
भोपाल: मध्य प्रदेश में बढ़ते सरकारी कर्ज को लेकर एक बार फिर राजनीतिक और आर्थिक बहस तेज हो गई है। एक ओर पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के कार्यकाल में शुरू की गई जनकल्याणकारी योजनाओं को भाजपा अपनी बड़ी उपलब्धि बताती है, वहीं दूसरी ओर विपक्ष लगातार सवाल उठा रहा है कि इन योजनाओं और बढ़ते खर्च के कारण राज्य का कर्ज लगातार बढ़ा। अब मोहन यादव सरकार के कार्यकाल में भी कर्ज बढ़ने का सिलसिला जारी है, जिससे वित्तीय अनुशासन पर चर्चा तेज हो गई है।
शिवराज सिंह चौहान के कार्यकाल में कितना बढ़ा कर्ज?
शिवराज सिंह चौहान लगभग 16 वर्षों तक अलग-अलग कार्यकाल में मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे। इस दौरान राज्य में सड़क, सिंचाई, बिजली, कृषि और महिला कल्याण पर बड़े पैमाने पर खर्च किया गया।
2023 के अंत तक, जब उन्होंने मुख्यमंत्री पद छोड़ा, तब सार्वजनिक रिपोर्टों के अनुसार राज्य पर लगभग ₹4 लाख करोड़ का कर्ज था। केवल वर्ष 2023 में ही लगभग ₹44,000 करोड़ का नया ऋण लिया गया था। इसमें विधानसभा चुनाव के दौरान भी उधारी शामिल थी।
किन योजनाओं पर हुआ बड़ा खर्च?
शिवराज सरकार की प्रमुख योजनाओं में शामिल हैं:
- लाड़ली बहना योजना
- मुख्यमंत्री किसान कल्याण योजना
- मुख्यमंत्री कन्या विवाह योजना
- संबल योजना
- तीर्थ दर्शन योजना
- कृषि सिंचाई विस्तार
- ग्रामीण सड़क और पेयजल परियोजनाएं
- स्कूल एवं स्वास्थ्य ढांचे का विस्तार
इन योजनाओं का उद्देश्य महिलाओं, किसानों, गरीब परिवारों और ग्रामीण क्षेत्रों को प्रत्यक्ष लाभ देना था। सरकार का दावा था कि इन योजनाओं से करोड़ों लोगों को आर्थिक सहायता मिली और सामाजिक सुरक्षा मजबूत हुई।
क्या इन योजनाओं से जनता को फायदा हुआ?
विश्लेषकों के अनुसार कई योजनाओं का सामाजिक प्रभाव सकारात्मक रहा।
- महिलाओं की बैंकिंग और वित्तीय भागीदारी बढ़ी।
- किसानों को प्रत्यक्ष आर्थिक सहायता मिली।
- ग्रामीण सड़कों और सिंचाई परियोजनाओं से कृषि उत्पादन में सुधार हुआ।
- सामाजिक सुरक्षा योजनाओं का दायरा बढ़ा।
हालांकि अर्थशास्त्रियों का कहना है कि लगातार नकद सहायता योजनाओं से राजकोष पर अतिरिक्त दबाव भी बढ़ा।
मोहन यादव सरकार के सामने क्या चुनौती है?
दिसंबर 2023 में सरकार संभालने के बाद मोहन यादव सरकार को पहले से मौजूद वित्तीय दायित्वों के साथ नई घोषणाओं को भी लागू करना पड़ा।
सार्वजनिक रिपोर्टों के अनुसार बाद के वर्षों में राज्य का कुल कर्ज बढ़कर लगभग ₹4.65 लाख करोड़ तक पहुंच गया। सरकार का कहना है कि यह पूंजीगत निवेश, अधोसंरचना और विकास कार्यों के लिए आवश्यक उधारी है। वहीं आलोचकों का आरोप है कि लगातार बढ़ती उधारी भविष्य में ब्याज भुगतान का बोझ बढ़ा सकती है।
बढ़ते कर्ज की प्रमुख वजहें
- लाड़ली बहना जैसी बड़ी कल्याणकारी योजनाओं का निरंतर खर्च।
- कर्मचारियों के वेतन और पेंशन।
- अधोसंरचना परियोजनाएं।
- सिंचाई और सड़क निर्माण।
- केंद्र और राज्य की साझा योजनाओं में राज्य का अंश।
- पूंजीगत निवेश बढ़ाने की नीति।
सरकार का पक्ष
राज्य सरकार का कहना है कि केवल कर्ज की राशि देखकर निष्कर्ष निकालना उचित नहीं है। यदि उधार की राशि का उपयोग सड़क, सिंचाई, उद्योग, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी उत्पादक परिसंपत्तियों के निर्माण में किया जाता है, तो इससे भविष्य में आर्थिक विकास और राजस्व बढ़ सकता है। बजट में भी सरकार ने विकास और कल्याण दोनों पर जोर देने की बात कही है।
विपक्ष के आरोप
विपक्ष का आरोप है कि:
- राज्य का कर्ज लगातार बढ़ रहा है।
- ब्याज भुगतान का बोझ भी बढ़ रहा है।
- नई योजनाओं के लिए लगातार उधारी ली जा रही है।
- राजकोषीय अनुशासन पर दबाव दिखाई दे रहा है।
सरकार इन आरोपों को खारिज करते हुए कहती है कि राज्य की अर्थव्यवस्था और बजट का आकार भी लगातार बढ़ा है।
उपलब्ध सार्वजनिक आंकड़े बताते हैं कि मध्य प्रदेश का कर्ज शिवराज सिंह चौहान के अंतिम कार्यकाल तक काफी बढ़ चुका था और मोहन यादव सरकार के दौरान भी इसमें वृद्धि हुई है। दूसरी ओर, दोनों सरकारों का तर्क है कि यह उधारी विकास परियोजनाओं और कल्याणकारी योजनाओं के वित्तपोषण के लिए आवश्यक रही। इसलिए केवल कर्ज की कुल राशि के आधार पर किसी एक सरकार को पूरी तरह जिम्मेदार या सफल ठहराना उचित नहीं होगा; मूल्यांकन इस बात पर भी निर्भर करता है कि उधार की राशि का उपयोग किस प्रकार हुआ और उससे राज्य को दीर्घकालिक आर्थिक एवं सामाजिक लाभ कितना मिला।
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