
मध्य प्रदेश की सियासत में ‘चेहरे’ बदलते हैं, नारे बदलते हैं और सत्ता के शीर्ष पर बैठे कर्णधार बदलते हैं, लेकिन सूबे की आम जनता की नियति में लिखा संघर्ष और प्रशासनिक उदासीनता का दंश जस का तस नजर आता है। कभी ‘मामा’ के नाम से मशहूर शिवराज सिंह चौहान के लंबे शासनकाल में व्यापमं घोटाले की गूंज, ई-टेंडरिंग के विवाद और कच्ची शराब के अवैध कारोबार से उजड़ते परिवारों की चीखें प्रदेश ने सुनी थीं। आज जब सूबे की कमान मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के हाथों में है, तब राज्य के विभिन्न हिस्सों से उठ रही आवाजें एक बार फिर सत्ता के दावों और जमीनी हकीकत के बीच की गहरी खाई को उजागर कर रही हैं।
आदिवासी बस्तियों में चलते बुलडोज़र, कानून-व्यवस्था के कमजोर होते शिकंजे के बीच महिलाओं और वंचित वर्गों के खिलाफ अपराध,नशीली दवाओं नशे का फैलता जाल और सरकारी दफ्तरों में रिश्वतखोरी के नए ‘रेट कार्ड’ जो कभी 2018 में 25000 रुपये हुआ करता था आज वो 10 लाख हो गया है के आरोपों ने राजनीतिक व सामाजिक गलियारों में हलचल मचा दी है। जनता के मन में यह सवाल गहरा रहा है कि क्या जनकल्याणकारी व मुफ्त की योजनाओं के आवरण में बुनियादी मुद्दे दबते जा रहे हैं? क्या लोकतंत्र का मतदाता एक ऐसे चक्रव्यूह में उलझ गया है जहां से निकलना मुश्किल साबित हो रहा है?
आदिवासी बस्तियों पर संकट और आहत होता स्वाभिमान
मध्य प्रदेश देश का वह भूभाग है जहां जनजातीय समाज की आबादी और उनकी सांस्कृतिक विरासत सबसे समृद्ध मानी जाती है। सरकारें मंचों से जनजातीय गौरव और उनके अधिकारों की रक्षा की कसमें खाती नहीं थकतीं, मगर धरातल पर कई बार मंजर इसके उलट दिखाई देता है। हाल के दिनों में कई जिलों से ऐसी घटनाएं सामने आई हैं जहां पर गरीब आदिवासियों की झोपड़ियों पर बुलडोज़र चलाए गए। पीढ़ियों से जंगलों और जमीन को सींचने वाले परिवारों को जब अचानक बेघर कर दिया जाता है, तो शासन के ‘संवेदनशील’ होने के दावों पर कड़े सवाल खड़े होते हैं।
मामला केवल विदिशा जिले के आदिवासियों के विस्थापन तक सीमित नहीं है। समाज के विभिन्न वर्गों, चाहे वे सवर्ण हों जिनको पीछे घूम के लाट मरने की सीख बयानों में दी जाती है या वंचित, प्रशासनिक निरंकुशता और पुलिसिया मनमानी की शिकायतों से अछूते नहीं हैं। कई मामलों में पुलिस और स्थानीय अफसरों द्वारा नागरिकों के साथ किए गए अशोभनीय व्यवहार और मारपीट के वीडियो वायरल हुए हैं। जब रक्षक ही भक्षक की भूमिका में नजर आने लगे और कानून का पालन कराने वाले ही मर्यादा भूल जाएं, तो समाज में भय और अविश्वास का वातावरण बनना स्वाभाविक है।
अपराध, अवैध शराब और नशे का समानांतर साम्राज्य
कानून और व्यवस्था किसी भी राज्य की प्राथमिक पहचान होती है, परंतु मध्य प्रदेश में महिलाओं और बच्चों की सुरक्षा को लेकर विपक्ष और सामाजिक संगठन लगातार सरकार को घेर रहे हैं। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो (NCRB) के आंकड़े हों या जिलों से आने वाली दैनिक खबरें, बलात्कार, हत्या और महिला उत्पीड़न की घटनाएं शासन की सतर्कता पर प्रश्नचिह्न लगाती हैं।
इसके साथ ही, ग्रामीण और शहरी अंचलों में पनप रहा नशे का अवैध कारोबार नई पीढ़ी को अपनी गिरफ्त में ले रहा है:
· कच्ची और अवैध शराब का धंधा: गांव-गांव तक फैली अवैध शराब की भट्टियां न केवल कानून की नाक के नीचे चल रही हैं, बल्कि कई परिवारों को भुखमरी और अकाल मौतों की ओर धकेल रही हैं।
· ड्रग्स का फैलता सिंडिकेट: इंदौर, भोपाल, जबलपुर और ग्वालियर जैसे प्रमुख शहरों के साथ-साथ अब छोटे कस्बों में भी सिंथेटिक ड्रग्स और गांजे की तस्करी के नेटवर्क मजबूत हो रहे हैं।
जनता यह पूछने पर मजबूर है कि क्या स्थानीय स्तर पर पुलिस और आबकारी महकमे की मिलीभगत के बिना यह समानांतर साम्राज्य फल-फूल सकता है?
