रूस के तेल पर अमेरिका का बड़ा फैसला: 30 दिन तक खरीद सकते हैं सभी देश

सार

वैश्विक ऊर्जा बाजार में बढ़ते तनाव के बीच अमेरिका ने एक बड़ा फैसला लिया है। रिपोर्टों के मुताबिक अमेरिका ने सभी देशों को रूस से कच्चा तेल खरीदने की अस्थायी अनुमति दे दी है, जिसके लिए लगभग 30 दिन की छूट दी गई है। यह कदम ऐसे समय पर उठाया गया है जब मध्य-पूर्व में बढ़ते तनाव और संभावित युद्ध के कारण तेल सप्लाई को लेकर अनिश्चितता बढ़ गई है।

इससे पहले ईरान ने चेतावनी दी थी कि अगर क्षेत्र में सैन्य टकराव और बढ़ा या तेल सप्लाई बाधित हुई तो कच्चे तेल की कीमतें 200 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच सकती हैं। इसी आशंका को देखते हुए वैश्विक ऊर्जा बाजार को स्थिर रखने के लिए अमेरिका ने यह अस्थायी राहत दी है।

विस्तार

रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद अमेरिका और उसके सहयोगी देशों ने रूस के तेल पर कई तरह के प्रतिबंध लगाए थे, जिससे अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल व्यापार पर असर पड़ा था। हालांकि समय-समय पर कुछ देशों को सीमित छूट भी दी जाती रही है ताकि वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति पूरी तरह बाधित न हो। मौजूदा परिस्थितियों में अमेरिका द्वारा दी गई यह 30 दिन की अनुमति इसी रणनीति का हिस्सा मानी जा रही है।

विशेषज्ञों का कहना है कि अगर एक साथ कई देशों की तेल सप्लाई प्रभावित होती है तो वैश्विक बाजार में कीमतें तेजी से बढ़ सकती हैं। रूस दुनिया के सबसे बड़े तेल उत्पादकों में से एक है और उसकी सप्लाई बंद होने या सीमित होने से बाजार में असंतुलन पैदा हो सकता है। इसी वजह से कई देशों की अर्थव्यवस्था पर दबाव पड़ने की आशंका रहती है।

इसी बीच ईरान की ओर से चेतावनी दी गई थी कि अगर क्षेत्रीय तनाव बढ़ा और तेल के प्रमुख समुद्री मार्ग प्रभावित हुए तो कच्चे तेल की कीमतें 200 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच सकती हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसी स्थिति में दुनिया भर में पेट्रोल-डीजल और ऊर्जा की कीमतों में भारी उछाल देखने को मिल सकता है, जिसका असर महंगाई और आर्थिक गतिविधियों पर भी पड़ेगा।

भारत जैसे देशों के लिए यह स्थिति खास तौर पर महत्वपूर्ण है क्योंकि देश अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयातित कच्चे तेल से पूरा करता है। पिछले कुछ वर्षों में भारत ने रूस से सस्ता तेल खरीदकर अपने आयात बिल को संतुलित करने की कोशिश की है। अमेरिका द्वारा दी गई अस्थायी छूट से कई देशों को अल्पकालिक राहत मिल सकती है, लेकिन ऊर्जा बाजार की दिशा आने वाले समय में भू-राजनीतिक हालात पर निर्भर करेगी।

विश्लेषकों का कहना है कि अगर मध्य-पूर्व और यूरोप में तनाव कम नहीं हुआ तो वैश्विक तेल बाजार में उतार-चढ़ाव जारी रह सकता है। ऐसे में सरकारें वैकल्पिक ऊर्जा स्रोत, रणनीतिक भंडार और नए आयात समझौतों पर भी ध्यान दे रही हैं ताकि भविष्य में ऊर्जा संकट की स्थिति से निपटा जा सके।

  • gaurav singh rajput

    gaurav singh rajput

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