मध्य प्रदेश जल निगम बना भ्रष्टाचार का स्वतंत्र अड्डा, व्यापम से भी बड़े घोटाले की आहट, फर्जी बैंक गारंटी का खेल और  ईमानदार अधिकारी का दमन

मध्य प्रदेश में घोटालों की फेहरिस्त में एक और काला अध्याय जुड़ गया है। जल जीवन मिशन के तहत हर घर तक शुद्ध पेयजल पहुंचाने का दावा करने वाला ‘मध्य प्रदेश जल निगम’ अब भ्रष्टाचार और अनियमितताओं का एक स्वतंत्र अड्डा बन चुका है। हालात यह हैं कि यदि इस पूरे प्रकरण की निष्पक्ष और सूक्ष्म जांच की जाए, तो प्रदेश का कुख्यात ‘व्यापम घोटाला’ भी इसके आगे बहुत छोटा नजर आएगा। ‘ब्रांडवाणी समाचार’ लगातार इस महाघोटाले की परतें उधेड़ रहा है, जबकि ‘दैनिक भास्कर’ जैसे मुख्यधारा के बड़े अखबारों ने इस पर रहस्यमयी चुप्पी साध रखी है। क्या सच को सामने लाने वाले इन न्यूज पोर्टल्स से मध्य प्रदेश के मुख्य सचिव और शासन-प्रशासन कोई वास्ता नहीं रखते?

फर्जी बैंक गारंटी का महाघोटाला जल निगम में मेसर्स तीर्थ गोपीकॉन लिमिटेड द्वारा 35.80 करोड़ रुपये और मेसर्स एमपी बाबरिया द्वारा 130 करोड़ रुपये की फर्जी बैंक गारंटी प्रस्तुत कर करोड़ों का भुगतान लेने का सनसनीखेज मामला सामने आया है। प्राप्त दस्तावेजों के अनुसार, पंजाब नेशनल बैंक की कोलकाता स्थित बागुईआटी शाखा ने 15 जून 2023 को एक पत्र लिखकर स्पष्ट किया था कि मेसर्स तीर्थ गोपीकॉन लिमिटेड के पक्ष में दी गई 16.20 करोड़ रुपये और 19.60 करोड़ रुपये (कुल 35.80 करोड़ रुपये) की बैंक गारंटी बैंक द्वारा जारी ही नहीं की गई हैं और ये पूरी तरह से फर्जी हैं। सूत्रों के अनुसार, तीर्थ गोपीकॉन लिमिटेड को यह करोड़ों का भुगतान तब हुआ जब संजय कुमार अंधवान वहां प्रोजेक्ट डायरेक्टर थे, जो आज ईएनसी के शीर्ष पद पर विराजमान हैं। मिलीभगत का यह खेल इतने ऊंचे स्तर पर चल रहा है कि फर्जी बैंक गारंटी की सच्चाई जानने के बाद भी, भुगतान करने वालों पर कार्रवाई होने के बजाय उन्हें इंक्रीमेंट और अतिरिक्त पावर (अधिकार) से नवाजा जा रहा है। मध्य प्रदेश की धरती पर शायद यही नया प्रशासनिक नियम बन गया है।

ईमानदार अधिकारी का दमन, विशाल तोमर प्रकरण इस भ्रष्ट तंत्र में जब कोई ईमानदार अधिकारी आवाज उठाता है, तो उसे बेरहमी से कुचल दिया जाता है। इसका जीता-जागता उदाहरण हैं जल निगम की झाबुआ परियोजना क्रियान्वयन इकाई में पदस्थ उप-प्रबंधक विशाल तोमर। विशाल तोमर ने 30 अप्रैल 2026 को महाप्रबंधक को पेटलावद समूह जल प्रदाय योजना में एमएस पाइप सप्लाई में लगभग 7 करोड़ रुपये की गंभीर अनियमितता और भ्रष्टाचार की लिखित जानकारी दी थी। उन्होंने अपने पत्र में स्पष्ट रूप से बताया था कि 4,300 मीटर पाइप साइट पर उपलब्ध ही नहीं था, फिर भी ठेकेदार फर्म द्वारा बिल क्लेम किया गया और संबंधित एजेंसियों द्वारा इसका भौतिक परीक्षण भी नहीं किया गया। क्या जल निगम के प्रबंध संचालक की ईमानदार छवि जो समाज मे है वो सही मे भी है या फिर एक महज दिखावा है अब तो इस पर सवाल उठने लगे है।

