300 किमी पैदल चलकर भोपाल पहुंचे दो कांग्रेसी, PCC के बाहर धरने पर बैठे; बोले- कई पदों का विरोध किया तो निष्कासित कर दिया

मध्य प्रदेश कांग्रेस में संगठनात्मक विवाद एक बार फिर खुलकर सामने आया है। करीब 300 किलोमीटर पैदल यात्रा कर भोपाल पहुंचे दो कांग्रेस कार्यकर्ता प्रदेश कांग्रेस कमेटी (PCC) कार्यालय के सामने धरने पर बैठ गए। उनका आरोप है कि पार्टी में एक ही व्यक्ति को तीन-चार महत्वपूर्ण पद दिए जाने का उन्होंने विरोध किया था, जिसके बाद उन्हें संगठन से निष्कासित कर दिया गया। इस घटनाक्रम ने प्रदेश कांग्रेस के भीतर संगठनात्मक व्यवस्था और आंतरिक असंतोष को लेकर नई बहस छेड़ दी है।

धरने पर बैठे दोनों कार्यकर्ताओं का कहना है कि उन्होंने पार्टी हित में संगठन के भीतर जवाबदेही और पारदर्शिता की मांग उठाई थी। उनका आरोप है कि पार्टी में कुछ नेताओं को एक साथ कई जिम्मेदारियां दी जा रही हैं, जबकि लंबे समय से काम कर रहे कार्यकर्ताओं की अनदेखी की जा रही है। उनका कहना है कि उन्होंने इसी व्यवस्था पर सवाल उठाए, जिसके बाद अनुशासनात्मक कार्रवाई करते हुए उन्हें पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया।

दोनों कार्यकर्ताओं ने बताया कि अपनी बात प्रदेश नेतृत्व तक पहुंचाने के लिए उन्होंने करीब 300 किलोमीटर की पैदल यात्रा की। उनका कहना है कि यह यात्रा किसी व्यक्तिगत लाभ के लिए नहीं, बल्कि संगठन के भीतर लोकतांत्रिक व्यवस्था और कार्यकर्ताओं के सम्मान की मांग को लेकर की गई है। भोपाल पहुंचने के बाद उन्होंने PCC कार्यालय के सामने धरना शुरू कर दिया और अपनी मांगों पर पुनर्विचार करने की अपील की।

धरना दे रहे कार्यकर्ताओं की प्रमुख मांग है कि उनके निष्कासन के आदेश की समीक्षा की जाए और संगठन में एक व्यक्ति-एक पद के सिद्धांत को प्रभावी रूप से लागू किया जाए। उनका कहना है कि यदि पार्टी में कार्यकर्ताओं की आवाज नहीं सुनी जाएगी, तो जमीनी स्तर पर संगठन कमजोर होगा। उन्होंने यह भी कहा कि वे शीर्ष नेतृत्व से मिलने और अपना पक्ष रखने के लिए तैयार हैं।

दूसरी ओर, इस पूरे मामले पर प्रदेश कांग्रेस नेतृत्व की ओर से विस्तृत आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। पार्टी सूत्रों का कहना है कि अनुशासन से जुड़े मामलों में संगठन अपने निर्धारित नियमों के अनुसार निर्णय लेता है। यदि कोई कार्यकर्ता अपनी बात रखना चाहता है, तो उसके लिए संगठन के भीतर निर्धारित प्रक्रिया मौजूद है।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि चुनावी तैयारियों के बीच इस तरह के संगठनात्मक विवाद किसी भी राजनीतिक दल के लिए चुनौती बन सकते हैं। ऐसे मामलों में नेतृत्व की भूमिका महत्वपूर्ण होती है, क्योंकि समय रहते संवाद और समाधान से संगठनात्मक असंतोष को कम किया जा सकता है।

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gaurav singh rajput

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