
बुरहानपुर/ राजू सिंह राठौड़: प्राकृतिक खेती और फसल विविधिकरण के जरिए बुरहानपुर जिले की महिला कृषक रत्ना दीदी ग्रामीण क्षेत्र में आत्मनिर्भरता और नवाचार की नई मिसाल बनकर उभरी हैं। करीब साढ़े तीन एकड़ भूमि पर प्राकृतिक खेती कर रही रत्ना दीदी न सिर्फ बेहतर गुणवत्ता वाली फसलें तैयार कर रही हैं, बल्कि देशी बीजों के संरक्षण के लिए बीज बैंक बनाने की दिशा में भी काम कर रही हैं।
परीक्षा उत्तीर्ण कर शिक्षा के प्रति भी प्रेरक उदाहरण प्रस्तुत
जिला मुख्यालय से लगभग 15 किलोमीटर दूर बख्खारी गांव की रहने वाली रत्ना दीदी रमाबाई स्वयं सहायता समूह से जुड़ने के बाद कृषि के क्षेत्र में लगातार आगे बढ़ी हैं। घरेलू जिम्मेदारियों के साथ उन्होंने अपनी पढ़ाई भी जारी रखी और अपनी बेटी के साथ 10वीं की परीक्षा उत्तीर्ण कर शिक्षा के प्रति भी प्रेरक उदाहरण प्रस्तुत किया।
अतिरिक्त आय भी प्राप्त
रत्ना दीदी अपने खेत में ज्वार, मक्का, चना, तुअर, उड़द, केला, पपीता, पालक, बैंगन, लौकी, तुरई, गिल्की, हल्दी, करेला और प्याज सहित कई फसलें उगाती हैं। मिश्रित एवं बहुफसली खेती अपनाने से उन्हें अतिरिक्त आय भी प्राप्त हो रही है।
स्थानीय हाट-बाजार और मेलों में विक्रय भी करती हैं
उन्होंने कृषि विज्ञान केंद्र से प्रशिक्षण लेकर कृषि सखी के रूप में कार्य शुरू किया। प्रशिक्षण के बाद उन्होंने प्राकृतिक खेती की आधुनिक तकनीकों को अपनाया और जीवामृत, बीजामृत, ब्रह्मास्त्र, नीमास्त्र, अग्नास्त्र जैसे जैविक घोल स्वयं तैयार कर खेती में उपयोग करना शुरू किया। ये प्राकृतिक उत्पाद मिट्टी की उर्वरता बढ़ाने के साथ फसलों को कीटों से सुरक्षित रखने में भी मददगार साबित हो रहे हैं। रत्ना दीदी इन उत्पादों का स्थानीय हाट-बाजार और मेलों में विक्रय भी करती हैं।
अन्य सरकारी योजनाओं से जोड़ने का काम
रत्ना दीदी का कहना है कि प्राकृतिक खेती से उत्पादन की गुणवत्ता और मिट्टी की उर्वरता दोनों में सुधार हुआ है, जबकि खेती की लागत भी कम हुई है। कृषि कार्यों के साथ वे बैंक सखी और कृषि सखी के रूप में महिलाओं को स्वयं सहायता समूह, ऋण सुविधा और अन्य सरकारी योजनाओं से जोड़ने का काम भी कर रही हैं।
पर्यावरण संरक्षण में भी महत्वपूर्ण योगदान
भविष्य की योजना के तहत रत्ना दीदी देशी बीजों के संरक्षण के लिए बीज बैंक विकसित कर रही हैं। उन्होंने बैंगन, लौकी, पालक, तुरई, भिंडी और अन्य सब्जियों के देशी बीजों का संग्रह शुरू कर दिया है। उनका कहना है कि प्राकृतिक खेती अपनाकर किसान कम लागत में बेहतर उत्पादन प्राप्त करने के साथ पर्यावरण संरक्षण में भी महत्वपूर्ण योगदान दे सकते हैं.
प्रदेश में किसानों को प्राकृतिक खेती और फसल विविधिकरण से जोड़ने के लिए राज्य सरकार एवं कृषि विभाग द्वारा भी लगातार प्रयास किए जा रहे हैं, जिससे टिकाऊ और लाभकारी कृषि को बढ़ावा मिल रहा है।
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