
भारतीय राजनीति के केंद्र में आज एक ऐसा प्रश्न आकार ले रहा है, जिसकी गूंज सत्ता के गलियारों में असहजता पैदा कर रही है। जिस ब्राह्मण वर्ग को दशकों तक भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) की वैचारिक रीढ़, आधारशिला और सबसे विश्वसनीय ‘कोर वोटर‘ माना गया, क्या वही समाज आज अपने ही बनाए राजनीतिक दुर्ग में उपेक्षित, उपहासित और हाशिए पर धकेल दिया गया है? उत्तर प्रदेश से लेकर मध्य प्रदेश और दिल्ली के सत्ता प्रतिष्ठानों तक, यह सवाल अब केवल कानाफूसी तक सीमित नहीं है, बल्कि समाज के भीतर असंतोष, आत्ममंथन और राजनीतिक बगावत की चिनगारी बनकर सुलग रहा है।
सत्ता का नया सामाजिक समीकरण और ब्राह्मण समाज की उपेक्षा
भारतीय जनता पार्टी के उदय के कालखंड का यदि निष्पक्ष विश्लेषण किया जाए, तो यह स्पष्ट दिखता है कि जनसंघ से लेकर भाजपा की यात्रा में ब्राह्मण वर्ग ने केवल वोट ही नहीं दिया, बल्कि संगठन को वैचारिक विस्तार, बौद्धिक आधार और निष्ठावान नेतृत्व भी सौंपा। विपरीत परिस्थितियों में जब भगवा राजनीति को अस्पृश्य माना जाता था, तब ब्राह्मण मतदाता किसी भी प्रकार के तात्कालिक राजनीतिक लाभ के बिना संघ और भाजपा के पीछे एक चट्टान की तरह खड़ा रहा।
किंतु पिछले एक दशक में चुनावी गणित पूरी तरह बदल चुका है। भाजपा की रणनीति अब ‘सर्वसमावेशी राजनीति‘ और ‘सबका साथ‘ के आवरण में गैर-यादव ओबीसी, दलित और अन्य बहुसंख्यक उप-जातियों को साधने पर केंद्रित हो गई है। चुनावी विजय हासिल करने की इस अंधी दौड़ में पारंपरिक निष्ठावान मतदाता को ‘गारंटीड‘ या ‘बंधुआ‘ मान लिया गया। सत्ता प्रतिष्ठान की मानसिकता यह बन चुकी है कि ब्राह्मण के पास वैचारिक रूप से संघ और भाजपा के अलावा जाने का कोई दूसरा विकल्प नहीं है। इसी निश्चिंतता ने सत्ता में बैठे रणनीतिकारों को इस समाज की अनदेखी करने की असीमित छूट दे दी।
उत्तर प्रदेश ठाकुर बनाम ब्राह्मण का सत्ता संतुलन
हिंदी पट्टी के सबसे निर्णायक राज्य उत्तर प्रदेश की बात करें तो स्थिति बेहद संवेदनशील हो चुकी है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के शासनकाल में यह धारणा जमीनी स्तर पर गहरी हो चुकी है कि शासन और प्रशासन के शीर्ष पदों, नीतिगत फैसलों और राजनीतिक प्रभाव में क्षत्रिय यानी ठाकुर वर्ग को अघोषित प्राथमिकता हासिल है।
प्रशासनिक स्तर पर ब्राह्मण अधिकारियों को महत्वपूर्ण पदों से दूर रखे जाने, थानों और जनपदों की कमान में एकतरफा झुकाव और राजनीतिक निर्णयों में ब्राह्मण प्रतिनिधियों की निष्प्रभावी भूमिका ने असंतोष को बढ़ाया है। कई मौकों पर ब्राह्मण वर्ग से जुड़े मुद्दों पर प्रशासन की कठोरता और अन्य वर्गों के प्रति नरम रवैये ने समाज के भीतर यह संदेश दिया कि नए उत्तर प्रदेश में उनकी हैसियत दोयम दर्जे की हो चुकी है। विकास दुबे कांड से लेकर लगातार घटी घटनाओं में समाज के बौद्धिक वर्ग ने यह महसूस किया कि सत्ता में संतुलन के नाम पर केवल एक ही वर्ग का दबदबा स्थापित किया गया है।
