
सार
झांसी के बुंदेलखंड विश्वविद्यालय में शिक्षक दिवस और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के शताब्दी वर्ष के अवसर पर ‘शिक्षक संवाद’ कार्यक्रम आयोजित किया गया। मुख्य अतिथि प्रज्ञा प्रवाह के राष्ट्रीय समन्वयक जे. नन्द कुमार ने शिक्षकों से भारतीय ज्ञान परंपरा, संस्कृति और साहित्य को शिक्षा से जोड़ने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि शिक्षक समाज में वैचारिक और सांस्कृतिक चेतना के वाहक हैं और विद्यार्थियों में ज्ञान के साथ विवेक, आत्मविश्वास तथा सामाजिक उत्तरदायित्व विकसित करने की जिम्मेदारी भी उनकी है।
विस्तार
बुंदेलखंड विश्वविद्यालय, झांसी में शिक्षक दिवस और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के शताब्दी वर्ष के अवसर पर ‘शिक्षक संवाद’ कार्यक्रम का आयोजन किया गया। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि प्रज्ञा प्रवाह के राष्ट्रीय समन्वयक जे. नन्द कुमार रहे। उन्होंने शिक्षा व्यवस्था में भारतीय ज्ञान परंपरा, संस्कृति और साहित्य के महत्व पर अपने विचार रखे।
जे. नन्द कुमार ने कहा कि औपनिवेशिक सोच और अपनी संस्कृति एवं साहित्य की विस्मृति देश के विकास की राह में बड़ी बाधा है। उनके अनुसार भारतीय ज्ञान परंपरा को शिक्षा से जोड़कर ही समाज और शिक्षा व्यवस्था में व्यापक बदलाव लाया जा सकता है। उन्होंने शिक्षकों से आह्वान किया कि वे विद्यार्थियों तक भारतीय ग्रंथों, साहित्य, संस्कृति और सभ्यता से जुड़े ज्ञान को पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएं।
गीता के श्लोकों का उल्लेख करते हुए उन्होंने शिक्षा और अध्यापन को राष्ट्र निर्माण से जोड़ने की बात कही। उन्होंने कहा कि शिक्षक को व्यक्तिगत स्वार्थ और आकांक्षाओं से ऊपर उठकर ऐसा आचरण प्रस्तुत करना चाहिए, जिससे नई पीढ़ी में सांस्कृतिक चेतना और राष्ट्र के प्रति जिम्मेदारी का भाव विकसित हो।
अपने संबोधन में जे. नन्द कुमार ने औपनिवेशिकरण के प्रभावों का उल्लेख करते हुए कहा कि भारतीय संस्कृति, सभ्यता और ग्रंथों की समझ को प्रभावित किया गया। उन्होंने कहा कि नई पीढ़ी को अपने इतिहास और भारतीय बौद्धिक परंपरा की जानकारी से जोड़ना जरूरी है और शिक्षक इस ज्ञान को अगली पीढ़ी तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।
उन्होंने देश को विकसित बनाने के संदर्भ में ‘सिक्स आई’ की अवधारणा भी प्रस्तुत की। उन्होंने इसके अंतर्गत Insensitive, Ignorance, Irreverence, Ill-will, Inaction और Incompetent जैसे बिंदुओं को विस्तार से समझाया। उन्होंने कहा कि समाज की चेतना को संवेदनशील, सक्रिय और सक्षम बनाने के लिए अपनी ज्ञान परंपरा तथा महापुरुषों के विचारों से जुड़ना आवश्यक है।
जे. नन्द कुमार ने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा केवल अतीत का विषय नहीं है। इसे वर्तमान की समस्याओं और भविष्य की आवश्यकताओं से जोड़कर देखने की जरूरत है। उनके अनुसार भारतीय ज्ञान परंपरा तभी सार्थक होगी, जब वह आज के सामाजिक प्रश्नों के समाधान में उपयोगी साबित हो।
उन्होंने स्वामी विवेकानंद के प्रसिद्ध भाषण ‘फ्यूचर ऑफ इंडिया’ का उल्लेख करते हुए शिक्षकों से देश के गौरव और आत्मविश्वास को पुनर्जीवित करने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि अतीत की निराशाओं को पीछे छोड़कर भविष्य के निर्माण की जिम्मेदारी नई पीढ़ी और समाज को अपने हाथों में लेनी होगी।
उन्होंने शिक्षकों को शिक्षक दिवस की शुभकामनाएं देते हुए कहा कि विद्यार्थियों में केवल किताबी ज्ञान ही नहीं, बल्कि विवेक, आत्मविश्वास और सामाजिक उत्तरदायित्व की भावना भी विकसित की जानी चाहिए। शिक्षा का वास्तविक प्रभाव तब दिखाई देता है, जब विद्यार्थी अपने ज्ञान और क्षमता का उपयोग समाज एवं राष्ट्र के हित में करने की भावना रखते हैं।
कार्यक्रम की अध्यक्षता बुंदेलखंड विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर मुकेश पांडेय ने की। स्वागत भाषण में उन्होंने विश्वविद्यालय की प्रगति और शिक्षा के क्षेत्र में किए जा रहे कार्यों की जानकारी दी। उन्होंने कहा कि शिक्षक राष्ट्र और समाज निर्माण की आधारशिला हैं। शिक्षकों से प्राप्त ज्ञान, संस्कार और मार्गदर्शन का प्रभाव विद्यार्थी के पूरे जीवन पर रहता है।
कुलपति ने कहा कि बदलते समय के अनुरूप शिक्षकों को नवीन ज्ञान और तकनीक को अपनाने के साथ भारतीय जीवन मूल्यों और सांस्कृतिक चेतना को भी शिक्षा का अभिन्न हिस्सा बनाना चाहिए।
कार्यक्रम का संचालन प्रो. अनुपम व्यास ने किया। इस अवसर पर बुंदेलखंड इंस्टीट्यूट ऑफ इंजीनियरिंग एंड टेक्नोलॉजी के निदेशक, पीके विश्वविद्यालय के कुलपति एवं निदेशक, विभिन्न महाविद्यालयों के प्राचार्य, मेडिकल कॉलेज, कृषि, फार्मेसी, आयुर्वेद और अन्य शैक्षणिक संस्थानों के शिक्षक एवं अधिकारी मौजूद रहे।
कार्यक्रम में प्रो. टीके शर्मा, प्रो. एसके राय, प्रो. चंद्र चौहान, डॉ. जितेंद्र मिश्र, डॉ. ओमशंकर चौरसिया, डॉ. राजीव दीक्षित, डॉ. मोनिका त्रिपाठी, डॉ. विवेक गुप्ता, डॉ. नीरज कुमार, डॉ. राघवेंद्र दीक्षित खरे सहित बड़ी संख्या में शिक्षक और शिक्षाविद् शामिल हुए।
अंत में विश्वविद्यालय परिवार की ओर से मुख्य वक्ता के प्रति आभार व्यक्त किया गया। वक्ताओं ने कहा कि कार्यक्रम में दिए गए विचार शिक्षकों के लिए ज्ञानवर्धक और प्रेरणादायी रहे तथा राष्ट्र निर्माण की दिशा में मार्गदर्शन देने वाले हैं। कल्याण मंत्र के साथ कार्यक्रम का समापन हुआ।
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