
सार:
नेपाल के रसुवा क्षेत्र में आई विनाशकारी फ्लैश फ्लड के पीछे की वजह को लेकर ISRO के नेशनल रिमोट सेंसिंग सेंटर ने सैटेलाइट तस्वीरों के आधार पर प्रारंभिक आकलन किया है। रिपोर्ट के मुताबिक, तिब्बत के ऊंचे हिमालयी क्षेत्र में 4.9 तीव्रता का भूकंप ग्लेशियर के एक हिस्से के टूटने का संभावित कारण बना हो सकता है। इसके बाद बर्फ और चट्टानों का भारी मलबा नदी में गिरा और अचानक आई बाढ़ ने नेपाल के कई इलाकों में तबाही मचा दी।
विस्तार:
नेपाल में आई भीषण फ्लैश फ्लड ने पूरे हिमालयी क्षेत्र को हिलाकर रख दिया है। अचानक आई बाढ़ ने कई इलाकों में भारी तबाही मचाई और बड़ी संख्या में लोग प्रभावित हुए। इस प्राकृतिक आपदा के पीछे आखिर क्या वजह थी, इसे समझने के लिए भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन यानी ISRO की शाखा नेशनल रिमोट सेंसिंग सेंटर ने सैटेलाइट तस्वीरों का अध्ययन किया है।
NRSC के शुरुआती आकलन में सामने आया है कि इस आपदा की शुरुआत ऊंचे हिमालयी क्षेत्र में ग्लेशियर के एक हिस्से के टूटने से हुई हो सकती है। प्रारंभिक रिपोर्ट में 4.9 तीव्रता के भूकंप को ग्लेशियर के टूटने की संभावित वजह बताया गया था। इसके बाद ग्लेशियर से बर्फ और चट्टानों का भारी मलबा नीचे की ओर आया और नदी के प्रवाह को कुछ समय के लिए बाधित कर दिया। बाद में यह अवरोध टूटने से अचानक भारी मात्रा में पानी और मलबा नीचे की ओर बह निकला।
ISRO की सैटेलाइट तस्वीरों से सामने आई तस्वीर
NRSC ने भारतीय और अंतरराष्ट्रीय सैटेलाइट तस्वीरों का इस्तेमाल कर इस घटना के क्रम को समझने की कोशिश की। तस्वीरों में हिमालयी क्षेत्र में ग्लेशियर के टूटने के संकेत मिले हैं। वैज्ञानिकों के मुताबिक, ग्लेशियर के टूटने के बाद बर्फ, चट्टान और मलबे का बड़ा हिस्सा पहाड़ी ढलान से नीचे आया।
इस मलबे ने नदी के रास्ते को अस्थायी रूप से रोक दिया। इसके चलते पानी जमा होने लगा। जब यह प्राकृतिक अवरोध टूटा तो जमा पानी बेहद तेज गति से नीचे की ओर बहा और अपने साथ मिट्टी, चट्टानें और अन्य मलबा भी ले गया। इसी प्रक्रिया ने आगे चलकर विनाशकारी फ्लैश फ्लड का रूप ले लिया।
भूकंप ने ग्लेशियर को हिलाया या नहीं?
ISRO के शुरुआती आकलन में 4.9 तीव्रता के भूकंप को ग्लेशियर टूटने की संभावित वजह माना गया। हालांकि, बाद में अमेरिकी भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण यानी USGS की ओर से सामने आए विश्लेषण ने इस मामले में एक महत्वपूर्ण स्पष्टीकरण दिया है।
USGS के मुताबिक जिस भूकंपीय गतिविधि को शुरुआत में भूकंप समझा गया था, वह वास्तव में ग्लेशियर के टूटने और उसके बाद हुए मलबे के बहाव से पैदा हुई seismic energy हो सकती है। यानी यह जरूरी नहीं कि किसी भूकंप ने ग्लेशियर को तोड़ा हो; संभव है कि ग्लेशियर के टूटने की घटना ने ही भूकंप जैसी भूकंपीय तरंगें पैदा की हों।
इसलिए इस आपदा के वास्तविक ट्रिगर को लेकर वैज्ञानिक जांच अभी महत्वपूर्ण बनी हुई है। ISRO का आकलन प्रारंभिक है, जबकि अलग-अलग वैज्ञानिक एजेंसियां सैटेलाइट डेटा और भूकंपीय रिकॉर्ड का विश्लेषण कर रही हैं।
ग्लेशियर टूटा और नदी का रास्ता हुआ बाधित
फ्लैश फ्लड की सबसे खतरनाक स्थिति तब बनी जब ग्लेशियर से टूटकर आया बर्फ और चट्टानों का मलबा नदी के रास्ते में पहुंचा। पहाड़ी इलाकों में नदी का प्रवाह पहले से ही तेज होता है। ऐसे में अगर उसके रास्ते में अचानक भारी मात्रा में मलबा जमा हो जाए तो पानी का प्राकृतिक बहाव बाधित हो सकता है।
