वल्लभ भवन की ‘कृपा’ से बंद अस्पताल डकार गया ₹50 लाख: क्या डॉ. मोहन यादव की जीरो टॉलरेंस नीति केवल कागजी ढोल है?

भोपाल/गुना: मध्य प्रदेश के प्रशासनिक गलियारे ‘वल्लभ भवन’ की नाक के नीचे चल रहे एक ऐसे घिनौने खेल का पर्दाफाश हुआ है, जिसने न सिर्फ इंसानियत को शर्मसार किया है बल्कि प्रदेश के मुखिया की ‘जीरो टॉलरेंस’ नीति पर भी एक बड़ा प्रश्नचिह्न लगा दिया है । गुना जिले के मधुसूदनगढ़ में ‘भोपाल सिटी हॉस्पिटल’ (वर्तमान परिवर्तित नाम- स्वास्तिक अस्पताल) के नाम पर मुख्यमंत्री स्वेच्छानुदान और राहत कोष से लगभग 48 से 50 लाख रुपयों का गबन कर लिया गया । सबसे चौंकाने वाली और शर्मनाक बात यह है कि कागजों पर जिस अस्पताल में सैकड़ों मरीजों का ‘सफल इलाज’ दिखाकर सरकारी खजाना खाली किया गया, हकीकत में उस अस्पताल का जमीन पर कोई वजूद ही नहीं बचा था; वह पहले ही बंद हो चुका था!

दैनिक भास्कर की ग्राउंड रिपोर्ट और विधानसभा में उठे सवालों के बाद जो दस्तावेज सामने आए हैं, वे यह साफ गवाही दे रहे हैं कि जनता के टैक्स की कमाई और गरीबों के हक का पैसा किस बेरहमी से लूटा गया है ।

सरकारी नियमों के अनुसार, मुख्यमंत्री सहायता कोष से राशि सीधे मरीज के इलाज के एवज में संबंधित अस्पताल के बैंक खाते में ट्रांसफर की जाती है । इस पूरी प्रक्रिया में अस्पताल प्रबंधन मरीजों के फर्जी दस्तावेज, फर्जी बीमारी के एस्टीमेट तैयार करता था और उसे सीधे मंत्रालय भेजता था ।

वल्लभ भवन में बैठे डॉ. अरविंद यादव (CM Fund विभाग प्रभारी) के इर्द-गिर्द इस पूरे खेल का ताना-बाना बुने जाने के गंभीर आरोप लग रहे हैं। सूत्रों और जनहित याचिका के तथ्यों के अनुसार, डॉ. अरविंद यादव के तथाकथित मुख्य कारिंदे और एजेंट शुभम पाल विभिन्न बंद या फर्जी अस्पतालों से फाइलें और एस्टीमेट एकत्रित करते थे। इसके बाद मंत्रालय से मिलीभगत कर चुटकियों में लाखों रुपए स्वीकृत करा दिए जाते थे। यह खेल केवल एक मरीज का नहीं था; मोर सिंह बड़ोनिया, दिनेश अहिरवार, रेखा बाई, संदीप मालवीय जैसे अनगिनत ऐसे नाम हैं जो कभी इस अस्पताल की दहलीज तक नहीं गए, लेकिन उनके नाम पर ₹30,000 से लेकर ₹1,90,000 तक के फर्जी बिल पास करा लिए गए ।

इंसानियत भी शर्मसार: कोई भगवान के मंदिर से पैसा लूटता है, तो कोई खतरनाक बीमारियों के नाम पर गरीबों का निवाला छीन रहा है। मुख्यमंत्री राहत कोष का पैसा निर्धन और असहाय परिवारों के जीवन को बचाने के लिए होता है । लेकिन यहाँ तो बिना मरीज के, बिना डॉक्टर के और बिना स्टाफ के ही लाखों का भुगतान सफलता की ‘स्थिति’ के साथ ट्रांसफर हो रहा था!

मुख्य सचिव की ईमानदारी और मुख्यमंत्री की आंखें बंद क्यों?

प्रदेश में ईमानदारी का ढोल पूरे देश में जोरों से पीटा जा रहा है। सरकार हर मंच से दावा करती है कि भ्रष्टाचार पर कड़ा प्रहार होगा। लेकिन इस मामले में जो प्रशासनिक सुस्ती दिखी है, वह डराने वाली है:

जांच के नाम पर औपचारिकता, विधानसभा में राघौगढ़ विधायक जयवर्धन सिंह द्वारा सवाल उठाए जाने के बाद स्वास्थ्य महकमा जागा । गुना सीएमएचओ द्वारा गठित चार सदस्यीय टीम ने निरीक्षण में पाया कि अस्पताल मौके पर है ही नहीं ।

नाम बदलकर बचने की कोशिश, जब शिकायतें 181 और बीएमओ तक पहुँचीं, तो आनन-फानन में अधिकारियों की कथित मिलीभगत से ‘भोपाल सिटी हॉस्पिटल’ का बोर्ड बदलकर ‘स्वास्तिक मल्टीकेयर हॉस्पिटल’ कर दिया गया ताकि पुराना ट्रैक रिकॉर्ड छिपाया जा सके ।

कोई ठोस कार्रवाई नहीं, हफ्तों बीत जाने के बाद भी मुख्य अपराधियों और वल्लभ भवन के जिम्मेदार चेहरों पर कोई बड़ी एफआईआर या गिरफ्तारी की कार्रवाई देखने को नहीं मिली है ।

ब्रांडवाणी समाचार के तीखे सवाल:

यह मामला अब माननीय उच्च न्यायालय के समक्ष जनहित याचिका के रूप में पहुँच चुका है। अब देखना यह है कि क्या इस घटिया सोच और लूटतंत्र पर वास्तव में कोई हथौड़ा चलेगा, या फिर हमेशा की तरह छोटी मछलियों को फंसाकर वल्लभ भवन के मगरमच्छों को बचा लिया जाएगा। जनता जवाब मांग रही है!

– ब्यूरो रिपोर्ट, ब्रांडवाणी समाचार

  • Shruti Soni

    ब्रांडवाणी समाचार

    अनुभवी पत्रकार। हर दिन ताज़ा और सटीक खबरों के साथ आपकी सेवा में। निष्पक्ष रिपोर्टिंग और गहराई से तथ्य प्रस्तुत करना मेरी पहचान है।

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