क्या सत्ता का प्रभाव लोकतंत्र को कर रहा है कमजोर? कर्नाटक के राज्यपाल के पोते पर गंभीर आरोप

क्या सचमुच नियम आम जनता को दबाने के लिए बनाए गए हैं? क्या सत्ता का प्रभाव इतना बढ़ गया है कि संवैधानिक पदधारक के परिवार के लोग खुलेआम उत्पात मचा सकते हैं और पुलिस सिर्फ आदेश पालन में उलझी रहेगी? मामला कर्नाटक के राज्यपाल थावरचंद गहलोत के पोते से जुड़ा है, जिस पर सरकारी अस्पताल में उत्पात मचाने, सरकारी संपत्ति हड़पने और डॉक्टर को पत्नी को उठाने की धमकी देने के गंभीर आरोप हैं।

प्रदेश के मुख्यमंत्री ‘अच्छे शासन’ की बात करते हैं, लेकिन उनके पार्टी के बड़े नेता और राज्यपाल के पोते सरकारी अस्पताल में घुसकर काम में बाधा डाल रहे हैं। हद तब हो गई जब सरकारी कंप्यूटर को निजी सामान समझकर घर ले जाया गया। क्या यह चोरी नहीं है, या सत्ता के प्रभाव से डकैती भी अधिकार बन जाती है?

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मध्य प्रदेश पुलिस, जो देशभक्ति और जनसेवा का नारा देती है, अब केवल सत्ता के संरक्षण में दिखती है। डीजीपी की चुप्पी साफ संकेत है कि वर्दी का रंग खाकी है, लेकिन उस पर राजनीतिक दबाव हावी है। यही अपराध किसी आम नागरिक ने किया होता, तो अब तक उसके घर पर बुलडोजर चल चुका होता।

लोकतंत्र के स्तंभ कहे जाने वाले अधिकारी और अदालत की मौनता जनता का भरोसा झकझोर देती है। सामान्य नागरिक की गलती पर कार्रवाई तुरंत होती है, लेकिन सत्ता के ‘राजकुमारों’ के मामले में न्याय की आंखें क्यों बंद हो जाती हैं? वरिष्ठ अधिकारी क्या सिर्फ सफेदपोश अपराधियों को बचाने के लिए तैनात हैं?

भाजपा के ‘चरित्र और चेहरा’ वाले नेताओं के परिवार के अपराध क्या माफ हैं? क्या मध्य प्रदेश में सत्ता के करीब होना अपराध करने की छूट दे देता है?

प्रदेश की जनता को सुरक्षा मिलने के बजाय डर और धमकियाँ मिल रही हैं। बीएमओ को मिली धमकी “तुम्हारी पत्नी को उठा लूंगा” सिर्फ एक व्यक्ति का अपमान नहीं, बल्कि हर महिला की सुरक्षा को चुनौती है। अगर सरकार ने तुरंत इस ‘सत्तापुत्र’ पर कठोर कार्रवाई नहीं की, तो लोग मानने को मजबूर होंगे कि मध्य प्रदेश में कानून निष्प्रभावी है और केवल रसूख सक्रिय है।

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    Rashel Kachwah Rajput

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