
मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के ‘सपनों के एमपी’ को दीमक की तरह चाट रही है अफसरशाही, ब्रांड ग्रुप के चेयरमैन विवेक द्विवेदी के जनहित प्रोजेक्ट को प्रवासी भारतीय विभाग ने लटकाया।
मध्य प्रदेश में सत्ता बदली, चेहरे बदले और मुख्यमंत्री की कमान डॉ. मोहन यादव के हाथों में आई। मुख्यमंत्री लगातार प्रदेश के विकास, रोजगार और राजस्व बढ़ाने के दावे कर रहे हैं। लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या मुख्यमंत्री की यह मंशा मंत्रालय यानी वल्लभ भवन की पांचवीं मंजिल पर बैठे आला अफसरों तक पहुंच भी पा रही है? या फिर वल्लभ भवन के वातानुकूलित कमरों में बैठे कुछ रसूखदार अधिकारी खुद को ‘भगवान’ समझकर प्रदेश के भविष्य के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं?
आज ब्रांडवाणी समाचार मध्य प्रदेश के हित में एक ऐसा बड़ा खुलासा करने जा रहा है, जो यह साबित करता है कि प्रदेश के स्थानीय उद्यमियों और विजनरी लोगों के बेहतरीन प्रोजेक्ट्स को किस तरह वल्लभ भवन की फाइलों में दफन कर दिया जाता है।
स्थानीय प्रोजेक्ट्स से परहेज, बाहरी लोगों से ‘गठजोड़’?
मध्य प्रदेश को आत्मनिर्भर बनाने के लिए स्थानीय स्तर पर कई बड़े प्रोजेक्ट्स तैयार किए जाते हैं, जिनसे राज्य को करोड़ों का जीएसटी मिल सकता है, राजकोष बढ़ सकता है और लाखों युवाओं को रोजगार मिल सकता है। लेकिन वल्लभ भवन के बड़े अधिकारियों की कार्यप्रणाली पर अब गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं।
आरोप है कि मंत्रालय में बैठे कुछ शीर्ष अधिकारी स्थानीय स्तर के जनहित प्रोजेक्ट्स को न तो सुनते हैं, न समझते हैं और न ही उन्हें मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव तक पहुंचने देते हैं। इसके विपरीत, बाहर से आए बड़े उद्योगपतियों और रसूखदारों के प्रोजेक्ट्स को लाल कालीन बिछाकर तुरंत मंजूरी दे दी जाती है।
क्या इसका कारण सिर्फ विकास है, या फिर इसके पीछे ‘लेन-देन’ और ‘कमीशनखोरी’ की वह सुगम प्रक्रिया है जो बाहरी लोगों के साथ आसानी से बैठ जाती है? यह एक ऐसा कड़वा सवाल है जिसका जवाब आज मध्य प्रदेश की जनता मांग रही है।
इस प्रशासनिक उदासीनता और कथित गठजोड़ का सबसे ताजा और जीवंत उदाहरण है ब्रांड ग्रुप के चेयरमैन विवेक द्विवेदी का प्रोजेक्ट।
क्या था मामला? विवेक द्विवेदी द्वारा प्रदेश के हित में, रोजगार सृजन और राजस्व वृद्धि को ध्यान में रखकर एक बेहद महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट तैयार किया गया था।
कहाँ अटकी फाइल? इस प्रोजेक्ट को लेकर कई बार प्रवासी भारतीय विभाग के चक्कर काटे गए। वल्लभ भवन में प्रमुख सचिव से लेकर पांचवीं मंजिल (मुख्यमंत्री सचिवालय) तक इस प्रोजेक्ट को पहुंचाने की कोशिश की गई।
अधिकारियों का रवैया: अधिकारियों ने इस जनहित के प्रोजेक्ट को सुनना तो दूर, कई बार मिलने तक से साफ इनकार कर दिया।
डर इस बात का है कि स्थानीय स्तर पर तैयार किए गए इस बेहतरीन प्रोजेक्ट को ठंडे बस्ते में डालकर, भविष्य में किसी बाहरी व्यक्ति या चहेते वेंडर के साथ मिलकर इसे नए रूप में पेश न कर दिया जाए, ताकि ‘लेन-देन’ का रास्ता साफ हो सके।
मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव जी और प्रदेश के मुख्य सचिव तक जमीनी हकीकत और ऐसे बेहतरीन अवसर कभी पहुंचने ही नहीं दिए जाते, जिन पर वे तुरंत और सही निर्णय ले सकें। अधिकारी एक ऐसा सुरक्षा कवच बनाकर बैठे हैं जिसे भेद पाना किसी ईमानदार और काम करने वाले व्यक्ति के लिए असंभव सा हो गया है।
अब देखना यह है कि ‘ब्रांडवाणी समाचार’ पर इस खबर के प्रमुखता से प्रकाशित और प्रसारित होने के बाद:
- क्या मुख्य सचिव इस मामले का संज्ञान लेते हैं?
- क्या मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव वल्लभ भवन के इस ‘सिंडिकेट’ को तोड़कर विवेक द्विवेदी के प्रोजेक्ट और उन जैसे तमाम स्थानीय युवाओं के प्रस्तावों को खुद देखेंगे?
यदि इस खबर के बाद भी शासन और प्रशासन का एक्शन ‘जीरो’ रहता है, तो मध्य प्रदेश की जनता को यह समझने में देर नहीं लगेगी कि नीचे से लेकर ऊपर तक पूरी व्यवस्था ही इस गठजोड़ में शामिल है। ब्रांडवाणी समाचार मध्य प्रदेश के हित में, यहाँ के युवाओं के रोजगार के लिए और भ्रष्टाचार के खिलाफ अपनी यह आवाज बुलंद रखता रहेगा।
आपकी इस खबर पर क्या राय है? क्या आपको भी लगता है कि वल्लभ भवन के अफसर सरकार की छवि को धूमिल कर रहे हैं? हमें कमेंट बॉक्स में जरूर बताएं।







