
भोपाल। देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था में एक शाश्वत प्रश्न वर्षों से हवा में तैर रहा है क्या भ्रष्टाचार केवल निचले स्तर का लिपिक, कोई अदना सा कर्मचारी या फाइलों को एक मेज से दूसरी मेज तक सरकाने वाला कोई बिचौलिया ही करता है? जब देश के शीर्ष नीति-नियंता लाखों रुपये के परिधान धारण करते हैं, जिनकी कीमत उनकी आधिकारिक पगार और घोषित आय से कई गुना अधिक होती है, तब क्या कोई संवैधानिक संस्था उनसे हिसाब मांगने का साहस जुटा पाती है? क्या किसी जांच एजेंसी में यह सामर्थ्य है कि वह सत्ता के सर्वोच्च सोपानों पर बैठे महारथियों को कटघरे में खड़ा कर सके?
कटु सत्य यह है कि इस तंत्र में न्याय की परिभाषा पद और प्रभाव के साथ बदल जाती है। भ्रष्टाचार के हर बड़े खेल में अंततः एक मोहरा चुना जाता है, जिसे बलि का बकरा बनाकर व्यवस्था अपनी कालिख पोंछ लेती है। शीर्ष पर बैठे नीति-निर्माता सुरक्षित रहते हैं और नीचे काम करने वाला प्यादा समाज में ‘महाठग’ घोषित कर दिया जाता है।
सत्ता का वैभव बनाम कागजी वेतन का अंतर्विरोध
प्रशासनिक और राजनीतिक सेवा के सर्वोच्च पदों पर बैठे व्यक्तियों का औपचारिक वेतन प्रतिमाह ढाई लाख से तीन लाख रुपये के आसपास सीमित होता है। आयकर विवरणियों (आईटीआर) में उनकी संपत्ति एक साधारण मध्यमवर्गीय आंकड़े के रूप में दर्ज की जाती है। किंतु जमीनी यथार्थ इसके सर्वथा विपरीत है। उनके बच्चों की संपत्तियां, उनकी जीवनशैली, विदेशों में अध्ययन और अघोषित निवेश हजारों गुना की दर से बढ़ते हैं।
यदि आधिकारिक आमदनी सीमित है, तो फिर आलीशान प्रासादों, करोड़ों के फार्महाउसों और दैनिक विलासिता के खर्चों का स्रोत क्या है? जब कोई मुख्यमंत्री या प्रभावशाली राजनेता अरबों रुपये की सरकारी अथवा वनभूमि का बंदरबांट कर देता है, तो उसे ‘विकास नीति’ या ‘प्रशासनिक निर्णय’ का आवरण पहना दिया जाता है। राजनीतिक दलों के बहुमंजिला अत्याधुनिक कार्यालयों के निर्माण और सत्ता समीकरणों को संतुलित रखने के लिए अरबों रुपये का जो गुप्त प्रवाह चलता है, उसकी भरपाई इसी तंत्र के भीतरी गलियारों से होती है। इस पूरे वित्तीय चक्रव्यूह को संचालित करने के लिए व्यवस्था को एक माध्यम की आवश्यकता होती है और यहीं से जन्म होता है उस किरदार का, जिसे प्रशासनिक शब्दावली में ‘लाइजनर’ और आम बोलचाल में ‘दलाल’ कहा जाता है।
लाइजनर, व्यवस्था का अनौपचारिक पहिया और पूर्व-निर्धारित शिकार
व्यवस्था जब अपने अनैतिक कार्यों को अंजाम देती है, तो वह सीधे अपने नाम पर जोखिम नहीं लेती। हर दौर में ऐसे चेहरे तैयार किए जाते हैं जो राजनेताओं, वरिष्ठ नौकरशाहों और पूंजीपतियों के बीच संपर्क सूत्र बनते हैं। ये बिचौलिये तंत्र की आवश्यकता होते हैं; इन्हीं के माध्यम से सौदे तय होते हैं और अघोषित संपत्तियों का हस्तांतरण होता है।
किंतु इस व्यवस्था का अलिखित नियम अत्यंत निर्मम है:
- उपयोग और विस्थापन: जैसे ही कोई लेन-देन सार्वजनिक जांच के दायरे में आता है या मीडिया में सुगबुगाहट तेज होती है, तत्काल किसी बिचौलिये को चिन्हित कर दिया जाता है। एक जाता है, दूसरा आता है। किसी दिन कोई ‘मोहित मोगिया’ चर्चा में आता है, तो किसी दिन कोई ‘दीपम रायचुरा’।
- चरित्र हनन की सुनियोजित पटकथा: मीडिया और जांच एजेंसियां मिलकर इन मोहरों को समाज के सामने आधुनिक ‘नटवरलाल’ के रूप में प्रस्तुत कर देती हैं। जनता यह मान बैठती है कि देश की सारी समस्याएं इसी एक व्यक्ति के कारण उत्पन्न हुई थीं।
- संरक्षकों की शुचिता: जिस दिन बिचौलिये के घर पर छापे पड़ रहे होते हैं, ठीक उसी दिन जिन शक्तिशाली अधिकारियों और मंत्रियों के इशारे पर उसने करोड़ों की उगाही की थी, वे दूरदर्शन के पर्दों पर भ्रष्टाचार-मुक्त शासन का उपदेश दे रहे होते हैं।
जिस प्रकार समाज में अपनी विवशताओं अथवा तंत्र की मांग के कारण उपेक्षित वर्ग को ही सारा लांछन झेलना पड़ता है, ठीक उसी तरह इस राजनीतिक-प्रशासनिक तंत्र में बिचौलिया वह पात्र है जिसे व्यवस्था अपने पाप धोने के लिए उपयोग में लाती है और अंत में उसी को कलंकित कर जेल के सीखचों में धकेल देती है।
