
ब्राणवाणी डेस्क: लोकतंत्र की मूल भावना यह कहती है कि कानून हर व्यक्ति के लिए समान होता है, लेकिन प्रदेश के एक चर्चित मेडिकल कॉलेज में इन दिनों नियमों से अधिक प्रभाव और पहचान की चर्चा हो रही है। कॉलेज में कार्यरत डीन को लेकर कहा जा रहा है कि संस्थान के भीतर पारदर्शिता की जगह अब निजी पसंद-नापसंद हावी होती दिखाई दे रही है। टेंडर से लेकर तबादलों तक कई प्रशासनिक फाइलों पर अंतिम निर्णय उनकी इच्छा के अनुरूप ही लिया जा रहा है।
कॉलेज के अंदर चल रही गैरऔपचारिक चर्चाओं के अनुसार, तय नियम और प्रक्रियाएं अब केवल कागजी औपचारिकता बनकर रह गई हैं, जबकि कई महत्वपूर्ण फैसले सीधे डीन के कार्यालय से तय किए जा रहे हैं। जिन प्रस्तावों या फाइलों को उनकी मंजूरी मिल जाती है, उन्हें तुरंत आगे बढ़ा दिया जाता है, जबकि बाकी मामलों को लंबित रख दिया जाता है। छोटे ठेके, दवाओं की आपूर्ति और जिम्मेदारियों के बंटवारे जैसे मामलों में भी कुछ चुनिंदा लोगों को प्राथमिकता दिए जाने की बातें सामने आ रही हैं।
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इस स्थिति के पीछे की वजहों को लेकर भी अलग-अलग तरह की चर्चाएं सामने आ रही हैं। अंदरूनी सूत्रों का कहना है कि डीन को यह भरोसा अपने पारिवारिक संबंधों से मिल रहा है। बताया जा रहा है कि उनके समधी प्रदेश सरकार में एक प्रभावशाली मंत्री के रूप में पदस्थ हैं, जिसके कारण कॉलेज में लिए जा रहे निर्णयों को लेकर उन्हें किसी कार्रवाई का भय नहीं है।
कॉलेज के कर्मचारियों के बीच यह भी चर्चा है कि यहां अब योग्यता या अनुभव से अधिक व्यक्तिगत संपर्क महत्वपूर्ण होते जा रहे हैं। कई प्रशासनिक निर्णयों में डीन की निजी प्राथमिकताओं की झलक साफ दिखाई देने की बात कही जा रही है। हालांकि कुछ कर्मचारियों में इस व्यवस्था को लेकर असंतोष भी बताया जा रहा है, लेकिन मजबूत राजनीतिक रिश्तों के कारण अधिकतर लोग खुलकर कुछ कहने से बच रहे हैं।
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