
भोपाल: मध्य प्रदेश जन अभियान परिषद (MPJAP) में पूर्व कार्यपालन निदेशक डॉ. धीरेंद्र कुमार पांडेय का कार्यकाल विवादों और भ्रष्टाचार के गंभीर आरोपों के साये में आ गया है। ब्रांडवाणी समाचार के सूत्रों के अनुसार ₹100 करोड़ से अधिक के वित्तीय हेरफेर, फर्जी नियुक्तियों और सरकारी धन के निजी उपयोग के आरोपों ने शासन और प्रशासन की पारदर्शिता पर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं।
अवैध नियुक्ति में नियमों की ‘सर्जिकल स्ट्राइक’
सबसे बड़ा सवाल डॉ. धीरेंद्र कुमार पांडेय की नियुक्ति की वैधता पर है। मध्य प्रदेश राजपत्र (क्र. 477, दिनांक 01/09/2018) के स्पष्ट निर्देश हैं कि परिषद का कार्यपालक निदेशक अखिल भारतीय सेवा (IAS) का अधिकारी होना अनिवार्य है। मध्य प्रदेश शासन ने 23 जून 2020 को डॉ. पांडेय (सीनियर प्रिंसिपल साइंटिस्ट, MPCST) को इस पद पर बैठाया, जो पात्रता ही नहीं रखते थे।
सवाल: क्या एक वैज्ञानिक को प्रशासनिक पद देना विधि सम्मत है? क्या यह नियुक्ति शुरू से ही अवैध नहीं थी?
कागजी NGOs को ‘करोड़ों की खैरात’
डॉ. पांडेय पर आरोप है कि उन्होंने ‘नवांकुर’ और ‘प्रस्फुटन’ जैसी योजनाओं के नाम पर सरकारी खजाना खोल दिया। ऐसी फ़र्जी संस्थाओं को करोड़ों रुपये दिए गए जिनका अस्तित्व सिर्फ फाइलों में था। मध्य प्रदेश महालेखागार भोपाल की रिपोर्ट के अनुसार, सेवा उपार्जन में ‘भंडार क्रय नियमों’ का पालन नहीं किया गया। जिसमें बिना वेरिफिकेशन के जमीनी स्तर पर काम देखे बिना ही राशि जारी कर दी गई। कागजों पर झूठे आयोजन और ट्रेनिंग दिखाकर बजट ठिकाने लगाया गया।
करीबियों को लाभ “टैक्सी बिल और हवाई सफर”
भ्रष्टाचार के आरोप केवल योजनाओं तक सीमित नहीं रहे, बल्कि व्यक्तिगत सुख-सुविधाओं तक पहुँच गए। डॉ. धीरेन्द्र पांडेय ने अपने परिचित ‘आर.के. ट्रेवल्स’ को लाभ पहुँचाने के लिए टैक्सी परमिट के नाम पर लाखों के फर्जी बिल पास किए गए। यह फ़र्जी बिल कर्मचारी लेखपाल उज्जवला तिड़के, स्टोर सहायक नृपेंद्र साहू, प्रभारी सहायक डॉ. प्रवीण शर्मा और प्रभारी लेखपाल दरियाब सूर्यवंशी की संलिप्तता में किया गया। आरोप है कि डॉ. पांडेय ने अपने परिवार के लिए भोपाल से गुवाहाटी, इम्फाल, मेघालय और दिल्ली तक के हवाई टिकटों का भुगतान सरकारी पैसे से किया।
बैकडोर एंट्री योग्यता की जगह ‘चहेतों’ को प्राथमिकता
जन अभियान परिषद में नियुक्तियों को डॉ. पांडेय ने अपना ‘निजी अखाड़ा’ बना लिया था। संविदा और आउटसोर्सिंग भर्तियों में विज्ञापन और चयन प्रक्रिया के मापदंडों को गायब कर दिया गया। योग्यता के बजाय इन्होने अपने परिजनों और करीबियों को महत्वपूर्ण पदों पर बैठाया गया।
खरीदी में घोटाला और निविदा नियमों का उल्लंघन
मध्य प्रदेश के विभिन्न जिलों में आयोजित होने वाले परिषद के प्रशिक्षण शिविरों, सम्मेलनों और यात्राओं के नाम पर फर्जी बिल लगाकर सरकारी खजाने को नुकसान पहुँचाने के गंभीर आरोप लगाए गए। इन प्रशिक्षणों में कंप्यूटर, लैपटॉप और फर्नीचर की मनमानी खरीदी कर शासन को करोड़ों का नुकसान पहुँचाया गया। राज्य शासन ने नदी महोत्सव (2018) के दौरान बांद्राभान में आयोजित कार्यक्रम में व्यवस्थाओं का कार्य बिना ‘खुली निविदा’ के कराया गया, जो सीधे तौर पर शासन के वित्तीय नियमों के विरुद्ध है। इस पूरे खेल में उज्जवला तिड़के, नृपेंद्र साहू, डॉ. प्रवीण शर्मा और दरियाब सूर्यवंशी जैसे कर्मचारियों की भूमिका भी संदेह के घेरे में है।
ब्रांडवाणी समाचार ने राज्य सरकार और कानून के सामने खड़े किये ये 4 बड़े सवाल
संवैधानिक उल्लंघन में क्या राजपत्र के नियमों की अनदेखी कर की गई नियुक्ति कानूनी अपराध नहीं है?
महालेखापाल (AG) द्वारा पकड़ी गई वित्तीय गड़बड़ियों के बाद भी अब तक डॉ. पांडेय पर कठोर कार्रवाई क्यों नहीं हुई?
शासन की जवाबदेही ने क्या राज्य सरकार ने शासकीय धन की लूट के लिए खुली छूट दे रखी है?
प्रशासनिक की साख ने अयोग्य व्यक्ति की नियुक्ति से सामान्य प्रशासन विभाग के आदेशों की अहमियत क्या रह गई है?
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