एमपी में ‘रेवड़ी’ की राजनीति और ‘रिश्वत’ की मलाई: जनता कर्जदार, नेता-अधिकारी मालामाल?

नमस्कार, आप देख रहे हैं ‘ब्रैंडवाणी समाचार’। मध्य प्रदेश की राजनीति में इन दिनों एक अजीब सा सर्कस चल रहा है। एक तरफ सरकार कर्ज लेकर जनता को ‘मुफ्त’ की घुट्टी पिला रही है, तो दूसरी तरफ पर्दे के पीछे भ्रष्टाचार का वो खेल चल रहा है जिसने प्रदेश की जड़ों को खोखला कर दिया है। आज हम बात करेंगे उस ‘काले धन’ की होड़ की, जिसमें नेता और अधिकारी एक-दूसरे को पछाड़ने में लगे हैं।

मुफ्त का जाल और सत्ता की लालसा
भाजपा सरकार ने अपनी कुर्सी बचाने के लिए खजाने का मुंह खोल दिया है। ‘लाडली बहना’ से लेकर मुफ्त राशन तक, योजनाओं की ऐसी बाढ़ आई है कि प्रदेश का हर नागरिक आज कर्ज के बोझ तले दबा है। लेकिन क्या यह वाकई ‘सशक्तिकरण’ है? या फिर अपनी नाकामियों को छुपाने के लिए जनता को दिया गया एक ‘आर्थिक मलहम’?

अधिकारियों की ऐश और बाहरी लोगों का दखल
‘ब्रैंडवाणी समाचार’ के पास जमीनी स्तर से जो खबरें आ रही हैं, वो चौंकाने वाली हैं। सरकार तो मुफ्त बांट रही है, लेकिन सरकारी दफ्तरों में बैठे ‘साहब’ अपनी जेबें भरने में व्यस्त हैं।
बाहरी सिंडिकेट: कई विभागों में अधिकारियों ने अपने खास बाहरी लोगों और बिचौलियों को बैठा रखा है। आम जनता का काम हो तो, लेकिन इन बिचौलियों के जरिए अधिकारी की तिजोरियां दिन-रात भर रही हैं।
भ्रष्टाचार का संस्थानीकरण: आज स्थिति यह है कि बिना ‘सुविधा शुल्क’ के फाइल एक मेज से दूसरी मेज तक नहीं सरकती। अधिकारियों के लिए यह दौर किसी ‘स्वर्ण काल’ से कम नहीं है।

बड़ा सवाल: काला धन किसके पास ज्यादा?
प्रदेश की गलियों में आज एक ही चर्चा है—ज्यादा काला धन किसके पास है? सफेदपोश नेताओं के पास या फिर इन एयरकंडीशन कमरों में बैठने वाले अधिकारियों के पास?
एक तरफ नेता हैं जो चुनाव जीतने के लिए पानी की तरह पैसा बहाते हैं। दूसरी तरफ वो नौकरशाह हैं जिनकी आय के ज्ञात स्रोतों और उनकी आलीशान जीवनशैली में जमीन-आसमान का अंतर है।
ऐसा लगता है कि प्रदेश में ‘लोक सेवा’ नहीं, बल्कि ‘काला धन जुटाने की होड़’ मची हुई है।

रोजगार की बलि, भ्रष्टाचार की होली
सरकार और प्रशासन का असली काम था—उद्योग लगाना, युवाओं के लिए रोजगार पैदा करना और प्रदेश को आत्मनिर्भर बनाना। लेकिन हकीकत इसके उलट है:
रोजगार के नाम पर सिफर: उद्योग धंधे ठप हैं, और युवाओं को केवल ‘सीखो-कमाओ’ जैसी योजनाओं के नाम पर बहलाया जा रहा है।
कमीशनखोरी का दीमक: निर्माण कार्यों से लेकर सप्लाई तक, हर जगह कमीशन का ऐसा दीमक लग गया है कि विकास की इमारत खड़ी होने से पहले ही जर्जर हो रही है।

‘ब्रैंडवाणी समाचार’ सीधे शब्दों में सरकार से पूछता है—क्या आप जनता को आत्मनिर्भर बनाना चाहते हैं या उन्हें भिखारी बनाकर अपनी सत्ता कायम रखना चाहते हैं? अधिकारियों पर नकेल क्यों नहीं कसी जा रही? क्या नेताओं और अधिकारियों के बीच कोई ‘गुप्त समझौता’ हो चुका है कि तुम हमारी सत्ता बचाओ, हम तुम्हारा भ्रष्टाचार बचाएंगे?

मध्य प्रदेश की जनता अब जाग रही है। कर्ज की बैसाखियों पर टिकी यह सरकार और भ्रष्टाचार की मलाई खाते ये अधिकारी याद रखें, कि जब जनता का धैर्य टूटता है, तो बड़े-बड़े सिंहासन डोल जाते हैं।

देखते रहिए ‘ब्रैंडवाणी समाचार’, निष्पक्षता और साहस का दूसरा नाम।

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