आरक्षण पर नारायण त्रिपाठी का बड़ा बयान, बोले- जाति नहीं आर्थिक आधार बने पैमाना, सवर्ण आयोग पर भी उठाए सवाल

सार:

देवेश शर्मा: मध्य प्रदेश के पूर्व विधायक नारायण त्रिपाठी ने आरक्षण व्यवस्था को लेकर बड़ा बयान दिया है। उन्होंने कहा कि आरक्षण जातिगत आधार पर नहीं बल्कि आर्थिक आधार पर तय होना चाहिए। त्रिपाठी ने इसे बाबा साहब डॉ. भीमराव अंबेडकर की मूल सोच से जोड़ते हुए कहा कि इससे सर्व समाज की समभाव की परिकल्पना को मजबूती मिलेगी। उन्होंने अपने पुराने राजनीतिक अनुभव का जिक्र करते हुए तत्कालीन मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के सामने उठाई गई सवर्ण आयोग की मांग का भी उल्लेख किया और सवाल किया कि घोषणा के बाद वह आयोग आज कहां है।

विस्तार:

मध्य प्रदेश की राजनीति में आरक्षण का मुद्दा एक बार फिर चर्चा में है। पूर्व विधायक नारायण त्रिपाठी ने आरक्षण व्यवस्था को लेकर अपनी राय सामने रखते हुए कहा है कि आरक्षण का आधार जाति नहीं, बल्कि आर्थिक स्थिति होनी चाहिए। उनके इस बयान ने आरक्षण को लेकर चल रही बहस को फिर से तेज कर दिया है।

नारायण त्रिपाठी का कहना है कि समाज में समानता और समभाव की दिशा में आगे बढ़ने के लिए ऐसी व्यवस्था पर विचार होना चाहिए, जिसमें आर्थिक रूप से कमजोर व्यक्ति को उसकी आर्थिक स्थिति के आधार पर अवसर मिल सके। उन्होंने अपने बयान में कहा कि आरक्षण जातिगत आधार के बजाय आर्थिक आधार पर तय किया जाना चाहिए और उनका मानना है कि यही बाबा साहब डॉ. भीमराव अंबेडकर की मूल सोच को फलीभूत करने की दिशा में कदम होगा।

‘सर्व समाज समभाव की परिकल्पना होगी साकार’

पूर्व विधायक ने कहा कि यदि आरक्षण की व्यवस्था आर्थिक आधार से जुड़ती है तो इससे समाज के अलग-अलग वर्गों के बीच समानता और समभाव की भावना को बढ़ावा मिल सकता है। उनका जोर इस बात पर रहा कि जरूरतमंद व्यक्ति को उसकी आर्थिक स्थिति के आधार पर अवसर मिलना चाहिए।

हालांकि, आरक्षण का मौजूदा संवैधानिक ढांचा केवल आर्थिक स्थिति पर आधारित नहीं है। हाल ही में केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में भी कहा है कि एससी, एसटी और ओबीसी आरक्षण ऐतिहासिक, सामाजिक और शैक्षणिक पिछड़ेपन से जुड़ा है, केवल आर्थिक स्थिति से नहीं।

ऐसे में नारायण त्रिपाठी का बयान मौजूदा व्यवस्था और आरक्षण के आधार को लेकर एक राजनीतिक बहस को सामने रखता है। यह मुद्दा केवल आर्थिक स्थिति तक सीमित नहीं है, बल्कि सामाजिक पिछड़ेपन, ऐतिहासिक वंचना और समान अवसर जैसे व्यापक सवालों से भी जुड़ा हुआ है।

सिंधिया के बीजेपी में आने के दौर का किया जिक्र

नारायण त्रिपाठी ने अपने बयान में उस दौर का भी जिक्र किया, जब ज्योतिरादित्य सिंधिया भाजपा में शामिल हुए थे। उन्होंने बताया कि उस समय ग्वालियर-चंबल क्षेत्र में कई उपचुनाव हुए थे और पार्टी की ओर से उन्हें भी जिम्मेदारी दी गई थी।

त्रिपाठी के मुताबिक, चुनावी दौर में स्थानीय लोगों की ओर से अलग-अलग मांगें उनके सामने रखी जाती थीं। इसी दौरान उन्होंने तत्कालीन मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के सामने सवर्ण आयोग के गठन की मांग रखी थी।

उन्होंने दावा किया कि उनकी मांग पर तत्कालीन मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने सवर्ण आयोग के गठन की घोषणा की थी। त्रिपाठी का सवाल है कि घोषणा के बाद उस आयोग का क्या हुआ और आज उसकी स्थिति क्या है।

‘आयोग गया कहां?’-नारायण त्रिपाठी का सवाल

पूर्व विधायक ने सवाल उठाते हुए कहा कि जिस सवर्ण आयोग के गठन की घोषणा उस समय की गई थी, उसके बारे में आज तक स्पष्ट जानकारी सामने नहीं आई। उन्होंने पूछा कि आखिर वह आयोग कहां गया और आज अस्तित्व में क्यों नहीं है?

