लोकतंत्र की ‘सुप्रीम’ हार या चुनावी धांधली का खेल? जब रक्षक ही कहें- ‘अगली बार वोट दे देना’, तो जनता न्याय किससे मांगे?

भारतीय लोकतंत्र के सबसे बड़े उत्सव ‘चुनाव’ का शोर थम चुका है। पश्चिम बंगाल में भारतीय जनता पार्टी की बढ़ती ताकत और देश में उनके वर्चस्व ने राजनीतिक विश्लेषकों को चौंका दिया है। लेकिन जीत के इस जश्न के पीछे एक ऐसा ‘कड़वा सच’ भी है जो लोकतंत्र की बुनियाद को हिला रहा है। आज देश के आम मतदाता की आंखों में गुस्सा और सवाल दोनों हैं।

विपक्ष और ममता बनर्जी की सरकार लगातार हमलावर है, लेकिन सबसे गंभीर सवाल उस जनता का है जो बूथ तक तो पहुँची, मगर उसे मताधिकार से वंचित कर दिया गया।

कि बंगाल समेत देश के कई हिस्सों में लगभग 27 लाख वोटर् के नाम काट दिए गए। जो मतदाता दशकों से वोट दे रहे थे, वे अचानक अपने ही देश में ‘बेगाने’ हो गए। जनता का सीधा सवाल है— जब हमने वोट दिया ही नहीं, तो सरकारें इतनी प्रचंड जीत कैसे दर्ज कर रही हैं? क्या यह किसी गहरी साजिश का हिस्सा है या चुनाव आयोग की अक्षमता?

इस पूरे विवाद में दो नाम सबसे ज्यादा चर्चा में हैं— मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और देश की सर्वोच्च अदालत, यानी सुप्रीम कोर्ट।

चुनाव आयोग की चुप्पी: चुनाव संपन्न कराना चुनाव आयोग की संवैधानिक जिम्मेदारी है। यदि लाखों लोगों के नाम सूची से गायब हुए, तो ज्ञानेश कुमार और उनके विभाग की जवाबदेही तय क्यों नहीं की गई? क्या ‘स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव’ सिर्फ किताबी बातें रह गई हैं?

सुप्रीम कोर्ट का ‘हल्का’ रुख: सबसे ज्यादा निराशा न्यायपालिका से हुई है। जब मतदाता अपने संवैधानिक अधिकार के हनन की गुहार लेकर कोर्ट पहुंचे, तो कथित तौर पर वहां से यह जवाब मिला— *”कोई बात नहीं, अगली बार वोट दे दीजिएगा।”*

ब्रैंडवाणी विशेष टिप्पणी: यह टिप्पणी किसी घाव पर नमक छिड़कने जैसी है। क्या संविधान द्वारा दिया गया ‘मताधिकार’ कोई बस की टिकट है जो छूट गई तो अगली बार मिल जाएगी? 5 साल का इंतजार क्या एक नागरिक के लोकतांत्रिक अधिकारों का अपमान नहीं है?

आज गली-चौराहों पर चर्चा है कि क्या माननीय सुप्रीम कोर्ट अब वास्तव में ‘सुप्रीम’ रह गया है? जब न्यायपालिका जनता की बुनियादी आवाज को सुनने के बजाय प्रशासनिक ढिलाई को संरक्षण देने लगे, तो लोकतंत्र का ‘चौथा स्तंभ’ और ‘संवैधानिक रक्षक’ दोनों कमजोर पड़ने लगते हैं।

जनता पूछ रही है कि यदि चुनाव आयोग और न्यायालय मिलकर एक नागरिक को उसके वोट से वंचित करने पर गंभीर नहीं हैं, तो क्या हम वास्तव में दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र होने का दावा कर सकते हैं?

सत्ता का वर्चस्व अपनी जगह है, लेकिन अगर जीत का आधार ‘मताधिकार का हनन’ और ‘वोटों की कटौती’ पर टिका है, तो वह जीत नैतिक रूप से खोखली है। बंगाल से लेकर दिल्ली तक, अगर जनता का भरोसा चुनाव प्रक्रिया से उठ गया, तो वह दिन दूर नहीं जब लोकतंत्र केवल एक औपचारिक ढांचा बनकर रह जाएगा।

ब्रैंडवाणी समाचार इस कड़वी सच्चाई के साथ खड़ा है कि न्याय केवल मिलना ही नहीं चाहिए, बल्कि होता हुआ दिखना भी चाहिए। अगली बार का वादा, इस बार के अन्याय को नहीं छिपा सकता।

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gaurav singh rajput

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