
नहीं उतरी ओएसडी की खुमारी: पद छिनने के बाद भी बरकरार है ‘साहब’ का पुराना रसूख
प्रशासनिक गलियारों में अक्सर यह चर्चा का विषय रहता है कि सत्ता और पद का मोह छोड़ना आसान नहीं होता। ऐसा ही कुछ मध्यप्रदेश की नौकरशाही में देखने को मिल रहा है, जहाँ एक पूर्व आईएएस अधिकारी पर ‘ओएसडी’ (Officer on Special Duty) पद की खुमारी इस कदर छाई है कि पद से हटने के बावजूद वे उसे छोड़ने को तैयार नहीं हैं। आलम यह है कि प्रशासनिक वीथिकाओं में आज भी वे खुद को ओएसडी के रूप में ही पेश करते हैं, ताकि उनका पुराना दबदबा और रसूख बना रहे।
2001 बैच के इस रिटायर्ड आईएएस अधिकारी की सबसे बड़ी खूबी उनकी ‘नेटवर्किंग’ और ‘तिकड़म’ बताई जाती है। सूत्रों का कहना है कि वे किसी भी राजनेता को अपनी बातों और कार्यशैली के सांचे में ढालने में माहिर हैं। इसी हुनर के चलते उन्होंने वर्तमान सरकार में ओएसडी जैसी महत्वपूर्ण कुर्सी हासिल की थी। हालांकि, उनकी कुछ गतिविधियों और कार्यप्रणाली को देखते हुए सरकार ने उन्हें इस पद से हटाकर निजी विश्वविद्यालय नियामक आयोग का पूर्णकालिक सदस्य नियुक्त कर दिया है।
हैरानी की बात यह है कि सरकार ने उनकी जगह दूसरे आईएएस अधिकारी को अपना ओएसडी नियुक्त कर दिया है, लेकिन ‘साहब’ के सिर से पुराने पद का नशा उतरने का नाम नहीं ले रहा है। अपना काम निकालने के लिए वे आज भी ओएसडी पद के सहारे का उपयोग करने से नहीं हिचकते। प्रशासनिक गलियारों में यह चर्चा आम है कि कैसे एक अधिकारी नया पद मिलने के बाद भी अपनी पुरानी पहचान से चिपके रहने के लिए हर संभव जतन कर रहा है।
सरकार ने उन्हें नई जिम्मेदारी देकर एक तरह से किनारे करने की कोशिश की, लेकिन साहब की कार्यशैली अब भी पुराने ढर्रे पर ही चल रही है। ओएसडी के पद का उपयोग कर अपना काम निकलवाने की उनकी इस ‘तिकड़म’ ने अब सवाल खड़े करने शुरू कर दिए हैं। देखना यह होगा कि क्या प्रशासनिक अनुशासन के बीच ‘साहब’ की यह खुमारी कभी उतरेगी या वे इसी तरह पुराने रसूख के साये में अपना काम निकालते रहेंगे।
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