मध्य प्रदेश में ‘कफ़न’ पर भी खेल: 148 में से 101 पुराने और खटारा शव वाहन उतारे, 17 जिलों से गाड़ियाँ नदारद, NHM और मुख्य सचिव की चुप्पी पर उठे सवाल

मध्य प्रदेश में इंसान की मौत के बाद मिलने वाले अंतिम सम्मान पर भी सरकारी तंत्र और निजी एजेंसी के गठजोड़ ने सेंध लगा दी है। गरीब, असहाय और जरूरतमंद परिवारों को अस्पताल या घर से श्मशान घाट अथवा कब्रिस्तान तक सम्मानपूर्वक पार्थिव शरीर पहुँचाने के लिए सरकार ने गाजे-बाजे के साथ ‘निःशुल्क शव वाहन सेवा’ का ऐलान किया था। दावा था कि प्रदेश के सभी 55 जिलों में 148 ब्रांड न्यू (सर्वथा नए) शव वाहन दौड़ेंगे, ताकि शोकाकुल परिजनों को अपनों के शव कंधों, ठेलों या बाइकों पर न ढोने पड़ें।

मगर ज़मीनी हकीकत इसके बिल्कुल उलट और रूह कंपा देने वाली है। ब्रांडवाणी समाचार की विस्तृत पड़ताल में सामने आया है कि इस संवेदनशील योजना को भ्रष्टाचार और लापरवाही की दीमक ने लील लिया है। नए वाहनों के नाम पर सड़कों पर कबाड़ और खटारा गाड़ियाँ उतार दी गईं। पूर्व में इस पूरे गोरखधंधे की परतें खुलने और मीडिया द्वारा दस्तावेजी साक्ष्य सामने रखने के बावजूद राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (NHM) के मिशन संचालक (MD), अपर मिशन संचालक (Add. MD) और यहाँ तक कि राज्य की सर्वोच्च प्रशासनिक धुरी यानी मुख्य सचिव (Chief Secretary) ने इस गंभीर मामले में कोई दंडात्मक या सुधारात्मक कदम नहीं उठाया। आला अधिकारियों की इस चुप्पी ने यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि आखिर किस प्रभाव और दबाव के चलते इस पूरे खेल पर पर्दा डाला जा रहा है?

कागज़ों पर नई सेवा, ज़मीन पर 2 से 3 लाख किमी चल चुके ‘खटारा‘

वाहन आपूर्ति और संचालन की निविदा (टेंडर) व अनुबंध की प्राथमिक और सबसे अनिवार्य शर्त यह थी कि सेवा शुरू होने की तिथि पर कोई भी वाहन एक वर्ष से अधिक पुराना नहीं होना चाहिए। इसके साथ ही यह सुनिश्चित किया जाना था कि गाड़ियाँ तकनीकी रूप से पूरी तरह सुदृढ़, जीपीएस सुसज्जित और शोकाकुल परिवारों को बिना किसी रुकावट के सेवा देने में सक्षम हों।

अनुबंध की इस बुनियादी शर्त को एजेंसी और स्वास्थ्य विभाग के जिम्मेदारों ने मिलकर ताक पर रख दिया। 148 वाहनों के बेड़े की पड़ताल करें तो चौकाने वाले आँकड़े सामने आते हैं:

· कुल स्वीकृत वाहन: 148

· अनुबंध के विपरीत पुराने वाहन: 101 (लगभग 68% बेड़ा पुराना)

· वर्ष 2020 मॉडल के वाहन: 41 गाड़ियाँ

· वर्ष 2022 मॉडल के वाहन: 60 गाड़ियाँ

· वर्ष 2024 मॉडल का वाहन: मात्र 01

· वर्ष 2025 मॉडल के नए वाहन: केवल 46

हैरानी की बात यह है कि जो 101 पुराने वाहन सेवा में झोंक दिए गए, उनमें से कई गाड़ियाँ पहले ही 2 लाख से 3 लाख किलोमीटर तक का सफर तय कर चुकी हैं। इन गाड़ियों की बॉडी जर्जर है, इंजन दम तोड़ रहे हैं और कई का फिटनेस सर्टिफिकेट तक खत्म हो चुका है। जिस गाड़ी को किसी भी समय रास्ते में बंद हो जाने का खतरा हो, उसमें किसी का पार्थिव शरीर अंतिम संस्कार के लिए भेजा जा रहा है।

खटारा गाड़ियों पर हर महीने 85.84 लाख का ‘शाही‘ भुगतान

इस पूरे मामले में वित्तीय गड़बड़ी का दायरा करोड़ों रुपये में फैला हुआ है। सेवा अनुबंध के तहत संचालन एजेंसी को प्रति वाहन 58,000 रुपये प्रतिमाह की दर से भुगतान किया जा रहा है।

