
सागर। मध्य प्रदेश के सागर जिले के गढ़ाकोटा नगर से सांप्रदायिक सौहार्द और भाईचारे की एक अनूठी मिसाल सामने आई है। यहां एक हिंदू परिवार पिछले करीब 250 वर्षों से मोहर्रम के अवसर पर ताजिया और बुर्राख बनाकर हिंदू-मुस्लिम एकता की परंपरा को जीवंत रखे हुए है। यह परंपरा आज भी पूरी श्रद्धा और समर्पण के साथ निभाई जा रही है।
गढ़ाकोटा के सुभाष वार्ड निवासी अभिषेक विश्वकर्मा का परिवार पीढ़ी-दर-पीढ़ी इस परंपरा को आगे बढ़ा रहा है। परिवार का कहना है कि उनके पूर्वजों ने सभी धर्मों का सम्मान करने की सीख दी थी और उसी विरासत को आज की पीढ़ी भी पूरी निष्ठा से निभा रही है।
मोहर्रम शुरू होने से लगभग दो महीने पहले ही ताजिया निर्माण का कार्य प्रारंभ हो जाता है। बांस की खपच्चियों, रंगीन कागज, मखमली कपड़े और पारंपरिक सजावटी सामग्री से तैयार किए गए ताजिए अपनी आकर्षक कारीगरी के लिए दूर-दूर तक प्रसिद्ध हैं। इन्हें देखने के लिए हर वर्ष बड़ी संख्या में लोग गढ़ाकोटा पहुंचते हैं।
अभिषेक विश्वकर्मा ने बताया कि उनके लिए ताजिया बनाना केवल एक कला नहीं, बल्कि आस्था, सेवा और इंसानियत का प्रतीक है। उनका परिवार वर्षों से बिना किसी भेदभाव के इस परंपरा को निभा रहा है, जो समाज में भाईचारे और आपसी सम्मान का संदेश देती है।
गढ़ाकोटा में केवल विश्वकर्मा परिवार ही नहीं, बल्कि खटीक और रैकवार समाज के कई परिवार भी वर्षों से ताजिया निर्माण में योगदान दे रहे हैं। यही कारण है कि यह नगर सांप्रदायिक सद्भाव की एक मिसाल माना जाता है, जहां सभी धर्मों के लोग एक-दूसरे के त्योहारों में बढ़-चढ़कर भाग लेते हैं।
गढ़ाकोटा की यह ऐतिहासिक परंपरा आज भी समाज को यह संदेश देती है कि आपसी सम्मान, प्रेम और भाईचारा ही भारतीय संस्कृति की सबसे बड़ी पहचान है।








