
गोड्डा। झारखंड में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर को लेकर गोड्डा जिले से सामने आया एक मामला अब भी कई सवाल खड़े करता है। एक बूथ लेवल अधिकारी के मुताबिक, एक राजनीतिक दल से जुड़े बूथ लेवल एजेंट करीब 75 फॉर्म-7 लेकर पहुंचे थे और इनमें अधिकांश नाम मुस्लिम मतदाताओं के थे। अधिकारी के सवाल पूछने के बाद एजेंट ने कथित तौर पर ये फॉर्म जला दिए। मामले में एक पूर्व विधायक का नाम भी सामने आया, क्योंकि संबंधित बीएलए ने दावा किया था कि उसे कुछ फॉर्म पूर्व विधायक की ओर से मिले थे। हालांकि, इन आरोपों को चुनावी प्रक्रिया में हुई अनियमितता का अंतिम प्रमाण नहीं माना जा सकता।
75 फॉर्म लेकर पहुंचा बीएलए, फिर क्यों जला दिए?
इंडियन एक्सप्रेस की जांच के मुताबिक, गोड्डा के बसंतराय क्षेत्र के पचुआ किता बूथ पर एक बीएलए लगभग 75 फॉर्म-7 लेकर बीएलओ के पास पहुंचा। बीएलओ मुख्तार के अनुसार, फॉर्म देखकर सवाल उठा कि इनका इस्तेमाल मतदाताओं के नाम हटाने के लिए किया जा रहा है। उन्होंने बताया कि फॉर्म में दर्ज नामों में अधिकांश मुस्लिम मतदाताओं के थे और कई नाम वर्ष 2003 की मतदाता सूची से भी जुड़े हुए थे।
रिपोर्ट के मुताबिक, सवाल किए जाने के बाद संबंधित बीएलए ने ये फॉर्म जला दिए। बाद में उसने कहा कि उसे फॉर्म पार्टी कार्यकर्ताओं से मिले थे और उसे उनके वास्तविक इस्तेमाल की पूरी जानकारी नहीं थी। यही बिंदु इस पूरे मामले को गंभीर सवालों के घेरे में लाता है कि आखिर बड़ी संख्या में फॉर्म-7 किस आधार पर तैयार किए गए और उन्हें बूथ स्तर तक किस प्रक्रिया से पहुंचाया गया।
पूर्व विधायक का नाम क्यों आया?
मामले में गोड्डा के पूर्व भाजपा विधायक अमित मंडल का नाम भी सामने आया। एक भाजपा बीएलए संजीव कुमार रोशन ने इंडियन एक्सप्रेस को बताया था कि उसे करीब 25 फॉर्म-7 पूर्व विधायक मंडल की ओर से मिले थे और उन्हें बीएलओ के पास जमा करने को कहा गया था। हालांकि, अमित मंडल ने इस आरोप को किसी अवैध गतिविधि के रूप में स्वीकार नहीं किया। उनका कहना था कि यदि किसी मतदाता का नाम एक से अधिक जगह दर्ज है या मतदाता की पात्रता पर सवाल है तो बीएलए को आपत्ति दर्ज कराने का अधिकार है।
यानी यहां सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या ये फॉर्म वास्तविक मतदाता आपत्तियों के आधार पर दिए गए थे या बड़ी संख्या में नामों को एक साथ हटाने का प्रयास था? इसका जवाब संबंधित चुनावी अधिकारियों की जांच और दस्तावेजों के सत्यापन से ही स्पष्ट हो सकता है।
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सिर्फ गोड्डा में ही क्यों उठा मामला?
