विशेष विश्लेष RSS, BJP और ब्राह्मण समाज के बीच का राजनीतिक ताना-बाना?

भारतीय राजनीति में जातीय समीकरण और सत्ता का संतुलन हमेशा से ही विमर्श का मुख्य केंद्र रहा है। स्वतंत्रता के बाद से लेकर आज के डिजिटल युग तक, हर राजनीतिक दल ने समाज के विभिन्न वर्गों के सहयोग से अपनी सत्ता की इमारत खड़ी की है। लेकिन आज हम बात करेंगे उस वर्ग की, जिसे भारतीय समाज और राजनीति में वैचारिक और रणनीतिक रूप से बेहद प्रभावशाली माना जाता रहा है— यानी ब्राह्मण समाज।
आज राजनीतिक गलियारों और सोशल मीडिया से लेकर जमीनी स्तर पर एक बड़ा सवाल तैर रहा है: क्या भारतीय जनता पार्टी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के वैचारिक ढांचे में ब्राह्मण समाज की भूमिका सिर्फ एक मुख्य आधार स्तंभ की रही है, या फिर सत्ता के शीर्ष पर बैठे नेतृत्व ने इस वर्ग का उपयोग केवल चुनावी वैतरणी पार करने के लिए किया है?
इतिहास गवाह है कि जनसंघ के दौर से लेकर भारतीय जनता पार्टी के उदय और विस्तार तक, ब्राह्मण समाज इस विचारधारा का सबसे मजबूत और वफादार समर्थक रहा है। संघ के शीर्ष नेतृत्व से लेकर भाजपा के संगठन मंत्रियों तक, इस समाज की भूमिका हमेशा नीति-निर्धारक की रही है। लेकिन हाल के वर्षों में, राजनीति के बदलते स्वरूप और सोशल इंजीनियरिंग के नए प्रयोगों ने एक नई बहस को जन्म दे दिया है।
राजनीतिक विश्लेषकों का एक धड़ा यह मानता है कि जैसे-जैसे भाजपा ने अपना जनाधार बढ़ाने के लिए अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) और दलित समुदायों को प्राथमिकता देना शुरू किया है, वैसे-वैसे पारंपरिक सवर्ण मतदाताओं, विशेषकर ब्राह्मणों में एक अदृश्य असंतोष पनपने लगा है।
अब सवाल यह उठ रहा है कि क्या यह समाज केवल ‘वोट बैंक’ बनकर रह गया है? क्या सत्ता के शीर्ष पर इस वर्ग की हिस्सेदारी केवल प्रतीकात्मक बची है?

* बदलते समीकरण: क्या क्षेत्रीय और राष्ट्रीय स्तर पर ब्राह्मण नेतृत्व को हाशिए पर धकेला जा रहा है?
* वैचारिक चेतना: क्या समाज का युवा वर्ग अब राजनीतिक दलों की रणनीतियों को समझने लगा है?
* जन आंदोलन की सुगबुगाहट: क्या अपनी उपेक्षा के विरोध में यह समाज किसी बड़े आंदोलन या राजनीतिक विकल्प की ओर बढ़ सकता है?

जमीन से उठ रही आवाजें बताती हैं कि ब्राह्मण समाज का एक प्रबुद्ध हिस्सा अब इस बात का मंथन कर रहा है कि क्या वर्तमान नेतृत्व उनके हितों और उनकी सांस्कृतिक पहचान का सही प्रतिनिधित्व कर रहा है या नहीं। चर्चाएं इस बात पर भी गर्म हैं कि क्या अब समय आ गया है जब यह समाज किसी एक दल की बपौती बनने के बजाय अपने अधिकारों के लिए एक स्वतंत्र जन आंदोलन की रूपरेखा तैयार करे।
हालांकि, इसके विपरीत दूसरा पक्ष यह भी तर्क देता है कि भाजपा और संघ के मूल एजेंडे—जैसे सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और विकास की राजनीति—में ब्राह्मण समाज की आस्था आज भी उतनी ही मजबूत है, और नेतृत्व में बदलाव केवल लोकतांत्रिक और सामाजिक संतुलन का हिस्सा है, न कि किसी वर्ग की उपेक्षा।
लोकतंत्र में जागरूकता ही सबसे बड़ा हथियार है। चाहे वह ब्राह्मण समाज हो या देश का कोई अन्य वर्ग, जब समाज का बौद्धिक वर्ग अपनी स्थिति और सत्ता में अपनी वास्तविक भागीदारी का मूल्यांकन करने लगता है, तो राजनीति करवट बदलने लगती है।
क्या ब्राह्मण समाज वाकई संघ और भाजपा के इस नए नेतृत्व की कार्यप्रणाली को समझ चुका है? क्या आने वाले समय में हमें कोई नया राजनीतिक मोड़ या सवर्ण समाज का कोई बड़ा आंदोलन देखने को मिलेगा? यह तो वक्त ही बताएगा, लेकिन इतना साफ है कि अब मूक समर्थक बने रहने का दौर खत्म हो रहा है।

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