उनके इस बयान में आरक्षण के साथ-साथ सवर्ण समाज से जुड़े मुद्दे को भी राजनीतिक विमर्श के केंद्र में लाने की कोशिश दिखाई देती है। त्रिपाठी ने अपने पुराने राजनीतिक अनुभव का हवाला देते हुए कहा कि उन्होंने उस समय स्थानीय लोगों की मांग को तत्कालीन मुख्यमंत्री के सामने रखा था।

अब उन्होंने उसी मुद्दे को दोबारा उठाते हुए आयोग की स्थिति पर सवाल खड़े किए हैं।

आरक्षण को लेकर देशभर में जारी बहस

आरक्षण का मुद्दा लगातार देश की राजनीति और सामाजिक विमर्श में महत्वपूर्ण बना हुआ है। अगस्त 2026 में केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में दाखिल जवाब में कहा था कि एससी, एसटी और ओबीसी की पहचान और आरक्षण व्यवस्था ऐतिहासिक तथा सामाजिक पिछड़ेपन से जुड़ी हुई है। सरकार ने आय के आधार पर इन श्रेणियों के भीतर अलग सब-कोटा लागू करने की मांग का भी विरोध किया है।

वहीं, हाल के दिनों में जातिगत आरक्षण को आर्थिक आधार से जोड़ने की मांग को लेकर अलग-अलग स्थानों पर प्रदर्शन और मांगें भी सामने आई हैं। 23 अगस्त 2026 को चित्रकूट में सवर्ण समाज के लोगों ने जातिगत आरक्षण व्यवस्था खत्म कर आर्थिक आधार पर आरक्षण लागू करने की मांग को लेकर प्रदर्शन किया था।

इसी व्यापक बहस के बीच नारायण त्रिपाठी का बयान मध्य प्रदेश की राजनीति में चर्चा का विषय बन सकता है।

अंबेडकर की सोच का दिया हवाला

नारायण त्रिपाठी ने अपने बयान में आरक्षण के आर्थिक आधार की वकालत करते हुए इसे बाबा साहब डॉ. भीमराव अंबेडकर की मूल सोच से जोड़ा। उन्होंने कहा कि ऐसी व्यवस्था से सर्व समाज समभाव की परिकल्पना साकार हो सकती है।

हालांकि, आरक्षण को लेकर डॉ. अंबेडकर की भूमिका और विचारों की व्याख्या ऐतिहासिक और संवैधानिक संदर्भों में व्यापक विषय है। इसलिए त्रिपाठी का यह दावा उनके राजनीतिक दृष्टिकोण के रूप में देखा जाना चाहिए, न कि इसे बिना संदर्भ के अंबेडकर की अंतिम या सर्वमान्य व्याख्या माना जा सकता है।

सवर्ण आयोग की मांग फिर चर्चा में

नारायण त्रिपाठी के बयान का दूसरा महत्वपूर्ण हिस्सा सवर्ण आयोग को लेकर है। उन्होंने अपने राजनीतिक अनुभव को सामने रखते हुए कहा कि उन्होंने स्थानीय लोगों की मांग पर तत्कालीन मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान से सवर्ण आयोग बनाने की मांग की थी और उस समय आयोग के गठन की घोषणा भी हुई थी।

अब उनका सवाल है कि वह आयोग आज कहां है और उसका अस्तित्व क्यों नहीं दिखाई देता। इस सवाल के जरिए उन्होंने सरकार से उस पुरानी घोषणा और उसके बाद की कार्रवाई को लेकर जवाबदेही की मांग उठाई है।

आरक्षण और सवर्ण आयोग दोनों मुद्दे ऐसे विषय हैं, जिनका असर सामाजिक और राजनीतिक दोनों स्तरों पर पड़ता है। ऐसे में त्रिपाठी का बयान आने वाले दिनों में राजनीतिक बहस को और हवा दे सकता है।

नारायण त्रिपाठी ने अपने बयान के जरिए आरक्षण के मौजूदा स्वरूप पर सवाल उठाते हुए आर्थिक आधार को प्राथमिकता देने की मांग की है। साथ ही उन्होंने शिवराज सिंह चौहान के कार्यकाल में सवर्ण आयोग के गठन की कथित घोषणा का मुद्दा भी दोबारा सामने रखा है।

अब देखना यह होगा कि उनके इस बयान पर सरकार और विभिन्न सामाजिक संगठनों की ओर से क्या प्रतिक्रिया सामने आती है। वहीं, आरक्षण के आधार को लेकर देश में जारी संवैधानिक और सामाजिक बहस के बीच यह सवाल भी महत्वपूर्ण रहेगा कि सामाजिक पिछड़ेपन और आर्थिक कमजोरी को आरक्षण की नीति में किस तरह संतुलित किया जाए।

नारायण त्रिपाठी ने अपने बयान के अंत में कहा कि इस पूरे मुद्दे पर उन्होंने जो बातें कही हैं, उन्हें वीडियो के जरिए भी सुना जा सकता है।

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