
आज बात उस कड़वे सच की, जिसे सुनकर हमारी व्यवस्था की आत्मा कांप जानी चाहिए। लेकिन अफसोस, यहाँ आत्मा बची ही कहाँ है? आज बात होगी हमारे देश की उस शिक्षा व्यवस्था की, जिसे नेताओं ने व्यापार का सबसे बड़ा अड्डा बना दिया है।
एक देश, एक कानून की बातें करने वाले हुक्मरानों, ज़रा ये बताओ कि इस देश में एक देश, एक शिक्षा क्यों नहीं है?
आज भारत में शिक्षा का स्तर दो हिस्सों में बंट चुका है। यहाँ तरह-तरह के शिक्षा बोर्ड बनाए गए हैं। अमीर का बेटा अलग आलीशान बोर्ड से पढ़ता है, विदेशी किताबें चाटता है और भविष्य का राजा बनता है। वहीं, एक गरीब किसान या मजदूर का बेटा सरकारी स्कूल के टूटे टाट-पट्टी पर बैठकर उस पुरानी, जर्जर शिक्षा व्यवस्था को ढोने पर मजबूर है, जो उसे सिर्फ और सिर्फ मज़दूर बनाना सिखाती है।
सोचिए, क्या एक ही देश में सुदामा और कृष्ण के बेटों के लिए अलग-अलग ज्ञान का तराजू होना सही है?
पड़ोसी देश चीन को देखिए। क्षेत्रफल में हमसे तीन गुना बड़ा है, आबादी हमारे बराबर ही है। लेकिन वहाँ शिक्षा का स्तर सुदामा और कृष्ण—यानी अमीर और गरीब दोनों के बच्चों के लिए एक समान है। वहाँ का राष्ट्रपारीय ढांचा शिक्षा में भेदभाव नहीं करता। लेकिन हमारे यहाँ? हमारे यहाँ शिक्षा को एक सोची-समझी साजिश के तहत बांट दिया गया है ताकि गरीब का बच्चा कभी राजा की कुर्सी पर बैठने का ख्वाब न देख सके।
इस देश में सब कुछ बिकता है। यहाँ सच तो छोड़िए, यहाँ ‘झूठ’ भी खुलेआम बिकता है और उसे खरीदने वाली हमारी भोली-भाली जनता है। चुनाव आते ही सरकारों के दावों की झोली खुल जाती है। चाहे वह ईमानदारी का ढोंग रचने वाली भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की सरकार हो, या फिर खुद को मसीहा बताने वाली दूसरी विपक्षी सरकारें।
सच्चाई यह है कि जब बात देश को लूटने और अपनी तिजोरियां भरने की आती है, तो किसी भी राजनीतिक दल ने कोई कसर नहीं छोड़ी है। एक दल ईमानदारी का मुखौटा पहनकर लूटता है, तो दूसरा दल सरेआम डकैती डालता है। जनता सिर्फ तमाशा देखती है।
जब तक हम अपनी सोच नहीं बदलेंगे, जब तक हम सड़कों पर उतरकर यह मांग नहीं करेंगे कि चाहे मंत्री का बेटा हो या सफाईकर्मी का, सबकी शिक्षा एक जैसी होगी, तब तक यह देश जातियों, धर्मों और वर्गों में ऐसे ही बंटता रहेगा और नेता अपनी रोटियां सेकते रहेंगे। सरकारें सिर्फ सफेद झूठ बोलती हैं और चुनाव खत्म होते ही अपनी झोलियां भरने में लग जाती हैं।
ब्रांडवाणी समाचार आज देश के हर नागरिक से यह सवाल पूछता है—क्या आप इस दोहरी शिक्षा व्यवस्था के खिलाफ अपनी आवाज़ बुलंद करेंगे? या नेताओं के झूठ को सच मानकर अपने बच्चों का भविष्य यूँ ही अंधकार में धकेलते रहेंगे? फैसला आपका
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