
आज हम बात करेंगे मध्य प्रदेश की उस कड़वी हकीकत की, जिसे लोक-लुभावन दावों के चमकीले पर्दों के पीछे छिपाने की कोशिश की जा रही है।
कहते हैं कि सरकारें जनता की भलाई के लिए योजनाएं बनाती हैं। लेकिन मध्य प्रदेश में भलाई का यह फॉर्मूला कुछ अजीब ही नजर आ रहा है। वल्लभ भवन के बंद, वातानुकूलित (AC) कमरों में बैठे बड़े साहब लोग… जिन्हें शायद जमीन की तपिश और आम जनमानस की तकलीफों का अंदाजा तक नहीं है, वो एक हाथ से ‘फ्री’ की योजना का लॉलीपॉप थमाते हैं, और दूसरे हाथ से आपकी जेब साफ कर देते हैं!
जी हां, कभी रजिस्ट्री के दाम 20 रुपये बढ़ा दिए जाते हैं, कभी एक्साइज ड्यूटी में खेल होता है, तो कभी पेट्रोल-डीजल और रसोई गैस के दाम आसमान छूने लगते हैं। यहाँ तक कि खाने-पीने के जरूरी सामान पर भी टैक्स का बोझ लाद दिया जाता है। सीधे शब्दों में कहें, तो आपकी ही जेब काट कर, आपको ही ‘फ्री’ का अहसान जताया जा रहा है। जनता को गुमराह करने का यह खेल बेखौफ चल रहा है। और जानते हैं क्यों? क्योंकि मध्य प्रदेश में विपक्ष इस वक्त घुटनों पर है। विपक्ष की कमजोरी ने सत्ता में बैठे नेताओं और अफसरों को ‘स्वयंभू’ बना दिया है!
बात सिर्फ टैक्स और महंगाई तक सीमित नहीं है। खेल इससे भी बड़ा है। बड़े-बड़े टेंडर तैयार किए जाते हैं और बाहर की कंपनियों को लाकर मलाई परोसी जाती है। स्थानीय रोजगार और स्थानीय प्रतिभाएं बस देखती रह जाती हैं।
अब सवाल यह उठता है कि यह तमाशा कब तक चलेगा? क्या जनता अपनी वोट की ताकत से इस गुमराह करने वाली नीति को बदलेगी? क्या मध्य प्रदेश में कोई नई राजनीतिक करवट देखने को मिलेगी, जो इस सांठगांठ को तोड़ेगी?
मध्य प्रदेश की सियासत में इन दिनों ‘मुफ्त’ शब्द की बड़ी गूंज है। लेकिन इस ‘मुफ्त’ के पीछे छिपी महंगाई की मार से आम आदमी की कमर टूट चुकी है। वल्लभ भवन की ऊंची कुर्सियों पर जमे वो अफसर, जिन्हें महीने की पहली तारीख को मोटी सैलरी और सुख-सुविधाएं मिल जाती हैं, उन्हें क्या पता कि दाल, तेल और गैस सिलेंडर के बढ़े हुए दाम एक मजदूर या मध्यमवर्गीय परिवार का बजट कैसे बिगाड़ते हैं। नेता योजना पास करते हैं, अफसर उसे कागजों पर चमकाते हैं, और अंत में बिल फटता है आम जनता के नाम पर।
लोकतंत्र में मजबूत विपक्ष सरकार की मनमानी पर लगाम लगाता है, लेकिन मध्य प्रदेश का मौजूदा परिदृश्य बताता है कि विपक्ष फिलहाल सो रहा है। इसी का फायदा उठाकर नौकरशाही और नेताओं का यह गठजोड़ खुद को सर्वेसर्वा समझ बैठा है। जनता त्रस्त है, पर उनकी आवाज सुनने वाला कोई नहीं।
जनता सब देख रही है। ‘फ्री’ के नाम पर जो भ्रमजाल बुना गया है, उसके पीछे की कड़वी सच्चाई अब घर-घर तक पहुंच चुकी है। वक्त आ गया है कि वोट की ताकत से इन गुमराह करने वाली नीतियों को आईना दिखाया जाए। बदलाव की बयार कब और कैसे आएगी, यह तो वक्त तय करेगा, लेकिन ‘ब्रांडवाणी समाचार’ जनता की इस आवाज को दबाने नहीं देगा। वल्लभ भवन के बंद कमरों की फाइलों से लेकर आपकी रसोई के बजट तक, हमारी नजर हर उस नीति पर रहेगी जो आपकी जेब पर डाका डालती है।
आप बने रहिए ब्रांडवाणी समाचार के साथ। निष्पक्ष आवाज, बुलंद तेवर।