मध्य प्रदेश ओबीसी-यादव कार्ड और हाशिए पर पारंपरिक नेतृत्व
मध्य प्रदेश की राजनीति ने भी हाल के वर्षों में एक अप्रत्याशित करवट ली है। वर्षों तक ब्राह्मण, वैश्य और सवर्ण नेतृत्व के मजबूत ताने-बाने पर टिकी राजनीति को दरकिनार कर जब मोहन यादव को मुख्यमंत्री की कुर्सी सौंपी गई, तो इसे भाजपा के बड़े सामाजिक प्रयोग के रूप में प्रस्तुत किया गया। मोहन यादव सरकार की प्राथमिकताओं में यादव और पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) राजनीति को मुख्य धारा में रखना शीर्ष पर दिखाई देता है।
मध्य प्रदेश में सरकार और संगठन, दोनों ही स्तरों पर यह संदेश गया है कि सवर्णों का प्रभाव अब समाप्तप्राय है। राज्य के सत्ता तंत्र में ब्राह्मण नेताओं की हैसियत केवल औपचारिकता निभाने तक सीमित कर दी गई है। सरकारी योजनाओं, प्रशासनिक पदों और संगठनात्मक नियुक्तियों में पिछड़ा वर्ग की प्रधानता ने ब्राह्मण युवाओं और कार्यकर्ताओं में निराशा भर दी है। जो ब्राह्मण कार्यकर्ता बूथ स्तर पर पसीना बहाते थे, वे आज जिला और मंडल स्तर पर अपने ही काम कराने के लिए संघर्ष करते नजर आ रहे हैं।
केंद्र का मिजाज और संघ की दूरी जब अपने ही पते बदल गए
राज्य सरकारों की उपेक्षा तो एक पहलू है, किंतु ब्राह्मण समाज के लिए सबसे अधिक पीड़ादायक स्थिति केंद्र और स्वयं राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के बदले हुए व्यवहार से उत्पन्न हुई है। केंद्र की मोदी सरकार के पूरे ढांचे में सवर्ण वर्ग, विशेष रूप से ब्राह्मण समाज का राजनीतिक प्रतिनिधित्व निरंतर प्रतीकात्मक होता चला गया है। बड़े नीतिगत फैसलों में समाज की आर्थिक, सामाजिक और सुरक्षा संबंधी चिंताओं को कभी प्राथमिकता नहीं मिली।
इससे भी आगे, जो सबसे बड़ा आघात इस वर्ग को लगा है, वह है आरएसएस का बदला हुआ रुख। कभी ब्राह्मण समाज का कार्यकर्ता संघ कार्यालय को अपना स्वाभाविक घर और संघ प्रचारकों को अपना पारिवारिक मार्गदर्शक मानता था। आज वही कार्यकर्ता यह शिकायत कर रहा है कि संघ के शीर्ष और क्षेत्रीय पदाधिकारियों का व्यवहार अब पहले जैसा सहज नहीं रहा।
सत्ता की निकटता ने संघ के तंत्र को भी राजनीतिक रूप से अधिक व्यावहारिक और समाज के प्रति उदासीन बना दिया है। ज़मीनी कार्यकर्ताओं का यह कटु अनुभव है कि संकट के समय ब्राह्मण समाज के लोगों के फोन तक नहीं उठाए जाते, उनके सामाजिक मुद्दों पर चुप्पी साध ली जाती है, जबकि अन्य आक्रामक जातियों के दबाव में संगठन तुरंत नतमस्तक हो जाता है।
चंद ‘तोता-मैना‘ नेताओं की खरीद-फरोख्त और बंधुआ वोट बैंक का भ्रम
भाजपा की चुनावी रणनीति का सबसे कमजोर और छलावा भरा पहलू यह है कि वह पूरे समाज की समस्याओं का समाधान करने के बजाय समाज के 10-12 रसूखदार नेताओं को पद, टिकट या मंत्री पद देकर यह मान लेती है कि पूरा ब्राह्मण समाज संतुष्ट हो गया।