· प्रति वाहन मासिक खर्च: ₹58,000

· 148 वाहनों का मासिक बिल: ₹85,84,000 (पचासी लाख चौरासी हजार रुपये)

· वार्षिक सरकारी भुगतान: ₹10,30,08,000 (दस करोड़ तीस लाख आठ हजार रुपये)

जनता की गाढ़ी कमाई से हर साल सवा दस करोड़ रुपये से अधिक की राशि उस एजेंसी की जेब में जा रही है, जिसने सरकार को खुलेआम ठगा है। जिस एजेंसी को नए वाहनों के संचालन के आधार पर यह राशि स्वीकृत की गई, वह 4-5 साल पुरानी, स्क्रैप होने की कगार पर खड़ी गाड़ियाँ चलाकर पूरा मुनाफा काट रही है। रखरखाव, ईंधन और फिटनेस के नाम पर किए जा रहे दावों की पोल तब खुल जाती है जब बीच सड़क पर शव वाहन खराब हो जाते हैं और परिजनों को धक्का लगाना पड़ता है।

ज़मीनी पड़ताल, 17 ज़िलों से वाहन गायब, राजधानी में 50% बेड़ा ठप

सरकारी नियमों के मुताबिक, स्वास्थ्य अधोसंरचना के आधार पर वाहनों का आवंटन तय किया गया था। नियम यह है कि:

1. सामान्य जिलों में: न्यूनतम 02-02 शव वाहन।

2. मेडिकल कॉलेज वाले संभाग/जिलों में: 04-04 शव वाहन।

सेवा शुरू हुए एक वर्ष से अधिक का समय बीत चुका है, लेकिन ज़मीनी स्थिति यह है कि कागजों में दर्ज 17 वाहन संबंधित जिलों में मौजूद ही नहीं हैं। जब शोकाकुल परिवार 108 या संबंधित हेल्पलाइन पर फोन करते हैं, तो उन्हें सीधा जवाब मिलता है कि वाहन उपलब्ध नहीं है।

ज़िलों का रियलिटी चेक:

· भोपाल (राजधानी): प्रदेश के प्रशासनिक केंद्र में आवंटित 4 में से 2 शव वाहन पूरी तरह खराब पड़े हैं। इनमें से एक वाहन का फिटनेस प्रमाण-पत्र तक एक्सपायर हो चुका है।

· नीमच और रतलाम: दोनों जिलों में निर्धारित कोटे के 2-2 वाहन अपने तय स्थान पर मौजूद ही नहीं हैं।

· सिवनी: यहाँ भी 2 वाहन नदारद हैं; ग्रामीण क्षेत्रों के लोग शव को घर ले जाने के लिए निजी वाहनों को मनमाना किराया देने पर मजबूर हैं।

· जबलपुर (संस्कारधानी): यहाँ 2 शव वाहन लंबे समय से तकनीकी खराबी के चलते धूल खा रहे हैं।

· इंदौर और शहडोल: संभाग स्तरीय व्यवस्था होने के बावजूद यहाँ केवल 3-3 वाहन ही काम कर रहे हैं, शेष वाहन बंद या अनुपलब्ध हैं।

· रीवा (उप-मुख्यमंत्री का गृह जिला): यहाँ भी विसंगति चरम पर है। उप-मुख्यमंत्री के गृह क्षेत्र तक में एजेंसी ने 2 पुराने मॉडल के शव वाहन थमा दिए हैं।

विदिशा CMHO ने दिखाई रीढ़, तो बाकियों ने आँखें क्यों मूँदीं?

इस पूरे भ्रष्टाचार और मनमानी के बीच विदिशा के मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी (CMHO) का रुख यह साबित करता है कि अगर अधिकारी चाहें तो नियमों का पालन कराया जा सकता है।

जब संचालन एजेंसी ने विदिशा जिले में पुराने और जर्जर वाहन भेजने की कोशिश की, तो विदिशा CMHO ने उन्हें स्वीकार करने से दो टूक इनकार कर दिया। उन्होंने स्पष्ट लिखा कि अनुबंध की शर्तों के अनुसार नए वाहन ही लिए जाएँगे। नतीजा यह हुआ कि एजेंसी और विभाग को झुकना पड़ा और विदिशा को सभी 4 नए वाहन (2025 मॉडल) उपलब्ध कराने पड़े।

अब सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि जो हिम्मत और नियम-निष्ठा विदिशा के CMHO ने दिखाई, वह प्रदेश के बाकी 54 जिलों के मुख्य चिकित्सा अधिकारियों, क्षेत्रीय स्वास्थ्य संचालकों और संभागीय आयुक्तों ने क्यों नहीं दिखाई? क्या अन्य जिलों के अधिकारियों को इन खटारा गाड़ियों से जनता को हो रही परेशानी नज़र नहीं आई, या फिर एजेंसी के साथ ‘मौन सहमति‘ का कोई खेल चल रहा था?

