
बुरहानपुर/ राजू सिंह राठौड़: मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की महत्वाकांक्षी सांदीपनि विद्यालय योजना का उद्देश्य सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों को निजी स्कूलों जैसी आधुनिक शिक्षा, बेहतर संसाधन और गुणवत्तापूर्ण वातावरण उपलब्ध कराना है। लेकिन बुरहानपुर जिले के शाहपुर स्थित सांदीपनि विद्यालय की जमीनी हकीकत इन दावों से बिल्कुल अलग नजर आई। यहां बच्चों से झाड़ू लगवाई जा रही है, कई कक्षाएं बिना शिक्षक के संचालित हो रही हैं, अत्याधुनिक लैब पर ताले लटके हैं, परिसर में गंदगी फैली हुई है और जिम्मेदार अधिकारी निरीक्षण के दौरान अनुपस्थित मिले।
अव्यवस्था का उदाहरण
विद्यालय में करीब 1300 विद्यार्थी अध्ययनरत हैं। यहां 22 नियमित और 13 अतिथि शिक्षक पदस्थ हैं, लेकिन विद्यार्थियों की संख्या के मुकाबले शिक्षकों की कमी साफ दिखाई देती है। करोड़ों रुपये की लागत से तैयार इस मॉडल स्कूल में व्यवस्थाएं आदर्श होने के बजाय अव्यवस्था का उदाहरण बनती नजर आईं।
मासूम बच्चों के हाथों में किताब नहीं, झाड़ू दिखी
जैसे ही हमारी टीम विद्यालय परिसर में पहुंची, सबसे पहले जो दृश्य सामने आया उसने सभी को हैरान कर दिया। कक्षा तीसरी के छोटे-छोटे बच्चे हाथों में झाड़ू लेकर स्कूल परिसर और मैदान की सफाई करते मिले। कुछ बच्चे कचरा उठाते दिखाई दिए तो कुछ बरामदे साफ कर रहे थे।
सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या इन बच्चों को पढ़ाई करने के लिए स्कूल भेजा गया है या सफाई कर्मचारी की जिम्मेदारी निभाने के लिए?
जब इस संबंध में शिक्षिका आशा वानखेड़े से सवाल किया गया तो उन्होंने जवाब दिया कि चपरासी नहीं आया था, इसलिए बच्चों से सफाई करवाई गई। जबकि विद्यालय में सफाई के लिए चार चपरासी पदस्थ बताए गए हैं। ऐसे में बच्चों से झाड़ू लगवाना कई गंभीर सवाल खड़े करता है।
स्कूल परिसर में गंदगी, गुटखा-पान मसाले के रैपर बिखरे मिले
पड़ताल आगे बढ़ी तो स्कूल परिसर की एक और चिंताजनक तस्वीर सामने आई। मैदान और बरामदों में जगह-जगह गुटखा और पान मसाले के खाली रैपर पड़े मिले। इससे यह सवाल भी खड़ा होता है कि आखिर स्कूल परिसर में ये रैपर पहुंचे कैसे? क्या विद्यालय परिसर में तंबाकू उत्पादों का उपयोग हो रहा है या फिर निगरानी व्यवस्था पूरी तरह कमजोर पड़ चुकी है?
विद्यालय जैसा संवेदनशील परिसर यदि साफ-सफाई और अनुशासन के मामले में ही लापरवाह नजर आए तो बच्चों पर इसका क्या प्रभाव पड़ेगा, यह सोचने वाली बात है।
शिक्षक विहीन मिलीं कक्षाएं, बच्चों का समय हुआ बर्बाद
निरीक्षण के दौरान जब टीम कक्षा पांचवीं में पहुंची तो दोनों सेक्शन बिना शिक्षक के मिले। बच्चे अपनी सीटों पर बैठे शिक्षक का इंतजार कर रहे थे। कुछ देर बाद शिक्षक पहुंचे और उन्होंने बताया कि वे ई-अटेंडेंस लगाने गए थे। हालांकि सवाल यह उठता है कि सुबह 10:30 बजे शुरू होने वाले विद्यालय में 11:15 बजे तक उपस्थिति दर्ज करने की प्रक्रिया क्यों चल रही थी? इस दौरान बच्चों की पढ़ाई का नुकसान किसकी जिम्मेदारी है?
