
क्या किसी जमीन को सरकारी रिकॉर्ड में जंगल नहीं लिखे जाने भर से वह जंगल नहीं रहेगी? और अगर किसी इलाके में पेड़, प्राकृतिक वनस्पति और पूरा पारिस्थितिकी तंत्र मौजूद है, लेकिन पुराने सरकारी रिकॉर्ड में उसे वन भूमि नहीं बताया गया, तो क्या उसे विकास परियोजनाओं के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है? सोशल मीडिया पर वायरल हो रही एक रील ने इन सवालों को फिर चर्चा के केंद्र में ला दिया है।
रील में पंजाब लैंड प्रिजर्वेशन एक्ट, 1900, वन संरक्षण कानून में 2023 के संशोधन और 1980 के बाद सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज जंगल की स्थिति को लेकर सवाल उठाए गए हैं। साथ ही इसमें सुप्रीम कोर्ट की अरावली से जुड़ी सुनवाई और मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की टिप्पणी का भी संदर्भ है। हालांकि, इन सभी मुद्दों को एक ही निष्कर्ष से जोड़ना कानूनी स्थिति को जरूरत से ज्यादा सरल बना देगा।
सुप्रीम कोर्ट ने ‘जंगल’ को सिर्फ कागजों तक सीमित नहीं माना था
भारत में जंगल की कानूनी सुरक्षा को लेकर 1996 का टी.एन. गोदावर्मन फैसला बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि ‘वन’ शब्द को उसके सामान्य या शब्दकोशीय अर्थ में समझा जाना चाहिए। यानी केवल वे इलाके ही नहीं, जो बाकायदा अधिसूचित वन हैं, बल्कि सरकारी रिकॉर्ड में वन के रूप में दर्ज क्षेत्र भी इसके दायरे में आ सकते हैं। इसी वजह से लंबे समय तक ‘डीम्ड फॉरेस्ट’ यानी ऐसी भूमि, जो हर सरकारी दस्तावेज में वन के रूप में अधिसूचित न हो, लेकिन वास्तविक परिस्थितियों में वन की प्रकृति रखती हो, को लेकर कानूनी संरक्षण का सवाल बना रहा।
2023 के संशोधन ने क्यों बढ़ाई चिंता?
2023 में वन संरक्षण कानून में संशोधन कर नई धारा 1ए जोड़ी गई। इसके तहत कानून का दायरा उन जमीनों तक तय किया गया, जिन्हें कानून के तहत वन घोषित किया गया हो या जो 25 अक्टूबर 1980 को या उसके बाद सरकारी रिकॉर्ड में वन के रूप में दर्ज रही हों। इसमें कुछ अपवाद भी रखे गए हैं। यही वह बिंदु है जिस पर पर्यावरण विशेषज्ञों और याचिकाकर्ताओं ने चिंता जताई। उनका तर्क रहा कि अगर कोई वास्तविक वन क्षेत्र सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज नहीं है, तो संशोधित कानून के तहत उसकी सुरक्षा कमजोर हो सकती है।
सुप्रीम कोर्ट में इस संशोधन को चुनौती देने वाली याचिकाओं में भी यही मुद्दा उठाया गया था कि क्या संशोधन ने 1996 के उस व्यापक सिद्धांत को सीमित कर दिया है, जिसमें जंगल को उसके सामान्य अर्थ में समझने की बात कही गई थी। मार्च 2025 के सुप्रीम कोर्ट के आदेश में इन दलीलों को दर्ज किया गया और अदालत ने राज्यों में पहचान की प्रक्रिया पूरी होने तक गोदावर्मन मामले में तय सिद्धांतों का पालन जारी रखने की बात दोहराई थी।
पंजाब लैंड प्रिजर्वेशन एक्ट और अरावली का कनेक्शन क्या है?
रील में पंजाब लैंड प्रिजर्वेशन एक्ट, 1900 का भी उल्लेख है। यह कानून मूल रूप से भूमि क्षरण और पर्यावरणीय नुकसान को रोकने से जुड़ा है। हरियाणा में इस कानून के तहत अधिसूचित कई क्षेत्रों का अरावली संरक्षण से सीधा संबंध रहा है। सुप्रीम कोर्ट 2022 में साफ कर चुका है कि हरियाणा में पंजाब लैंड प्रिजर्वेशन एक्ट की धारा 4 के तहत जारी विशेष आदेशों से संरक्षित जमीन में वन भूमि की कानूनी विशेषताएं हो सकती हैं। ऐसी जमीन का गैर-वन इस्तेमाल केंद्रीय अनुमति के बिना नहीं किया जा सकता।
सितंबर 2026 में पंजाब वन विभाग ने पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के सामने यह भी कहा कि धारा 4 के तहत विशेष आदेश वाली भूमि में वन भूमि के कानूनी गुण पहले से मौजूद हैं और हर मामले में पुराने राजस्व रिकॉर्ड खंगालना जरूरी नहीं होना चाहिए। यानी यह कहना सही नहीं होगा कि पंजाब लैंड प्रिजर्वेशन एक्ट अपने आप जंगल खत्म करने का रास्ता खोलता है। उलटे, कई मामलों में यही कानून पर्यावरणीय प्रतिबंधों का आधार बना हुआ है।
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‘क्या आप मेरे रिटायरमेंट का इंतजार कर रहे हैं?’ क्यों चर्चा में आया?
