
नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने देश की जेलों में बंद बुजुर्ग, गंभीर रूप से बीमार और दिव्यांग कैदियों को लेकर एक बेहद बड़ा और ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। शीर्ष अदालत ने देश के सभी राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को कड़ा निर्देश जारी करते हुए कहा है कि मानवीय आधार पर ऐसे कैदियों की समय से पहले रिहाई के लिए आगामी तीन महीने के भीतर एक पारदर्शी और स्पष्ट नीति तैयार की जाए।
न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की खंडपीठ ने यह ऐतिहासिक आदेश राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण द्वारा दायर एक जनहित याचिका (पीआईएल) पर सुनवाई करते हुए दिया। इस याचिका में देशभर की जेलों में बंद असमर्थ कैदियों की दयापूर्ण रिहाई के लिए एक समान गाइडलाइंस बनाने की गुहार लगाई गई थी।
मौलिक व मानवाधिकारों का हवाला
जनहित याचिका में देश की जेलों की जमीनी हकीकत बयां करते हुए कहा गया था कि वर्तमान में सुधार गृहों में बुजुर्ग और शारीरिक रूप से बेहद कमजोर कैदियों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है। इनमें से कई कैदी कैंसर या अन्य लाइलाज व गंभीर बीमारियों से जूझ रहे हैं, जिन्हें जेल परिसरों के भीतर पर्याप्त और विशेष स्वास्थ्य सुविधाएं नहीं मिल पा रही हैं। याचिका में दलील दी गई कि ऐसे लाचार कैदियों को लगातार जेल में बंद रखना भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) और अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार) का सीधा उल्लंघन है, साथ ही यह अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार मानकों के भी विपरीत है।
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नई नीति में शामिल होंगी ये कड़ी शर्तें
पात्रता के नियम: रिहाई के लिए कौन से कैदी पात्र होंगे, इसकी पूरी गाइडलाइन हो (जैसे 70 वर्ष से अधिक आयु या शारीरिक अक्षमता)।
लाइलाज बीमारी की परिभाषा: ‘टर्मिनल इलनेस’ (ऐसी बीमारियां जिनका इलाज संभव न हो) को पूरी तरह स्पष्ट रूप से परिभाषित किया जाए ताकि कोई भ्रम न रहे।
स्वतंत्र मेडिकल बोर्ड: कैदियों के स्वास्थ्य की निष्पक्ष और सटीक जांच के लिए एक स्वतंत्र मेडिकल बोर्ड का गठन अनिवार्य किया जाए।
त्वरित निपटारा: समय से पहले रिहाई के लिए आने वाले सभी आवेदनों पर बिना किसी अनावश्यक देरी या लालफीताशाही के तेजी से फैसला लिया जाए।
‘ई-प्रिजन्स पोर्टल’ के जरिए डिजिटल होगी पूरी प्रक्रिया
पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने पूरी प्रक्रिया को डिजिटल रूप देने का आदेश दिया है। अब ऐसे कैदियों की रिहाई से जुड़े सभी आवेदन अनिवार्य रूप से ‘ई-प्रिजन्स पोर्टल’ के माध्यम से ही प्रोसेस किए जाएंगे। इस पोर्टल पर आवेदन जमा होने से लेकर, मेडिकल बोर्ड की जांच, जेल प्रशासन की रिपोर्ट, अंडरट्रायल रिव्यू कमेटी की सिफारिश और सक्षम प्राधिकारी (Competent Authority) के अंतिम फैसले तक की पूरी कड़ियों को डिजिटल रूप से दर्ज किया जाएगा। यदि आवेदन निरस्त होता है, तो उसका कारण भी पोर्टल पर दर्ज करना होगा। अदालत ने निर्देश दिया कि इस डिजिटल सिस्टम में एक ‘अलर्ट और डेडलाइन मॉनिटरिंग’ सिस्टम भी होना चाहिए, जो समय-सीमा बीतने पर अधिकारियों को सचेत कर सके। इसके साथ ही कैदियों की व्यक्तिगत और मेडिकल गोपनीयता को पूरी तरह सुरक्षित रखने के निर्देश भी दिए गए हैं।
केंद्र सरकार और NIC को मिले निर्देश
इस बड़े डिजिटल ढांचे को जमीन पर उतारने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार के कानून एवं न्याय मंत्रालय, गृह मंत्रालय और राष्ट्रीय सूचना विज्ञान केंद्र को बड़ी जिम्मेदारी सौंपी है। ये विभाग मिलकर सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को आवश्यक तकनीकी सहायता, सॉफ्टवेयर सपोर्ट, डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर और अधिकारियों को विशेष प्रशिक्षण उपलब्ध कराएंगे। इसके अलावा, एनआईसी को ई-प्रिजन्स पोर्टल को इस नीति के अनुरूप अपग्रेड करने और उसे नियमित रूप से मेंटेन करने के आदेश दिए गए हैं।
6 महीने में देना होगा जवाब
अदालत ने इस मामले में बेहद सख्त रुख अपनाते हुए केंद्र सरकार सहित सभी राज्य सरकारों और केंद्र शासित प्रदेशों को अगले 6 महीने के भीतर एक ‘अनुपालन हलफनामा’ दाखिल करने का निर्देश दिया है। इस हलफनामे में सरकारों को यह बताना होगा कि उन्होंने अदालत के आदेश पर क्या कदम उठाए हैं, नई नीति की वर्तमान स्थिति क्या है, इसके तहत कितने कैदियों को रिहाई के लिए चिन्हित किया गया है और कितने मामले अभी विचाराधीन हैं।
- supreme-court-orders-policy-for-premature-release-of-elderly-disabled-and-terminally-ill-prisoners