इन तथाकथित ब्राह्मण नेताओं की स्थिति सत्ता में ‘शोपीस‘ से अधिक नहीं होती। न तो वे समाज के युवाओं के लिए रोजगार के अवसर जुटा पाते हैं, न ही प्रशासनिक प्रताड़ना के समय समाज के पक्ष में खुलकर खड़े हो पाते हैं। जब-जब समाज पर कोई संकट आता है, ये नेता अपनी कुर्सी और टिकट बचाने के भय से मौन साध लेते हैं। भाजपा का यह सोचना कि मुट्ठी भर नेताओं को ठूंसे-मुड़े पद देकर पूरे ब्राह्मण समाज को भरमाया जा सकता है, एक आत्मघाती मुगालता साबित हो सकता है। समाज का पढ़ा-लिखा और जागरूक युवा अब इन दरबारी नेताओं के चेहरे और चरित्र को भली-भांति पहचान चुका है।
आर्थिक बदहाली और नीतिगत उपेक्षा का शिकार युवा
‘ब्राह्मण‘ शब्द का नाम आते ही कुछ लोग इसे विशेषाधिकार प्राप्त वर्ग मान लेते हैं, जबकि धरातल की वास्तविकता इसके सर्वथा विपरीत है। आज ब्राह्मण समाज का एक बहुत बड़ा हिस्सा गंभीर आर्थिक संकट और दरिद्रता से जूझ रहा है:
· मंदिरों के पुजारियों और कर्मकांडियों की दुर्दशा: धार्मिक आयोजनों और पूजा-पाठ से जीवन यापन करने वाले लाखों ब्राह्मण परिवार आज भी न्यूनतम आर्थिक सुरक्षा और सामाजिक बीमा से वंचित हैं।
· आरक्षण की दोहरी मार: आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS) का 10 प्रतिशत आरक्षण ऊंट के मुंह में जीरा साबित हुआ है, जिसमें कट-ऑफ अंक इतने ऊंचे चले जाते हैं कि साधारण परिवार का मेधावी छात्र भी अवसरों से वंचित रह जाता है।
· बेरोजगारी और पलायन: न पुश्तैनी बड़ी जमीनें और न ही जातिगत आरक्षण का सुरक्षा कवच—इसके चलते ब्राह्मण युवा शहरों में अल्प वेतन की नौकरियों में पिसने को मजबूर है।
· एट्रोसिटी एक्ट का दुरुपयोग: समाज के साधारण लोगों को झूठे मुकदमों में फंसाए जाने पर सत्ता में कोई भी उनकी पैरवी करने वाला नहीं होता।
ऐतिहासिक अवसर क्या ब्राह्मण अपनी राजनीतिक ताकत दिखाएगा?
अब प्रश्न यह उठता है कि क्या ब्राह्मण समाज हमेशा की तरह केवल एक आज्ञाकारी, मौन और अनुशासित मतदाता बना रहेगा, या फिर वह सत्ता को अपनी राजनीतिक अपरिहार्यता का अहसास कराएगा?
इतिहास साक्षी है कि जब-जब ब्राह्मण वर्ग ने अपनी चुप्पी तोड़ी है, तब-तब दिल्ली और राज्यों के तख्त पलट गए हैं। 1980 के दशक के अंत में कांग्रेस से मोहभंग होने के बाद ब्राह्मण समाज ने ही भाजपा को राष्ट्रीय पटल पर खड़ा किया था। यदि आज वही समाज यह महसूस कर रहा है कि उसका उपयोग केवल ‘वोट बैंक‘ की तरह किया गया और सत्ता मिलते ही उसे कचरे के डिब्बे में फेंक दिया गया, तो उसके पास अपने राजनीतिक स्वाभिमान को पुनः प्राप्त करने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचता।
यदि ब्राह्मण समाज ने इस बार भी अपनी अनदेखी को स्वीकार कर लिया और चंद नेताओं के खोखले वादों के फेर में आकर वही गलती दोहराई, तो आने वाले समय में उसकी राजनीतिक प्रासंगिकता पूरी तरह समाप्त हो जाएगी। आने वाले चुनाव केवल किसी दल की जीत या हार का फैसला नहीं करेंगे, बल्कि वे यह तय करेंगे कि ब्राह्मण समाज सत्ता के सामने याचक बनकर रहेगा या अपनी शर्तों पर राजनीति की दिशा तय करने वाला निर्णायक शक्ति-केंद्र बनेगा।
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