हरित क्रांति के नायक या विदेशी कंपनियों के मोहताज? 1990 का ‘आत्मनिर्भर किसान’ आज रासायनिक गुलामी की बेड़ियों में!

वर्ष 1990 का वह दौर याद कीजिए, जब भारत का किसान गर्व से सीना तानकर खड़ा था। हम एक ऐसे ‘स्वतंत्र कृषक’ थे जो न केवल अपने परिवार का पेट भरते थे, बल्कि पूरे देश को 100% अनाज खुद उगाकर देते थे। जिस भारत को दुनिया ‘हरित क्रांति’ का सबसे बड़ा और सफल चेहरा मानती थी, आज उसी देश का अन्नदाता एक नए किस्म की गुलामी की ओर धकेल दिया गया है।
यह गुलामी किसी विदेशी शासक की नहीं, बल्कि विदेशी खादों और रसायनों की है।

1990 में जो किसान पूरी तरह आत्मनिर्भर और जैविक रूप से सक्षम था, आज वह अपनी ही जमीन पर बेबस नजर आ रहा है। चौंकाने वाले आंकड़े बताते हैं कि आज भारतीय कृषि में इस्तेमाल होने वाले कुल फर्टिलाइजर (खाद) का लगभग 60% हिस्सा विदेशी है या उसके कच्चे माल के लिए हम पूरी तरह विदेशों पर निर्भर हैं।
सोचने वाली बात है: जो देश कभी अपने दम पर अनाज के भंडार भरता था, आज उसका तख्ता पलट चुका है। बिना विदेशी यूरिया, डीएपी (DAP) और पोटाश के हमारी जमीनों से अनाज उगना नामुमकिन सा हो गया है। 1990 में हम सही मायनों में स्वतंत्र थे, लेकिन आज नीतिगत खामियों के कारण हम एक बार फिर विदेशी ताकतों और बहुराष्ट्रीय कंपनियों के ‘गुलाम’ बनते जा रहे हैं।
सत्ता के गलियारों से हर दिन ‘आत्मनिर्भर भारत’ और ‘किसान की आय दोगुनी करने’ के गगनभेदी नारे सुनाई देते हैं। लेकिन हकीकत के धरातल पर ये नारे खोखले साबित हो रहे हैं। वर्तमान सरकार के बड़े-बड़े दावों के बावजूद, जमीनी हकीकत यह है कि:

* विदेशी निर्भरता में रिकॉर्ड बढ़ोतरी: सरकार मेक इन इंडिया का ढोल तो पीटती है, लेकिन फर्टिलाइजर के आयात (Import) को रोकने के लिए कोई ठोस और दूरदर्शी नीति बनाने में नाकाम रही है।
* महंगाई की मार: विदेशी रसायनों पर निर्भरता के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतें बढ़ते ही देश के किसानों पर सब्सिडी कटौती या महंगे दाम का बोझ डाल दिया जाता है।
* पारंपरिक खेती की अनदेखी: सरकार ने ‘कॉर्पोरेट-परस्त’ नीतियों को बढ़ावा देकर देश के पारंपरिक, आत्मनिर्भर और कम लागत वाले कृषि मॉडल को पूरी तरह से तबाह कर दिया है।
नारे ‘डिजिटल इंडिया’ और ‘वैश्विक गुरु’ बनने के दिए जा रहे हैं, लेकिन देश की रीढ़ कहे जाने वाले किसान को खाद की एक बोरी के लिए लाइनों में लगना पड़ता है, जो खुद विदेशों से आयात होकर आती है।
यदि कोई देश अपने भोजन को उगाने के लिए 60% फर्टिलाइजर विदेशों से मंगवाने पर मजबूर हो, तो उसे पूर्ण रूप से संप्रभु या स्वतंत्र कैसे कहा जा सकता है? यह आर्थिक और कृषि जगत की एक ऐसी गुलामी है जो धीरे-धीरे हमारे पूरे सिस्टम को खोखला कर रही है।

समय आ गया है कि वर्तमान सरकार खोखली बयानबाजी और चुनावी वादों से ऊपर उठकर भारतीय कृषि को फिर से 1990 वाले गौरवशाली, आत्मनिर्भर और स्वतंत्र युग में ले जाने के लिए गंभीर कदम उठाए। वरना, कागजों पर आत्मनिर्भर दिखने वाला यह देश, असलियत में विदेशी कंपनियों के इशारों पर नाचने को मजबूर रहेगा।

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gaurav singh rajput

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