
इस संवेदनशील मामले में पुलिस की कार्यप्रणाली भी अब कटघरे में है। परिजनों का आरोप है कि घटना के अगले दिन जब वे लिधौरा थाने पहुंचे, तो थाना प्रभारी ने संवेदनशीलता दिखाने के बजाय “जांच” का हवाला देकर उन्हें बैरंग लौटा दिया। पुलिस की इस टालमटोल नीति ने न केवल पीड़ित परिवार की पीड़ा को बढ़ाया, बल्कि आरोपियों को भी कानूनी शिकंजे से बचने का कीमती समय दे दिया।
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एसपी के दखल के बाद जागा प्रशासन – न्याय की उम्मीद टूटने पर पीड़ित परिवार 28 अप्रैल को पुलिस अधीक्षक (SP) कार्यालय पहुंचा। मामले की गंभीरता को देखते हुए एसपी ने तत्काल सख्त कार्रवाई के निर्देश दिए, जिसके बाद महिला थाने में मामला दर्ज कर प्रक्रिया आगे बढ़ाई गई। जतारा एसडीओपी अभिषेक गौतम के अनुसार, तीन आरोपियों के खिलाफ गैंगरेप का मामला दर्ज किया गया है। शुरुआती जानकारी में कुछ आरोपी नाबालिग बताए जा रहे हैं, जिसकी पुष्टि की जा रही है। साथ ही, समय पर एफआईआर दर्ज न करने को लेकर लिधौरा थाना प्रभारी से स्पष्टीकरण भी तलब किया जाएगा।
दबंगों का खौफ और न्याय की गुहार – पीड़ित परिवार ने आरोप लगाया है कि आरोपी पक्ष प्रभावशाली है और उन पर लगातार समझौता करने के लिए दबाव बनाया जा रहा है। परिवार को धमकियां दी जा रही हैं, जिससे वे दहशत में हैं। ग्रामीणों और परिजनों ने अब प्रशासन से सुरक्षा की मांग करते हुए निष्पक्ष जांच और दोषियों को फांसी की सजा देने की गुहार लगाई है। यह घटना महिला सुरक्षा के सरकारी दावों और जमीनी हकीकत के बीच की खाई को उजागर करती है।
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