
पुलिस महकमे की एक बड़ी और आमतौर पर लूप लाइन मानी जाने वाली शाखा इन दिनों एडीजी साहब से ज्यादा दो कांस्टेबलों को लेकर चर्चा में है। विभागीय गलियारों में तो यहां तक कहा जा रहा है कि अगर शाखा से जुड़ा कोई काम है और फाइल को साहब तक पहुंचाना है, तो पहले इन दोनों कांस्टेबलों से मिलना जरूरी है।
चर्चा है कि विभागीय जांच, तबादला आदेश या किसी दूसरी फाइल से जुड़ा काम हो, साहब तक रास्ता बनाने की जिम्मेदारी कथित तौर पर इन्हीं दोनों ने संभाल रखी है। गलियारों में इनके नाम पर पांच हजार से लेकर 25 हजार रुपये तक की कथित ‘सेवा दर’ की भी चर्चा है। कौन सा काम कितने में होगा, इसका हिसाब-किताब भी दोनों कांस्टेबल ही तय करते हैं-ऐसी चर्चाएं इन दिनों खूब सुनाई दे रही हैं।
कहानी में ट्विस्ट यह है कि एडीजी साहब को इस शाखा में आए अभी ज्यादा वक्त नहीं हुआ है। बताया जा रहा है कि नई जगह की अंदरूनी व्यवस्था समझने के दौरान उन्होंने इन दोनों पर भरोसा जताया है। इसी भरोसे का असर है कि साहब के आसपास कई बार अधिकारियों से ज्यादा इन दोनों कांस्टेबलों की मौजूदगी नजर आने की चर्चा है।
वैसे शाखा भले ही लूप लाइन मानी जाती हो, लेकिन संख्या बल के लिहाज से यह विभाग की बड़ी शाखाओं में शामिल है। जाहिर है, जहां कर्मचारी ज्यादा हों, वहां फाइलें भी कम नहीं होतीं और फाइलों के साथ काम कराने वालों की आवाजाही भी बनी रहती है।
अब असली सवाल यह है कि क्या वाकई एडीजी साहब तक पहुंचने के लिए इन दो कांस्टेबलों से होकर गुजरना पड़ रहा है? या फिर विभागीय गलियारों में चल रही चर्चाएं महज चर्चाएं ही हैं? फिलहाल तो साहब की नई शाखा में दो कांस्टेबलों की बढ़ती सक्रियता ने कई सवाल जरूर खड़े कर दिए हैं।
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