पूर्व खुलासों के बाद भी NHM MD, Add. MD और मुख्य सचिव की चुप्पी

यह पहला मौका नहीं है जब इस घोटाले की गूँज प्रशासनिक गलियारों में पहुँची हो। पूर्व में भी मीडिया और विभिन्न माध्यमों से इस धांधली की विस्तृत रिपोर्ट शासन के शीर्ष पदों तक पहुँचाई गई थी। दस्तावेज़ों के साथ बताया गया था कि किस प्रकार 2020 और 2022 मॉडल की गाड़ियाँ सप्लाई कर करोड़ों का बिल पास कराया जा रहा है।

बावजूद इसके:

1. मिशन संचालक (NHM MD): जिनके कंधों पर राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन की योजनाओं की शुचिता बनाए रखने का जिम्मा है, उन्होंने इस अनुबंध का ऑडिट कराने या एजेंसी पर पेनाल्टी लगाने की जहमत नहीं उठाई।

2. अपर मिशन संचालक (Add. MD): मॉनिटरिंग और मैदानी निरीक्षण के जिम्मेदार अधिकारी फाइलों के निस्तारण और लीपापोती तक सीमित रहे।

3. मुख्य सचिव (Chief Secretary): राज्य की प्रशासनिक मशीनरी के मुखिया तक बात पहुँचने के बाद भी किसी उच्चस्तरीय जाँच समिति का गठन नहीं हुआ, न ही एजेंसी को ब्लैकलिस्ट करने का कोई नोटिस जारी किया गया।

शीर्ष स्तर पर बैठे नीति-नियंताओं का यह टालमटोल वाला रवैया कई गंभीर सवाल खड़े करता है:

· क्या निजी एजेंसी इतनी रसूखदार है कि वह शासन की शर्तों को खुलेआम कुचल सकती है?

· प्रति माह जारी होने वाले 85.84 लाख रुपये के बिलों का सत्यापन किए बिना भुगतान किसके हस्ताक्षर से और किसके संरक्षण में हो रहा है?

· कागजों पर 148 वाहन दिखाकर 17 गायब वाहनों का पैसा कौन डकार रहा है?

जनता की बेबसी और सरकार की साख

‘निःशुल्क शव वाहन सेवा‘ केवल एक सरकारी अनुबंध नहीं, बल्कि मानवीय संवेदनाओं से जुड़ा प्रकल्प है। किसी प्रियजन को खोने के बाद जब कोई निर्धन व्यक्ति अस्पताल के बाहर खड़े होकर वाहन के लिए गिड़गिड़ाता है और उसे बताया जाता है कि गाड़ी खराब है या उपलब्ध नहीं है, तो यह केवल योजना की विफलता नहीं होती, बल्कि पूरे शासन तंत्र की संवेदनहीनता का प्रमाण होती है।

प्रदेश के कई दूरदराज इलाकों से आए दिन ऐसी हृदयविदारक तस्वीरें सामने आती हैं जहाँ कभी पिता अपने बच्चे के शव को झोले में ले जाने को विवश होता है, तो कभी बेटे को अपनी माँ की देह ठेले पर रखकर ले जानी पड़ती है। इन तस्वीरों के पीछे स्वास्थ्य विभाग का वह भ्रष्टाचार छिपा है, जहाँ 10 करोड़ रुपये सालाना खर्च करने के बाद भी जनता को कबाड़ गाड़ियाँ दी जा रही हैं।

ब्रांडवाणी समाचार यह सवाल सीधे सरकार के नुमाइंदों और शीर्ष नौकरशाही से पूछता है: क्या अब भी फाइलों को दबाए रखा जाएगा? क्या NHM प्रबंधन और मुख्य सचिव अब कोई दंडात्मक कार्रवाई करेंगे, अनुबंध निरस्त कर रिकवरी निकालेंगे, या फिर शोक संतप्त परिवारों की बेबसी पर इसी तरह आंखें मूँदे रखी जाएँगी? देखना यह है कि इस खुलासे के बाद वल्लभ भवन की कुर्सियों पर बैठे जिम्मेदार कब जागते हैं।

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gaurav singh rajput

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