कमला नेहरू अस्पताल अग्निकांड, जवाबदेही की बलिहारी का जीवंत प्रमाण
इस व्यवस्था की संवेदनहीनता को समझने के लिए मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल स्थित कमला नेहरू चिकित्सालय में घटित हृदयविदारक अग्निकांड का उदाहरण पर्याप्त है। अस्पताल के शिशु वार्ड (एसएनसीयू) में लगी आग में दस से अधिक नवजात और प्री-मेच्योर मासूम असमय काल के गाल में समा गए। सरकारी आंकड़ों की बाजीगरी में मृतकों की संख्या को घटाकर प्रस्तुत करने का प्रयास हुआ, ताकि जनाक्रोश को सीमित रखा जा सके।
किंतु असली प्रश्न न्याय का था:
- किस पर गिरी गाज? जांच के नाम पर किसी कनिष्ठ अभियंता (जेई) या निचले तकनीकी कर्मचारी को निलंबित कर दिया गया।
- कौन बचा रहा? न तो स्वास्थ्य विभाग के शीर्ष वरिष्ठ अधिकारी पर कोई आपराधिक मुकदमा चला, न स्वास्थ्य मंत्री से इस्तीफा मांगा गया, और न ही सत्ता के शीर्ष पर बैठे नेतृत्व ने नैतिक दायित्व स्वीकार किया।
अरबों रुपये के स्वास्थ्य बजट का बंदरबांट करने वाले, रखरखाव के ठेकों में कमीशनखोरी करने वाले और घटिया सुरक्षा उपकरणों को हरी झंडी देने वाले वरिष्ठ नौकरशाह अपनी वातानुकूलित कुर्सियों पर सुरक्षित बने रहे। जान उन नवजातों की गई जिनके परिवारों के पास आवाज नहीं थी, और दंड उस अदने कर्मचारी को मिला जिसके पास रसूख नहीं था। क्या यही लोकतंत्र की न्याय प्रणाली है?
गठजोड़ का अभेद्य किला, नौकरशाही, न्यायपालिका और मुख्यधारा का मीडिया
इस तंत्र में एक सार्वभौमिक सत्य काम करता है—यदि आपका ‘आका’ अत्यंत शक्तिशाली है, तो कानून की धाराएं आपके द्वार तक पहुंचते-पहुंचते निष्प्रभावी हो जाती हैं। जमीन के अरबों रुपये के घोटालों की खबरें अखबारों के पन्नों में दबकर रह जाती हैं। वरिष्ठ अधिकारी प्रतिदिन करोड़ों की बेनामी संपत्ति अर्जित करते हैं, जांच फाइलों में उनका नाम आते ही फाइलें ठंडे बस्ते में डाल दी जाती हैं।
यह सुरक्षा चक्र तीन प्रमुख स्तंभों के अनकहे समझौते पर टिका है:
- नौकरशाही का आवरण: आईएएस और आईपीएस अधिकारियों का एक ऐसा नेटवर्क जो नियमों की व्याख्या अपनी सुविधानुसार मोड़ सकता है। जब तक कोई अधिकारी सत्ता के प्रतिकूल न जाए, उसकी संपत्तियों की कभी निष्पक्ष जांच नहीं होती।
- चुनिंदा न्याय प्रणाली: जहां साधारण नागरिक वर्षों तक जमानत के लिए तरसता है, वहीं सत्ता के गलियारों में पैठ रखने वाले रसूखदारों के लिए आधी रात को भी अदालतें सक्रिय हो जाती हैं या प्रक्रियात्मक त्रुटियों के आधार पर उन्हें क्लीन चिट मिल जाती है।
- साधन संपन्न मीडिया का मौन: बड़े मीडिया घराने और समाचार पत्र, जो विज्ञापनों और राजनीतिक अनुकंपा पर जीवित हैं, केवल उन्हीं मामलों को उछालते हैं जिनकी अनुमति सत्ता प्रतिष्ठान से मिलती है। वे छोटे स्तर के दलालों की तस्वीरें छापकर अपनी खोजी पत्रकारिता का कर्तव्य पूरा मान लेते हैं, जबकि मुख्य साजिशकर्ताओं का नाम लेने का साहस उनके पास नहीं होता।
व्यवस्था का अंतिम यथार्थ
‘ब्रांडवाणी समाचार‘ की यह पड़ताल इस कड़वे निष्कर्ष पर पहुंचती है कि भ्रष्टाचार देश की व्यवस्था का कोई दोष (बग) नहीं है, बल्कि यह वर्तमान व्यवस्था का मूल संचालन तंत्र (फीचर) बन चुका है। जो व्यक्ति इस तंत्र को नियंत्रित करता है, वही अपनी सुविधानुसार ईमानदारी और बेईमानी की सीमाएं तय करता है। सबसे बड़ा घोटालेबाज कभी पकड़ा नहीं जाता, क्योंकि जांच करने वाले, निर्णय सुनाने वाले और कानून बनाने वाले सभी उसी तंत्र के हिस्से हैं।
कानून की तलवार केवल उन पर गिरती है जो साधनहीन हैं या जो उस व्यवस्था के लिए उपभोग्य सामग्री (डिस्पोजेबल) बन चुके हैं। जब तक समाज भ्रष्टाचार के मूल संरक्षकों सत्ता के शीर्ष पर आसीन राजनेताओं, नीति-निर्माताओं और शीर्ष नौकरशाहों—से सीधे सवाल पूछने का साहस नहीं जुटाएगा, तब तक हर घोटाले के बाद केवल नए मोहरे बदले जाएंगे, कुछ नए बलि के बकरे तलाशे जाएंगे, और असली सौदागर व्यवस्था की आड़ में सत्ता का सुख भोगते रहेंगे।
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