यह मामला केवल एक बूथ तक सीमित नहीं रहा। इंडियन एक्सप्रेस की जांच के अनुसार, बसंतराय के महेशटिकरी, पचुआ किता, लोचनी और बाघाकोल समेत कम से कम चार बूथों से फॉर्म-7 को लेकर शिकायतें सामने आई थीं। महेशटिकरी में एक बीएलए ने करीब 25 मतदाताओं के नाम हटाने के लिए फॉर्म दिए थे। रिपोर्ट के अनुसार, इन मामलों में भी बड़ी संख्या में नाम अल्पसंख्यक समुदाय के मतदाताओं के थे।
इसके बाद जिला निर्वाचन अधिकारियों ने मामले में जांच शुरू की। बसंतराय के बीडीओ और निर्वाचन पंजीकरण अधिकारी श्रीमन मरांडी ने बताया था कि शिकायतों के बाद क्षेत्रीय सत्यापन कराया जाएगा और रिपोर्ट तैयार की जाएगी। बाद में जिला निर्वाचन अधिकारियों ने भी जांच के लिए रिपोर्ट मांगी।
चुनाव आयोग के नियम क्या कहते हैं?
फॉर्म-7 का इस्तेमाल मतदाता सूची में दर्ज किसी नाम को हटाने पर आपत्ति दर्ज कराने के लिए किया जा सकता है। इसके आधारों में किसी व्यक्ति का स्थान बदलना, मृत्यु, दोहरी प्रविष्टि या अन्य निर्धारित कारण शामिल हो सकते हैं। लेकिन फॉर्म-7 जमा होने का मतलब यह नहीं है कि मतदाता का नाम सीधे सूची से हटा दिया जाएगा। चुनाव अधिकारियों के अनुसार, नाम हटाने से पहले निर्धारित प्रक्रिया के तहत जांच और सत्यापन जरूरी है।
झारखंड के मुख्य निर्वाचन पदाधिकारी के. रवि कुमार ने यह भी कहा था कि बीएलए द्वारा बड़ी संख्या में फॉर्म-7 जमा करना अपने आप में प्रतिबंधित नहीं है। हालांकि, बीएलओ को प्रक्रिया के अनुसार आवेदन प्राप्त कर आगे संबंधित अधिकारी के स्तर पर जांच करानी चाहिए।
अब तक क्या स्थिति है?
झारखंड में एसआईआर के प्रारूप मतदाता सूची में 43.61 लाख नाम कम हुए थे। बाद में दावा-आपत्ति की समयसीमा 30 सितंबर तक बढ़ाई गई। इसके बाद चुनाव आयोग ने अंतिम मतदाता सूची के प्रकाशन की समयसीमा भी बढ़ाकर 30 नवंबर 2026 कर दी है। यानी गोड्डा जैसे मामलों में आए दावों और आपत्तियों की जांच तथा निपटारे की प्रक्रिया अभी महत्वपूर्ण है।
इस पूरे मामले में असली सवाल यही है-अगर किसी बूथ पर बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम हटाने के लिए एक साथ फॉर्म पहुंचते हैं और उनमें एक ही समुदाय के नाम अधिक दिखाई देते हैं, तो क्या केवल प्रक्रिया पूरी करना पर्याप्त है या इसके पीछे के आधार की भी जांच होनी चाहिए? फिलहाल उपलब्ध रिपोर्टों से किसी राजनीतिक दल या नेता द्वारा जानबूझकर अवैध तरीके से मतदाता हटाने की अंतिम पुष्टि नहीं होती। इसलिए अंतिम निष्कर्ष चुनावी जांच और सत्यापन के बाद ही निकाला जाना चाहिए।
गोड्डा का यह मामला एसआईआर की पूरी प्रक्रिया में पारदर्शिता, सत्यापन और मतदाता के अधिकार को लेकर अहम सवाल खड़े करता है। एक तरफ राजनीतिक दलों के बूथ एजेंटों को वैध आपत्तियां दर्ज कराने का अधिकार है, वहीं दूसरी तरफ किसी भी पात्र मतदाता का नाम गलत तरीके से हटना लोकतांत्रिक प्रक्रिया के लिए गंभीर विषय हो सकता है। इसलिए फॉर्म-7 की संख्या से ज्यादा महत्वपूर्ण यह देखना होगा कि प्रत्येक आवेदन का आधार क्या था और जांच के बाद कितने नाम वास्तव में हटाए गए।
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