दलाली, जमीन के खेल और ‘महंगा’ होता भ्रष्टाचार
विपक्ष और राजनीतिक विश्लेषकों का आरोप है कि मध्य प्रदेश में प्रशासनिक भ्रष्टाचार का स्वरूप अब और अधिक संस्थागत हो चुका है। शिवराज सरकार के दौर में व्यापमं महाघोटाले ने लाखों युवाओं के भविष्य और प्रदेश की छवि को जो आघात पहुंचाया था, उसकी टीस आज भी बाकी है। मोहन सरकार के मौजूदा दौर में आरोप लग रहे हैं कि सरकारी दफ्तरों में फाइलों की आवाजाही बिना ‘वजनी लिफाफों’ के संभव नहीं है। सबसे बड़ी बात यह है कि भ्रष्टाचार तो चरम पर हो गया है लेकिन कमाई आम आदमी की गिर गई है तो चरम पर हो गया है लेकिन कमाई आम आदमी की गिर गई है
राजनीतिक चर्चाओं और जनता के बीच यह चर्चा आम है कि जो काम पहले कुछ हजार रुपये की रिश्वत में हो जाया करते थे, आज उनके लिए लाखों रुपये की मांग की जा रही है। नामांतरण, डायवर्जन, जमीनों की रजिस्ट्री, विकास कार्यों के टेंडर और निर्माण अनुमतियों से लेकर बड़े प्रोजेक्ट्स में दलालों का हस्तक्षेप बढ़ चुका है। जमीनों के खेल में प्रभावशाली बिल्डरों और अफसरों की सांठगांठ के चलते आम आदमी अपनी ही पुश्तैनी जमीन के कागजात दुरुस्त कराने के लिए दफ्तरों के चक्कर काटने को विवश है।
‘मुफ्त की रेवड़ियों’ का तिलिस्म और अभिमन्यु बनी जनता
इस पूरे घटनाक्रम का सबसे चिंताजनक पहलू चुनावी राजनीति का बदलता स्वरूप है। भारतीय जनता पार्टी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सांगठनिक ताने-बाने की रणनीति पर नजर रखने वाले विश्लेषकों का मानना है कि सत्ताधारी दल ने जनकल्याणकारी योजनाओं का ऐसा तंत्र विकसित किया है, जो बुनियादी नाकामियों पर पर्दा डालने का काम करता है।
‘लाडली बहना’ जैसी प्रत्यक्ष लाभ अंतरण योजनाओं ने तात्कालिक आर्थिक राहत तो जरूर दी है, लेकिन इसके पीछे छुपे बड़े सवालों को भी जन्म दिया है:
1. स्थायी रोजगार का अभाव: क्या हर महीने खाते में आने वाली कुछ राशि युवाओं के लिए रोजगार, बेहतर उद्योग और सुरक्षित भविष्य का विकल्प हो सकती है?
2. शिक्षा और स्वास्थ्य की बदहाली: सरकारी स्कूल शिक्षकों की कमी से जूझ रहे हैं और जिला अस्पतालों में डॉक्टरों व जीवनरक्षक दवाओं का अकाल है।
3. नागरिक चेतना की सुस्ती: जब जनता को मुफ्त या अनुदानित योजनाओं का आदी बना दिया जाता है, तो क्या वह अपने नागरिक अधिकारों—जैसे अच्छी सड़कें, स्वच्छ पानी, भयमुक्त माहौल और भ्रष्टाचार-मुक्त शासन—को लेकर सवाल पूछना भूल जाती है?
जनता आज महाभारत के ‘अभिमन्यु’ जैसी स्थिति में दिखाई देती है, जो एक तरफ आर्थिक संकट और महंगाई के दबाव में है, और दूसरी तरफ योजनाओं के इस लुभावने चक्रव्यूह में घिरी है, जहां से निकलकर सत्ता से जवाबदेही मांगना उसके लिए एक कठिन चुनौती बन गया है।
सुशासन का इम्तिहान, क्या जागेगा जनाक्रोश?
लोकतंत्र में सरकारों का मूल्यांकन केवल घोषणाओं, भव्य आयोजनों और विज्ञापनों से नहीं, बल्कि सबसे अंतिम पंक्ति में खड़े व्यक्ति की सुरक्षा और सम्मान से होता है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के सामने आज सबसे बड़ी चुनौती यही है कि वे अपनी प्रशासनिक मशीनरी पर कसावट लाएं, भ्रष्ट अफसरों पर सख्त नकेल कसें और कानून के राज को सचमुच निष्पक्ष बनाएं।
यदि आदिवासियों की चीखें अनसुनी रहीं, जमीनों के गोरखधंधे यूं ही चलते रहे, नशे का कारोबार युवाओं को लीलता रहा और भ्रष्टाचार इसी तरह आम जनजीवन को खोखला करता रहा, तो मुफ्त योजनाओं की चमक भी जनाक्रोश को लंबे समय तक दबा नहीं पाएगी। मध्य प्रदेश का जागरूक मतदाता क्या इस राजनीतिक चक्रव्यूह को भेदकर अपने बुनियादी अधिकारों की लड़ाई लड़ेगा, या फिर व्यवस्था की इसी लाचारी को अपनी तकदीर मान लेगा—यह आने वाला वक्त और आगामी चुनावी चौसर ही तय करेगी।
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