इतना ही नहीं, कक्षा के भीतर पढ़ाई के माहौल की बजाय कबाड़ रखा हुआ मिला, जिससे साफ जाहिर होता है कि व्यवस्थाओं की नियमित निगरानी नहीं हो रही।
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लैब पर ताले, डिजिटल शिक्षा के दावे हवा-हवाई
विद्यालय में स्थापित आधुनिक सुविधाओं की भी हकीकत निराशाजनक मिली। STEM लैब धूल से अटी पड़ी थी, आर्ट एंड क्राफ्ट कक्ष पर ताला लटका था और आईसीटी लैब भी बंद मिली। जिन कंप्यूटरों और आधुनिक संसाधनों के जरिए बच्चों को डिजिटल शिक्षा देने का दावा किया जाता है, वे उपयोग के बजाय धूल फांकते नजर आए। फिजिक्स लैब के उपकरण भी इस्तेमाल के इंतजार में पड़े मिले।
कक्षा 11वीं कॉमर्स में भी विद्यार्थियों को शिक्षक का इंतजार करना पड़ रहा था। अंग्रेजी विषय का पीरियड निर्धारित होने के बावजूद संबंधित अतिथि शिक्षक को कार्यभार नहीं मिलने के कारण कक्षा प्रभावित होती दिखाई दी।
कक्षा में पढ़ाने के बजाय मोबाइल में व्यस्त मिले शिक्षक
निरीक्षण के दौरान कक्षा आठवीं में एक शिक्षक विद्यार्थियों को पढ़ाने की बजाय मोबाइल फोन पर व्यस्त मिले। पूछने पर शिक्षक नरेंद्र ने स्वीकार किया कि वे फोन पर बातचीत कर रहे थे।
विद्यालय परिसर में कक्षा संचालन के दौरान मोबाइल के उपयोग को लेकर स्पष्ट दिशा-निर्देश होने के बावजूद इस तरह का व्यवहार सवालों के घेरे में है। जब शिक्षक स्वयं पढ़ाई के समय मोबाइल में व्यस्त रहेंगे तो विद्यार्थियों की पढ़ाई कैसे प्रभावित नहीं होगी?
प्राचार्य कक्ष खाली, बिजली की फिजूलखर्ची भी उजागर
जब टीम प्राचार्य कक्ष पहुंची तो वहां भी जिम्मेदार अधिकारी मौजूद नहीं मिले। कार्यालय में पंखे और लाइटें बेवजह चल रही थीं। कैमरा पहुंचते ही कर्मचारियों ने जल्दबाजी में स्विच बंद कर दिए, लेकिन कोई भी कर्मचारी कैमरे के सामने विद्यालय की व्यवस्थाओं पर कुछ बोलने को तैयार नहीं हुआ।
यह स्थिति प्रशासनिक निगरानी और जवाबदेही दोनों पर सवाल खड़े करती है।
जिला शिक्षा अधिकारी ने जांच की कही बात
पूरे मामले को लेकर जब जिला शिक्षा अधिकारी रोहिणी पवार से सवाल किया गया तो उन्होंने जांच कर आवश्यक कार्रवाई करने की बात कही। हालांकि विद्यालय में सामने आई अव्यवस्थाओं और प्रबंधन की जिम्मेदारी को लेकर उन्होंने कोई स्पष्ट जवाब नहीं दिया।
अब कार्रवाई का इंतजार
शाहपुर के सांदीपनि विद्यालय की यह तस्वीर केवल एक स्कूल की नहीं, बल्कि उस भरोसे की भी है जिसके साथ ग्रामीण और गरीब परिवार अपने बच्चों को बेहतर शिक्षा दिलाने के लिए सरकारी मॉडल स्कूलों में भेजते हैं।
जब बच्चों के हाथों में किताबों की जगह झाड़ू हो, स्मार्ट लैब पर ताले लटके हों, कई कक्षाएं शिक्षक विहीन हों, परिसर में गंदगी फैली हो और जिम्मेदार अधिकारी ही अनुपस्थित मिलें, तब करोड़ों रुपये खर्च कर बनाई गई योजना के उद्देश्य पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
अव्यवस्थाओं का अखाड़ा
अब देखना होगा कि इस खुलासे के बाद शिक्षा विभाग और जिला प्रशासन विद्यालय की इन अव्यवस्थाओं पर क्या कार्रवाई करता है और क्या शाहपुर का सांदीपनि विद्यालय वास्तव में बच्चों के सपनों की पाठशाला बन पाएगा या फिर अव्यवस्थाओं का अखाड़ा बना रहेगा।
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