कुछ समय बाद जब यह अवरोध टूटता है तो पानी अचानक अत्यधिक वेग से नीचे की ओर जाता है। इस दौरान पानी केवल अपने साथ पानी ही नहीं ले जाता, बल्कि रास्ते में आने वाली मिट्टी, चट्टान, पेड़ और अन्य मलबे को भी बहा ले जाता है।
नेपाल में सामने आई तबाही में भी इसी तरह की प्रक्रिया के संकेत मिले हैं। सैटेलाइट तस्वीरों ने ग्लेशियर टूटने वाले क्षेत्र, नदी में बढ़े जलप्रवाह और नीचे के इलाकों में फैले बाढ़ के प्रभाव को समझने में वैज्ञानिकों की मदद की है।
कुछ ही समय में बदल गई नदी की तस्वीर
फ्लैश फ्लड की सबसे बड़ी खासियत ही यही होती है कि इसमें पानी का स्तर बेहद कम समय में तेजी से बढ़ सकता है। नेपाल की इस घटना में भी नदी का जलस्तर बहुत तेजी से बढ़ने की जानकारी सामने आई है।
रिपोर्टों के अनुसार त्रिशूली नदी प्रणाली में भी पानी का स्तर तेजी से बढ़ा। Reuters के मुताबिक, गालछी क्षेत्र में जलस्तर करीब 30 मिनट के भीतर नौ मीटर तक बढ़ने की जानकारी सामने आई।
यही तेज रफ्तार इस आपदा को इतना खतरनाक बनाती है। लोगों को संभलने या सुरक्षित स्थानों तक पहुंचने का पर्याप्त समय नहीं मिल पाता।
नेपाल और तिब्बत में भारी तबाही
फ्लैश फ्लड का असर नेपाल के साथ चीन के तिब्बत क्षेत्र तक भी पहुंचा। बाढ़ के पानी और मलबे ने सड़क, पुल, घरों और दूसरी महत्वपूर्ण संरचनाओं को नुकसान पहुंचाया।
नेपाल के रसुवा और आसपास के क्षेत्रों में स्थिति बेहद गंभीर रही। कई लोग लापता बताए गए हैं और राहत एवं बचाव दल लगातार प्रभावित क्षेत्रों में अभियान चला रहे हैं। पहाड़ी इलाकों में खराब मौसम और क्षतिग्रस्त सड़कों के कारण राहत कार्य भी चुनौतीपूर्ण बना हुआ है।
हिमालय के लिए बढ़ता खतरा
इस घटना ने एक बार फिर हिमालयी क्षेत्रों में ग्लेशियरों और अचानक आने वाली बाढ़ के खतरे को सामने ला दिया है। वैज्ञानिक लंबे समय से हिमालय में ग्लेशियरों की बदलती स्थिति और बढ़ते तापमान को लेकर चिंता जताते रहे हैं।
ग्लेशियरों का टूटना, बर्फ और चट्टानों का अचानक नीचे आना तथा नदी के प्रवाह में अचानक बदलाव जैसी घटनाएं पहाड़ी आबादी के लिए बड़ा खतरा बन सकती हैं। जलवायु परिवर्तन के कारण हिमालयी क्षेत्र में ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने को लेकर भी लगातार अध्ययन हो रहे हैं।
अभी भी जारी है कारणों की जांच
नेपाल की इस त्रासदी की पूरी तस्वीर सामने आने में अभी समय लग सकता है। ISRO और अन्य वैज्ञानिक एजेंसियों के सैटेलाइट डेटा से घटना की कड़ियों को जोड़ने में मदद मिल रही है। वहीं USGS के विश्लेषण ने शुरुआती भूकंप वाली संभावना पर महत्वपूर्ण सवाल खड़े किए हैं।
इसलिए फिलहाल यह कहना जल्दबाजी होगी कि केवल भूकंप ही इस आपदा की वजह था। उपलब्ध वैज्ञानिक आकलनों के आधार पर ग्लेशियर का टूटना और उसके बाद हुआ बर्फ-चट्टान मलबे का बहाव फ्लैश फ्लड की मुख्य कड़ी दिखाई दे रहा है।
नेपाल की इस त्रासदी ने यह भी दिखाया है कि हिमालयी क्षेत्रों में प्राकृतिक आपदाएं कितनी तेजी से विकराल रूप ले सकती हैं। सैटेलाइट तकनीक ऐसी घटनाओं के कारणों को समझने, प्रभावित क्षेत्रों का आकलन करने और भविष्य में आपदा जोखिम कम करने के लिए बेहद महत्वपूर्ण साबित हो रही है। ISRO का यह प्रारंभिक अध्ययन भी इसी दिशा में एक अहम वैज्ञानिक इनपुट माना जा रहा है।
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