इस बड़े खुलासे के बाद, बजाय घोटालेबाजों पर कार्रवाई करने के, वरिष्ठ अधिकारियों द्वारा विशाल तोमर पर ही अनुचित दबाव बनाया गया। तोमर के अनुसार, उन्हें गलत रिपोर्ट स्वीकार करने के लिए प्रताड़ित किया गया और ऐसा न करने पर भविष्य में कार्रवाई की धमकी दी गई। इसी साजिश के तहत, उन पर मेघा इंजीनियरिंग इन्फ्रास्ट्रक्चर लिमिटेड के कर्मचारियों को धमकाने के झूठे आरोप लगाए गए। अंततः, एक ईमानदार अधिकारी को असंगत कार्यप्रणाली और अनुशासनहीनता का मनगढ़ंत ‘कारण बताओ सूचना पत्र’ थमाकर उनकी सेवाएं समाप्त करने (संविदा अनुबंध न बढ़ाने) की अनुशंसा कर दी गई। यह स्पष्ट दर्शाता है कि जल निगम में आवाज उठाने वालों को तत्काल प्रभाव से टर्मिनेट कर दिया जाता है।

चार्टर्ड अकाउंटेंट भावना भारती की संदिग्ध भूमिका इस पूरे घोटाले के तार से भी जुड़ते नजर आ रहे हैं, जिनके मेल पर जल निगम के तमाम महत्वपूर्ण दस्तावेज आते हैं। दस्तावेजों के अनुसार, राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन मध्य प्रदेश के एक पत्र (दिनांक 15.01.19) में यह खुलासा हुआ था कि तत्कालीन सीए भावना भारती की घोर लापरवाही के कारण वित्तीय वर्ष 2014-15 और 2015-16 के ऑडिट में भारी गड़बड़ी हुई थी। बिना परीक्षण किए गलत आयकर विवरणी प्रस्तुत करने के कारण आयकर विभाग ने संस्था पर 348.79 करोड़ रुपये की कर मांग निकाली थी और राज्य स्वास्थ्य समिति के बैंक खाते तक फ्रीज कर दिए गए थे। उसी पत्र में स्पष्ट रूप से उल्लेखित है कि “श्रीमती भावना भारती वर्तमान में मध्यप्रदेश जल निगम मर्यादित, विंध्याचल भवन भोपाल में कार्यरत हैं”। ऐसी दागी पृष्ठभूमि, जिसके कारण शासन को भारी आर्थिक क्षति उठानी पड़ी हो, वैसी अधिकारी को जल निगम में संरक्षण देना और महत्वपूर्ण कार्य सौंपना प्रबंधकों की मंशा पर गहरे सवाल खड़े करता है।

शासन और प्रशासन की चुप्पी इन तमाम पुख्ता सबूतों और दस्तावेजों के सामने आने के बावजूद, जल निगम के ‘ईमानदार छवि’ वाले प्रबंध संचालक (एमडी) इस भ्रष्टाचार पर खामोश क्यों हैं? वो यदि ईमानदार है तो जब ब्रांडवाणी समाचार ने इतने राज खोले तो कुछ भी कार्रवाई क्यू नहीं हुई क्या वे जनता को जवाब देंगे कि इन घोटालेबाजों पर कोई एक्शन क्यों नहीं लिया जा रहा है? सत्ता के शीर्ष पर बैठे मुख्यमंत्री और प्रदेश के मुख्य सचिव की इस मामले में चुप्पी भी कई संदेहों को जन्म देती है। क्या यह चुप्पी सिर्फ इसलिए है क्योंकि यह सच्चाई ‘दैनिक भास्कर’ जैसे स्थापित अखबारों में न छपकर ‘ब्रांडवाणी समाचार’ में उजागर हो रही है? मुख्यमंत्री और प्रदेश के मुख्य सचिव, प्रदेश की जान है अब देखना है ये सच मे कुछ करेंगे या फिर भ्रष्टाचार मे अपनी चुप्पी से मध्यप्रदेश की मिसाल बनाने मे समर्थन देंगे।

जल निगम आज भ्रष्टाचार का वह दलदल बन चुका है जहां भ्रष्ट ठेकेदारों, बेईमान अधिकारियों और दागी कर्मचारियों का गठजोड़ खुलेआम सरकारी खजाने को लूट रहा है। फर्जी बैंक गारंटी पर आंखें मूंद लेना और भ्रष्टाचार उजागर करने वाले उप-प्रबंधक जैसे युवाओं का करियर बर्बाद करना इसी गठजोड़ का हिस्सा है। समय की मांग है कि इस पूरे महाघोटाले की तत्काल प्रभाव से उच्च स्तरीय एवं निष्पक्ष जांच हो, ताकि मध्य प्रदेश की जनता के खून-पसीने की गाढ़ी कमाई लूटने वालों को बेनकाब कर सलाखों के पीछे भेजा जा सके।

  • Shruti Soni

    ब्रांडवाणी समाचार

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    जल निगम मर्यादित और जल जीवन मिशन मे खेल कैसे होते हैं जानने के लिए पूरा पढे,फर्जी बैंक गारंटी का मायाजाल और नियमों की सरेआम नीलामी की मिलेगी जानकारी?

    मध्य प्रदेश में भ्रष्टाचार की जड़ें किस कदर सरकारी…

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