
सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को उस याचिका पर केंद्र सरकार से जवाब मांगा है, जिसमें वंदे मातरम् नहीं गाने को दंडनीय अपराध बनाए जाने को चुनौती दी गई है। कोर्ट ने हालांकि फिलहाल यह तय करने से इनकार किया कि राष्ट्रीय गीत दो छंदों तक सीमित रहे या उसके सभी छह छंद गाए जाएं।
वंदे मातरम् को लेकर सुप्रीम कोर्ट में अहम सुनवाई
राष्ट्रीय गीत वंदे मातरम् को लेकर सुप्रीम कोर्ट में मंगलवार को अहम सुनवाई हुई। चीफ जस्टिस सूर्य कांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने इस सवाल पर विचार करने पर सहमति जताई कि क्या वंदे मातरम् नहीं गाने को कानून के तहत दंडनीय बनाया जा सकता है। कोर्ट ने इस संबंध में केंद्र सरकार से जवाब दाखिल करने को कहा है।
हालांकि, अदालत ने इस स्तर पर इस सवाल की सुनवाई करने से इनकार कर दिया कि राष्ट्रीय गीत में केवल दो छंद होने चाहिए या इसे छह छंदों तक बढ़ाया जाना चाहिए। यानी फिलहाल सुनवाई का मुख्य केंद्र गीत की लंबाई नहीं, बल्कि इसे न गाने पर कानूनी कार्रवाई की व्यवस्था होगी।
कोर्ट ने पुराने फैसले का भी दिया हवाला
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने बिजो इमैनुएल मामले में दिए गए अपने पुराने फैसले का उल्लेख किया। उस मामले में अदालत ने यह सिद्धांत स्थापित किया था कि किसी व्यक्ति को राष्ट्रगान नहीं गाने के लिए केवल इसी आधार पर दंडित नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने संकेत दिया कि यह कानूनी स्थिति अभी भी प्रासंगिक है।
पीठ ने यह भी कहा कि दंड से जुड़े प्रावधानों को संविधान के अनुच्छेद 25 और 26 के तहत मिले मौलिक अधिकारों के संदर्भ में परखा जा सकता है। ये प्रावधान धार्मिक स्वतंत्रता से संबंधित हैं।
किसने दाखिल की याचिका?
यह याचिका कर्नाटक के प्रसिद्ध संगीतकार और गायक टी.एम. कृष्णा ने दाखिल की है। याचिका में वंदे मातरम् के सभी छह छंदों को गाना अनिवार्य करने वाली व्यवस्था को चुनौती दी गई है।
याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी गई है कि गीत के अंतिम चार छंदों में हिंदू धार्मिक प्रतीकों और देवी-देवताओं से जुड़ी अभिव्यक्तियां हैं। याचिका में तर्क दिया गया है कि इन्हें अनिवार्य रूप से गाने की व्यवस्था व्यक्ति की धार्मिक स्वतंत्रता और देश के धर्मनिरपेक्ष स्वरूप से जुड़े संवैधानिक सवाल खड़े करती है। ये याचिकाकर्ता के तर्क हैं, जिन पर अदालत को आगे विचार करना है।
कानून में क्या बदला है?
मामले की पृष्ठभूमि में Prevention of Insults to National Honour Act, 1971 में 2026 में किया गया संशोधन भी महत्वपूर्ण है। संशोधन के जरिए राष्ट्रीय गीत वंदे मातरम् को भी उन प्रावधानों के दायरे में लाया गया है, जो राष्ट्रीय सम्मान से जुड़े कुछ कृत्यों पर दंड का प्रावधान करते हैं।
संशोधित प्रावधानों के अनुसार राष्ट्रीय गीत के गायन को जानबूझकर रोकना या ऐसा व्यवधान पैदा करना जिससे कोई सभा उसका गायन न कर सके, दंडनीय बनाया गया है। ऐसे अपराध के लिए तीन वर्ष तक की सजा, जुर्माना या दोनों का प्रावधान है। दूसरी या उसके बाद की दोषसिद्धि पर कम से कम एक वर्ष की सजा का प्रावधान बताया गया है।
यह सवाल अलग है कि किसी व्यक्ति द्वारा खुद वंदे मातरम् नहीं गाने को इसी तरह दंडनीय बनाया जा सकता है या नहीं। सुप्रीम कोर्ट इसी संवैधानिक और कानूनी पहलू की जांच करेगा।
केंद्र ने याचिका का विरोध किया
केंद्र सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने याचिका का विरोध किया। उन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन में वंदे मातरम् की ऐतिहासिक भूमिका का उल्लेख करते हुए याचिका में उठाई गई आपत्तियों पर सवाल उठाए।
अब केंद्र के जवाब के बाद सुप्रीम कोर्ट इस मामले में आगे की सुनवाई करेगा। इससे यह स्पष्ट होगा कि राष्ट्रीय गीत के सम्मान से जुड़े मौजूदा कानूनी प्रावधान और नागरिकों के मौलिक अधिकारों के बीच अदालत किस तरह कानूनी स्थिति तय करती है।
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