रील में दिखाया गया सवाल सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अरावली मामले में सितंबर 2026 की टिप्पणी से जुड़ा है।
अरावली की परिभाषा और संरक्षण पर काम कर रही सुप्रीम कोर्ट की उच्चाधिकार प्राप्त समिति ने अपनी रिपोर्ट के लिए फरवरी 2027 तक अतिरिक्त समय मांगा था। इस पर मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने सवाल किया कि क्या समिति उनके सेवानिवृत्त होने तक मामले को टालना चाहती है। अदालत ने अतिरिक्त छह महीने की मोहलत देने से इनकार करते हुए समिति को 30 नवंबर 2026 तक अंतिम रिपोर्ट देने का निर्देश दिया।
यह टिप्पणी महत्वपूर्ण इसलिए है क्योंकि अरावली की परिभाषा को लेकर पहले भी बड़ा विवाद हो चुका है। सुप्रीम कोर्ट ने 2025 में 100 मीटर ऊंचाई के आधार पर अरावली की पहचान वाले अपने पहले के निर्णय को रोककर नए सिरे से वैज्ञानिक अध्ययन का रास्ता अपनाया था। विशेषज्ञ समिति को पर्यावरण, भूगोल, जल, जैव विविधता और स्थानीय समुदायों से जुड़े पहलुओं को भी देखने का निर्देश दिया गया है।
तो क्या 1980 के बाद रिकॉर्ड में नहीं दर्ज जंगल अब असुरक्षित हैं?
यह सवाल सबसे महत्वपूर्ण है, लेकिन इसका सीधा जवाब ‘हां’ या ‘नहीं’ में देना सही नहीं होगा।
2023 के संशोधन ने वन संरक्षण कानून के दायरे को रिकॉर्ड और अधिसूचना से जोड़ने वाली नई व्यवस्था जरूर बनाई है। लेकिन इसके संवैधानिक और पर्यावरणीय प्रभावों पर सुप्रीम कोर्ट में कानूनी चुनौती अभी भी महत्वपूर्ण है। वहीं, अदालत ने अलग-अलग मामलों में जमीन की वास्तविक प्रकृति, राजस्व रिकॉर्ड, ऐतिहासिक उपयोग, मास्टर प्लान और वन की स्थिति जैसे कई पहलुओं को देखने की जरूरत बताई है।
मार्च 2026 के एक फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि किसी स्वीकृत मास्टर प्लान के तहत पहले से गैर-वन भूमि के रूप में निर्धारित जमीन को केवल बाद में पेड़-पौधे उग आने के कारण स्वतः ‘डीम्ड फॉरेस्ट’ नहीं माना जा सकता। हालांकि अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि जिन इलाकों को मास्टर प्लान के समय ही वन या पर्याप्त वन क्षेत्र के रूप में पहचाना गया था, उनकी स्थिति अलग हो सकती है।
असली सवाल क्या है?
इस पूरे विवाद का सबसे बड़ा सवाल यही है-क्या जंगल की पहचान केवल सरकारी कागज तय करेंगे या जमीन की वास्तविक पारिस्थितिक स्थिति भी उतनी ही महत्वपूर्ण होगी?
रील में इसे ‘सरकार का सीक्रेट प्रोजेक्ट’ जैसे सवाल से जोड़ा गया है, लेकिन उपलब्ध न्यायिक रिकॉर्ड से किसी गुप्त सरकारी परियोजना का प्रमाण नहीं मिलता। असली बहस इससे कहीं ज्यादा गंभीर है-विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच कानूनी सीमा आखिर तय कैसे होगी और उन जंगलों का क्या होगा, जो जमीन पर मौजूद हैं लेकिन कागजों में उनकी पहचान अस्पष्ट है?
अरावली पर सुप्रीम कोर्ट की विशेषज्ञ समिति की अंतिम रिपोर्ट इस बहस को नई दिशा दे सकती है। फिलहाल अदालत ने समिति को 30 नवंबर 2026 तक रिपोर्ट देने को कहा है और अगली सुनवाई 2 दिसंबर को निर्धारित है।
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