
देश में दवा वितरण व्यवस्था को लेकर बड़ा विवाद सामने आया है। ड्रग टेक्निकल एडवाइजरी बोर्ड (DTAB) के प्रस्ताव के बाद फार्मासिस्ट की अनिवार्यता को कम करने पर बहस तेज हो गई है। इस फैसले के खिलाफ एमपी फार्मासिस्ट एसोसिएशन ने केंद्र सरकार को घेरते हुए विरोध दर्ज कराया है। यह मुद्दा अब सिर्फ नियमों तक सीमित नहीं रह गया, बल्कि सीधे तौर पर जनता की स्वास्थ्य सुरक्षा से जुड़ गया है।
क्या है नया प्रस्ताव और क्यों बढ़ा विवाद?
Drugs Technical Advisory Board (DTAB) ने औषधि एवं प्रसाधन नियम 1945 के नियम 64 में बदलाव का सुझाव दिया है। इस बदलाव में होलसेल दवा व्यापार के लिए “सक्षम व्यक्ति” की परिभाषा को बदलने और फार्मासिस्ट की अनिवार्यता कम करने की बात कही गई है। यही प्रस्ताव विवाद की जड़ बन गया है। फार्मासिस्ट एसोसिएशन का कहना है कि यह बदलाव दवा वितरण प्रणाली को कमजोर कर सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि दवाएं सामान्य उत्पाद नहीं होतीं। इनके भंडारण, गुणवत्ता और उपयोग में वैज्ञानिक समझ जरूरी होती है, जो केवल प्रशिक्षित फार्मासिस्ट के पास होती है।
फार्मासिस्ट की भूमिका क्यों है जरूरी?
एमपी फार्मासिस्ट एसोसिएशन का कहना है कि फार्मासिस्ट दवा वितरण की रीढ़ होते हैं। दवाओं की डोज, रिएक्शन और स्टोरेज कंडीशन जैसी जटिल चीजें किसी सामान्य व्यक्ति के बस की बात नहीं होतीं। World Health Organization (WHO) और Good Pharmacy Practice (GPP) के मानकों का हवाला देते हुए संगठन ने कहा कि दवाओं का सुरक्षित प्रबंधन विशेषज्ञों द्वारा ही संभव है। संगठन ने यह भी कहा कि देश में फार्मासिस्टों की कमी नहीं है। लाखों योग्य लोग मौजूद हैं, ऐसे में नियमों को ढीला करना सही नहीं है। अगर यह प्रस्ताव लागू होता है, तो दवा की गुणवत्ता और मरीजों की सुरक्षा पर असर पड़ सकता है।
सरकार को चेतावनी और आगे की रणनीति
एसोसिएशन ने केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा को ज्ञापन भेजकर इस प्रस्ताव को वापस लेने की मांग की है। सागर संभाग प्रभारी अमित तिवारी ने कहा कि यह फैसला जनता के स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ है। उन्होंने चेतावनी दी कि अगर प्रस्ताव वापस नहीं लिया गया, तो आंदोलन तेज किया जाएगा। विशेषज्ञों का मानना है कि स्वास्थ्य व्यवस्था में कोई भी ढील लंबे समय में खतरनाक साबित हो सकती है।
फार्मासिस्ट की अनिवार्यता को लेकर उठी यह बहस अब देशभर में चर्चा का विषय बन गई है। जहां एक ओर सरकार नियमों में बदलाव की बात कर रही है, वहीं दूसरी ओर विशेषज्ञ इसे जोखिम भरा कदम मान रहे हैं।
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