टाचार से उपजी इस अकूत संपत्ति का सबसे बड़ा उदाहरण विभाग के आला अधिकारियों का आलीशान जीवन है। जल जीवन मिशन में कितना व्यापक भ्रष्टाचार हुआ है और जल निगम मर्यादित में क्या खेल चल रहा है, यह विभाग के इंजीनियर-इन-चीफ (ईएनसी) संजय अंधवान और प्रबंध संचालक को बहुत अच्छे से पता है। अगर यह भ्रष्टाचार नहीं है, तो फिर डेढ़ लाख रुपये प्रति माह का वेतन पाने वाले इन सरकारी इंजीनियरों और अधिकारियों के पास जलसा, रिट्रीट और ‘रिवॉल्विंग रेस्टोरेंट’ जैसी करोड़ों-अरबों की संपत्तियों में पार्टनरशिप कहां से आ रही है? एक सामान्य वेतनभोगी अधिकारी अपने जीवनकाल की पूरी कमाई से भी ऐसी संपत्तियों का एक हिस्सा नहीं खरीद सकता। यह स्पष्ट रूप से ठेकेदारों से मिलने वाले कमीशन, फर्जी बैंक गारंटियों के एवज में ली गई रिश्वत और जल जीवन मिशन के पैसों की सीधी लूट का परिणाम है।
‘जीरो टॉलरेंस’ और ‘विकास की रफ्तार’ पर सीधे सवाल यह पूरा परिदृश्य मध्य प्रदेश शासन के शीर्ष नेतृत्व के लिए एक बहुत बड़ी चुनौती है। प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव हर मंच से भ्रष्टाचार के खिलाफ ‘जीरो टॉलरेंस’ (शून्य सहिष्णुता) की बड़ी-बड़ी बातें करते हैं। वहीं, राज्य के मुख्य सचिव अशोक बर्णवाल प्रदेश को सुंदर बनाने और विकास की तेज रफ्तार पकड़ने के लिए दिन-रात प्रयासरत हैं। लेकिन जल निगम का यह भ्रष्टाचार उनकी इन तमाम कोशिशों पर सीधा तमाचा है।
अब मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव और मुख्य सचिव अशोक बर्णवाल को यह तय करना होगा कि मध्य प्रदेश वास्तव में ‘जमीनी स्तर’ पर सुंदर बनेगा, या फिर ‘भ्रष्टाचार के स्तर’ पर सुंदर बनता रहेगा? क्या मुख्यमंत्री का जीरो टॉलरेंस इन भ्रष्ट अधिकारियों, इंजीनियरों और सीए के सिंडिकेट को तोड़ पाएगा? क्या आम जनता के घर तक पीने का शुद्ध पानी पहुंचाने के लिए आए हजारों करोड़ रुपये यूं ही जलसा, रिट्रीट’ और ‘रिवॉल्विंग रेस्टोरेंट’ की नींव मजबूत करते रहेंगे? किसी के बेटे को पदोन्नति शासन मे कैसे कितनी सीमाएं लांघ कर मिलती है सबको समझ आता है और जनता भी अब इतनी पढ़ाई कर चुकी है की नोटशीट मे कैसे काम होते है अब समझ आने लगा है इसलिए जनता को गुमराह न करे, यह समय कठोर कार्रवाई का है, अन्यथा यह महाघोटाला सत्ता के दामन पर एक ऐसा दाग छोड़ जाएगा, जिसे भविष्य की कोई भी सरकार धो नहीं पाएगी। भारत माता की जय बोलने से कुछ नहीं होगा जिसके दिल मे ही भारत माता ना हो।







